स्वीकार-सुशील पारीक

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एक साल बाद जब शादी की खुमारी टूटी तो देखा कि पेट थोड़ा बाहर की तरफ निकला आ रहा है शर्ट नीचे से और पेंट उपर से टाइट हो गई है । इस पर मुझे थोड़ा ध्यान देना होगा ! कल से जल्दी उठकर जोगिंग और फिर थोड़ी एक्सरसाइज ।
लेकिन एक साल के वैवाहिक जीवन ने पुरानी दिनचर्या को तहस-नहस कर दिया था रात को देर से सोने के बाद सवेरे नो बजे से पहले उठना मानो पहाड़ उठाने जैसा काम हो गया । चलो कल से कोशिश करेंगे और ऐसे अनगिनत कल निकल गए लेकिन कुछ नहीं हो सका और दिन-ब-दिन शादी विवाह के मौसम में शाम की दावत और ससुराल वालों की मनुुुुहार ने पेट को धीरे-धीरे तोंद में तब्दील कर दिया था ।
कभी-कभी लगता था जैसे तोंद भी मौसम के बुखार की तरह ही है दो-चार दिन में यह भी ढल जाएगी लेकिन यह मन का भ्रम था । इसका घेरा बढ़ता जा रहा था । ऊपर से नीचे तक इसने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया था और कमर के टायरों का आयतन साल-दर-साल बढ़ता जा रहा था ।
अब तो श्रमती जी भी टोकने लगी थी और मैं शातिराना तरीके से उनकेे ही बनाए स्वादिष्ट खाने पर इसका दोषारोपण कर देता था। टीवी ज्यादा देखने का परिणाम या पिछले कुछ दिनो से नींद पूरी ना हो सकने की वजह से यह पेट बढ रहा है जल्दी ही वह अपने पुराने शेप मे लौट आयेगा यह आशा रहती थी !
कभी-कभी मुझे लगता था यह अनुवांशिक रूप से मुझे विरासत में मिली हुइ बिमारी है मेरे पिताजी को भी थी और मुझे भी है इससे बचना मेरे लिए संभव ही नहीं है और मुझे इसे स्वीकार कर लेना चाहिए हर दिन बीबी के तीरों का तीखापन कुछ बढ़ता जाता था और मेरा चिड़चिड़ापन भी ।
वक्त गुजरता जाता था तोंद बढ़ती जाती थी । कोई भी तोंद का जिक्र करता तो मुझे झुंझलाहट होने लगती गुस्सा आने लगता था और मैं मरने मारने पर उतारू हो जाता । बीबी और बच्चे तो गृह कलह के कारण इस विषय पर चुप ही रहते थे पर ये दोस्त लोग तो उसे टारगेट बनाकर जो तीर चलाते थे तो कलेजा छलनी हो जाता।
इसेे कम करने के ऐसै ऐसै नायाब और जान लेवा फार्मुले पेश करते कि रिवाल्वर लेकर उनको गोली से उड़ा देने का मन करता था। तोंद का घेरा अब शर्ट के बटन तोड कर बाहर निकलने को उतारू हो गया तो शादी विवाह की महफिलों में जाना जैसे जहर हो गया । दोस्तो के ताने कइ बार प्रेरणा भी बन जाते थे ।
सुबह जल्दी उठ कर एक्सरसाइज करने की शपथ के साथ ही नए स्पोर्ट्स शू ,नइ टी शर्ट, निक्कर की जगह पेन्ट से काम चलाना पडता । घर के नजदीक वाले बगीचे में जाकर हाथ र्पाँव हिलाना और चार लम्बी सांसे अनुलोम विलोम के नाम से और कुछ मिनट की कपालभाति की थकान को आधा घंटा शवासन करके दूर करना पड़ता था।
डाइट कंट्रोल के लिए सुुुबह स्प्राउट्स , ओट्स फ्रूट्स, पेट फिर भी न भरे तो पेठा बीच बीच मे जूूस। पानी पीने की मात्रा भी तय हो जाती । शरीर मे कमजोरी न हो इसके लिए च्यवनप्राश का डिब्बा आ जाता । यह व्यवस्था भी ज्यादा लम्बी नहीं चल पाती ।
सास ससुर की वैवाहिक रजत जयन्ती या आफिस के काम से बाहर की यात्रा सब गुड़ गोबर कर देती। स्पोर्ट्स शू कुछ दिन तो जूतों की आलमाारी में रहते फिर छत की कबाड़ की बुखारी से होते हुए धोबी के घर तक की यात्रा तय कर लेते । इंच दर इंच तोंद अपना क्षेत्र फल बढाती रहती !
तोंद की और मेरी हमेशा चलने वाली इस रस्साकशी में मेरी हमेशा हार ही हुई तोंद जीतकर पहले से ज्यादा फूलती ही रही । छोटी बहन जब भी आती तो मजाक करते हुए अपनी भाभी से पूछती भैया की Due Date कब है तब एसा मन होता कि उसकी चोटी पकडकर रगड़ दूं पर मन मसोस कर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था ।
तीन बार ढीली करवाइ गई पेन्ट फिर टाइट हो जाती और अब तो उनमें और ढीला करवाने की गुंजाइश भी नहीं रहती तो उससे बड़ी साइज की दो ही पेंट इसलिए खरीदता कि फिर कहीं टाइट ना हो जाए । शादियों के फोटो सेशन मुझे कभी भी अच्छे नहीं लगते थे कैमरा सामने आते ही मैं अपने पेट को भीतर खींचकर सांस को रोक लेता था और क्लिक का इंतजार करता मगर कैमरे की सेटिंग तभी पूरी होती जब मेरी सांस छूट जाती और तोंद अपने प्राकृतिक स्थान पर आ जाती ।
 
सोफे पर बैठकर टीवी देखते रहना तब एकमात्र शौक बच गया था पर रामदेव बाबा के प्रोग्राम आते ही रिमोट से उसे बदलने की स्पीड उनकी कपालभाति से बहुत ज्यादा होती थी । स्मार्ट और बिना तोंद के लोग मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं आते थे ।
अब मुझे व शायद मेरे परिवार को भी समझ आ गया है कि तोंद खाते पीते घर की निशानी है । एक उम्र के बाद यह सभी को आती ही है । अपनी तोंद की इस कथा यात्रा पर मैं सोच ही रहा था कि श्रमती जी ने चाय और नाश्ता लेकर आइ प्लेट में एक समोसे के साथ दो गुलाब जामुन भी थे दिल बाग बाग हो गया और नाश्ते के साथ जब चाय होठों से लगाई तो वह भी मीठी ।
जुबान से तो मैं चुप रहा पर चेहरे की चमक देखकर श्रीमती जी भी मुस्कुराते हुए बोली देखिए जी अब आप बिना तोंद के अच्छे नहीं लगेंगे इसलिए अब यह है सो है । मेरी भी अब सोतन के साथ जीने की आदत हो गई है अब परेशान होने की जरूरत नहीं है । मैंने बढिया नाश्ते के बाद अपनी तोंद परे हााथ फेरा और टीवी देेखने लगा ।
सुशील पारीक
 

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