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आज किसी भी काम में प्रिया का मन नहीं लग रहा था। पता नहीं क्यूँ बार बार दिल घर की तरफ उड़ा जा रहा था। आज उसकी दीदी नेहा जो आने वाली थी अपनी नन्ही सी गुडिया मोना के साथ पहली बार। नेहा की शादी दो वर्ष पहले कानपुर में हुई थी। उसके पति सत्येंद्र जी का कानपुर में ही अच्छा ख़ासा कपड़े का व्यवसाय था।
प्रिया अपने पिता की बहुत लाडली बेटी थी। इस वर्ष 71 प्रतिशत प्राप्त करके अपने विद्यालय में वह पूरी क्लास में अब्बल आई थी। बचपन से ही वह पढाई में बहुत होशियार थी। शहर के सबसे अच्छे कालेज में उसको मनचाहे कोर्स –बी.ए. इंग्लिश- में एडमिशन भी मिल गया था। अपनी प्रतिभा से वह जल्दी ही सहपाठिओं व अध्यापकों में लोकप्रिय हो गयी थी ।
भगवान ने उसे प्रतिभा के साथ साथ रूप भी दिल खोल के दिया था। छरहरा गौरा बदन, लम्बे बाल, बलखाती चाल, मृदभाषी, सुसंस्कृत सर्वगुण संम्पन्न थी वह। अपने घर की शान और माता पिता की बहुत लाडली भी थी।
नेहा के पति सत्येंदर व्यस्तता के कारण नेहा के साथ नहीं आ पाये थे इसलिये उन्होंने दिव्यांश के साथ नेहा को भेज दिया था। घर में नेहा की ममतामयी सास थीं जो बहुत ही सुसंस्कृत महिला थी। वे नेहा का बहुत ध्यान रखती थी। भरापूरा घर था, नेहा अपने सुसराल में बहुत खुश थी। दो महीने पहले ही उसकी बेटी मोना का जन्म हुआ था। बेटी होने के बाद वह पहली बार मायके आ रही थी। प्रिया का कालेज घर से थोडी ही दूरी पर था।
जैसे ही क्लास समाप्त हुई उसने अपना स्कूटर निकाला और जल्दी से घर की तरफ निकल पड़ी। घर पहुंचते ही उसने अपना स्कूटर बाहर खड़ा किया और सब को चौंकाने की मंशा से दबे पाँव कमरे में घुस कर ज़ोर से कहा ‘हैंडस अप’, पर अगले ही पल वह बुरी तरह से झेंप गई।
सामने एक स्मार्ट सा नवयुवक खड़ा था जो हैरान होकर उसी की तरफ देख रहा था। वह भी अपलक उसकी तरफ देखती ही रह गई थी। इससे पहले उसने उसे कभी नहीं देखा था। वह जो भी था उसमें कुछ तो था जो वह उसे देखते ही रह गयी थी। इसी तरह कुछ पल बीत गये, तभी मां की आवाज़ से वह सचेत हुई।
अरे प्रिया, तूं आज इतनी जल्दी कैसे आ गई, इनसे मिलो ये दिव्यांश हैं। नेहा इनके साथ ही आई है, तेरे जीजाजी को अचानक कुछ काम आ गया था। ये भी दिल्ली आ रहे थे तो उन्होंने नेहा को इनके साथ भेज दिया। इनके परिवार से उनका वर्षों से मेलजोल है।
प्रिया ने हाथ जोड़ कर नमस्ते कहा तो दिव्यांश ने भी मुस्कुरा कर दोनों हाथ जोड़ दिए ढ्ढ माँ ने आगे कहना शुरू किया। इनका दाख़िला दिल्ली में ही हुआ है। अब यहीं कालेज में एम. बी. ए. में एडमीशन लिया है।
प्रिया ने झट से नमस्ते कहा और ‘नेहा से मिल लूं’ कह कर अंदर भाग गई। मोना को गोदी में उठा कर उसके साथ खेलने लगी। मोना बहुत ही प्यारी गुडिया सी थी वह बार बार उसे उठाती, गले लगाती, कभी उसके छोटे छोटे हाथों को सहलाती। बिच बीच में नेहा से भी बात करती जाती। वह बहुत ही खुश थी।
माँ ने तब तक हाल में नाश्ता लगा दिया था और आवाज़ लगा कर नेहा और उसे आने के लियी कह रही थीं। सब ने बैठ कर एक साथ नाश्ता किया।
इस दौरान दिव्यांश बार बार उसी की तरफ देखे जा रहा था और नजर मिलते ही दूसरी तरफ देखने लगता। प्रिया भी उसकी ओर देखती तो हरबार उसे अपनी ओर ही देखता पाती। प्रिया को उसका यूँ देखना अच्छा लग रहा था। वह भी बीच बीच में उसे देख लेती थी।
चाय के बाद दिव्यांश सबसे विदा ले कर अपने भाई के घर चला गया। मां ने उसे बडे प्यार से आते रहने का निमंत्रण भी दे दिया जो उसने अवश्य कह कर स्वीकार भी कर लिया। सारा दिन यूं ही बीत गया। नन्हीं मोना के साथ कब समय बीत गया पता ही नहीं चला।
अगले दिन सुबह तैयार हो कर वह कालेज के लिये निकल पड़ी। कालेज में घुसते ही उसकी नजर दिव्यांश पर पड़ी जो अपनी गाड़ी पार्क कर कालेज के दफ़्तर की ओर जा रहा था। उसका दिल किसी अज्ञात कारण से जोरों से धडकने लगा और हाथ कांपने से लगे उसे नहीं पता था की दिव्यांश ने उसके ही कालेज में एडमिशन लिया है।
प्रिया ने भी जल्दी से अपना स्कूटर खड़ा किया और अपनी क्लास की तरफ तेजी से चल पड़ी। अभी वह दो कदम ही चली होगी कि पीछे से आवाज़ आई ‘अरे प्रिया जी आप’? मुड़ कर देखा तो सामने दिव्यांश खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसने हैरानी दिखाते हुये पूछा आप भी इसी कालेज में पढ़ती हैं? ‘जी मैंने भी इसी साल ही बी.ए. इंग्लिश ओनर्स में एडमिशन लिया है ने कहा और आप?’
दिव्यांश ने बताया कि उसने इसी वर्ष एम. बी. ए. में एडमिशन लिया है। मेरी क्लास है कह कर प्रिया संकुचाते हुए चली गई, पर रह रह कर उसे कुछ गुदगुदी सी हो रही थी। वह बहुत खुश थी। अब तो क्या था, वे दोनो रोज ही मिल जाते थे, धीरे धीरे दोस्ती बढने लगी खाली पिरिएड में दोनों कैंटीन में मिल जाते थे।इकट्ठे खाना खाते, घूमने निकल जाते कब यह दोस्ती प्यार में बदल गई दोनों को पता ही नहीं चला। समय तेजी से बढता गया। इस बीच दिव्यांश प्रिया के घर भी आता जाता रहता था, रविवार को वह कभी कभी खाना भी उनके घर में ही खाता था। प्रिया की मां को वह अब मां ही बुलाने लगा था।
समय बीतता गया। दो वर्ष चुटकियों में बीत गए। फाइनल से पहले ही उसे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से अच्छा ऑफर भी मिल गया पर उसे बंगलौर में नियुक्ति मिली थी। दिव्यांश का एम. बी. ए. पूरा हो गया था। उसका जाने का समय आ गया था। प्रिया अब फ़ाइनल वर्ष में थी। पर अभी प्रिया को भी दिव्यांश की नई नौकरी के बारे में पता नहीं था।
एक दिन जब प्रिया और वह केंटीन में लंच कर रहे थे तो दिव्यांश ने धीरे से प्रिया से यह बात कही। उसके अनेक कंपनियों में आजकल साक्षात्कार हो रहे थे यह प्रिया जानती थी पर उसे बंगलौर में नियुक्ति के बारे में पता न था। वह हतप्रभ सी रह गयी और दिव्यांश की और भरी आंखों से देखने लगी। दिव्यांश ने उसकी और देखते हुए बड़े प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा चिंता की कोई बात नहीं मैं मां से जल्द ही बात करूंगा अगले सप्ताह मैं घर जा रहा हूं।
दिव्यांश के पिता-किशोरीलाल जी कानपुर के मशहूर रईस थे। उनका बिरादरी में बड़ा ऊंचा नाम था। इस बात का उन्हें बहुत अभिमान भी था। उनका बड़ा बेटा दिल्ली में ही रहता था और वहीँ पर पारिवारिक व्यवसाय को संभालता था। उसका विवाह पिछले वर्ष ही उन्होंने एक उद्यमी परिवार की बेटी के साथ बड़ी धूमधाम से किया था। वे दिव्यांश की शादी किसी धनी व्यवसायी परिवार में करने के इच्छुक थे, यह बात दिव्यांश को भी पता थी।
दिव्यांश का परिवार कानपुर के प्रतिष्ठित परिवारों से था। उनकी अनेक मिलें इत्यादि थी। दिव्यांश अपने माता पिता की लाडली संतान था। शहर के बीचों बीच उनका आलीशान बंगला था। सत्येंद्र जी के परिवार के साथ उनके अच्छे संबंध थे।
दिव्यांश बहुत परेशान सा रहने लगा था। पर उसने यह बात प्रिया से नहीं कही थी। मां बाप के कहने पर वह लड़कियाँ देखने भी चला जाता था पर उसके मन में तो प्रिया ही समाई थी।
आख़िर एक दिन उसने अपनी मां से प्रिया के बारे में बात करने का निर्णय किया। मां ने सारी बात सुनकर कहा ठीक है मैं तुम्हारे पापा से बात कर के देखती हूं । मां ने पिताजी को जब प्रिया और दिव्यांश के बारे में बताया तो वे बोले, ठीक है एक बार लड़की वालों से भी बात कर लेते हैं, उन्हें बुलवा लो, एक बार मिल लेते हैं, बेटे की भी बात रह जाएगी ।
प्रिया के पिताजी रमाकांत जी सरकारी नौकरी में उच्च पद पर आसीन थे । वे अपनी ईमानदारी के लिये पूरे विभाग में मशहूर थे। अपना खुद का घर था जो हाउसिंग लोन लेकर पांच साल पहले ही बनवाया था। दो बेटियाँ थी- नेहा और प्रिया और एक छोटा बेटा था नेहुल, जो अभी दसवीं कक्षा मे पढ़ता था। दो वर्ष पहले ही उन्होंने अपनी बडी बेटी की शादी सतेन्द्र जी से की थी। सत्येंद्र जी का परिवार उनका परिचित था। उन्होंने माँग कर नेहा का रिश्ता लिया था। उनकी कोई मांग नहीं थी, शादी के बाद भी नेहा को बड़े अच्छे से रखा था और दोनों परिवारों में मधुर सम्बन्ध थे।
दूसरी बेटी के लिये भी दिव्यांश के परिवार की और से बुलावा आया तो उनका खुश होना स्वाभाविक ही था, वे बहुत ही सरल ह्रदय और स्पष्ट वादी व्यक्ति थे। जब प्रिया के लिए अच्छे संबंध का आभास हुआ तो पूरे परिवार में ख़ुशी की लहर सी दौड़ गयी। नेहा और सतेंदर जी ने दिव्यांश के घर वालों से मिलकर मुलाक़ात प्रबंध का कर लिया। तय कार्यक्रम के अनुसार अगले ही रविवार को कानपूर में ही एक स्थानीय होटल में मुलाक़ात का प्रबंध कर लिया गया था।
प्रिया ने दिव्यांश के पसंद के रंग का सुंदर सूट पहन रखा था। उसे देखते ही दिव्यांश का चेहरा खिल उठा। प्रिया ने हाथ जोड़ कर दिव्यांश के माता पिता का बड़े आदर से अभिवादन किया। उसके पिताजी व माताजी भी दिव्यांश के माता पिता से बड़े स्नेह से मिले। प्रारंभिक औपचारिकता के बाद सभी बैठ कर बातचीत करने लगे । प्रिया बहुत खुश थी, उसका चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था प्रिया वह शर्मा भी रही थी और नज़रें झुका कर बैठी थी।
दिव्यांश की मां उससे जो भी पूछती वह धीरे से बड़े प्यार से जवाब दे रही थी । चाय नाश्ते के बाद दिव्यांश के पिताजी प्रिया के पिताजी के साथ लॉन की तरफ निकल गये। दिव्यांश की मां प्रिया से बातें करने लगी। दिव्यांश मुस्कुराता हुआ उन्हें देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसके पिताजी वापस लौट आये । उनका चेहरा तमतमाया सा था। आते ही बोले चलो देर हो रही है, मुझे कुछ काम है। सब हैरान होकर एक दूसरे का मुंह देखने लगे, पर वे रुके नहीं और आगे बढ़ गए ।
अब तक प्रिया के पिताजी भी आकर पीछे खडे हो गये थे। वे बहुत परेशान दिख रहे थे। दिव्यांश और उसकी मां उठे और औपचारिक सी नमस्ते कहकर पिताजी के पीछे पीछे चल दिये । दिव्यांश ने लाचार सी निगाहों से प्रिया की ओर देखा और मुड़ कर अपने पिताजी के पीछे चला गया। प्रिया के पिताजी कुर्सी पर हताश से बैठ गये। उन्हें बहुत पसीना आ रहा था। नेहा ने टेबल से पानी का गिलास उनकी और बढ़ा दिया। दो घूंट पानी पीकर वे थोडा सा समान्य हुए तो उन्होंने बताया कि दिव्यांश के पिताजी ने उनसे पूछा कि उनका शादी का कितना बजट है। इस पर वे बोले ‘हम तो नौकरी पेशे वाले लोग हैं बच्चे पढा दिये हैं, यही हमारी पूंजी हैं’। आपको हम अपनी जान का टुकड़ा सौंप रहे हैं और हमारी सामर्थ्य अनुसार आपकी अच्छे से ख़ातिरदारी, सत्कार करेंगे।’
इस पर दिव्यांश के पिताजी बोले’ ठीक है हमारे क़रीब पचास साठ रिश्तेदार बाहर से आयेंगे, उनके लिये आप पांच सितारा होटल में रहने का इंतज़ाम करवा दीजियेगा।’ आखिर हमारी भी तो इज्ज़त का सवाल है। यह सुन कर प्रिया के पिताजी उनका मुख देखते रह गए और बोले किशोरीलाल जी मैं तो इतना खर्च उठाने की सामर्थ्य नहीं रखता। इस पर वे बोले अरे इतना तो हर कोई ही आजकल करता ही है। बिरादरी में नाक भी तो बचानी है हमें, हम आप से कोई दहेज़ तो माँग ही नहीं रहे, इतना तो आपको करना ही पड़ेगा ।
यह सुनकर प्रिया के पापा ने कहा, कृपया आप हमें माफ़ कर दें। यह तो शायद हम नहीं कर पायेंगे’। शादी एक पावन सम्बन्ध हैं इसे पैसों में तौलना हमें पसंद नहीं । मेरी बेटी है, मुझे जान से भी ज्यादा प्यारी है । उसे हमने अच्छी तालीम दी है संस्कार दिए है, उसे पालपोस कर आपको सौंप रहे हैं, आपको इस बात का मान करना चाहिए। इतना सुनना था कि दिव्यांश के पिताजी नाराज़ हो गये और वापस चले आये। प्रिया को यह बात सुन कर बहुत दुख हुआ और उसे पहली बार अपना लड़की होना अभिशाप सा लगा। उसके कारण आज उसके पिताजी को कितना कष्ट हुआ। इस पर प्रिया ने अपने घर में सबसे कह दिया कि अब दिव्यांश के बारे में कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वो अब अपने पिता और अपने परिवार को और कष्ट नहीं दे सकती। घर में उदासी छा गयी। सभी बिना खाये ही सो गए। अगले दिन सुबह ही उन्हें दिल्ली के लिए निकलना जो था।

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