नादानी-अम्बिका कुमार शर्मा

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मैं हूँ जावेद शर्मा, एक सफेद चूहा, इस कहानी के लेखक शर्मा जी मेरे साथ ही घर मे रहते है। घर मे मुझे सभी लोग बहुत चाहते है। पाँच माह पहले मैं और सोना चुहिया एक साथ रहने आये थे मेरा पौरष देखिये अब हम चूहा प्रजाति के पंद्रह सदस्य हो गये है जबकि आपके प्रिय लेखक पहले भी छः थे आज भी छः ही है। भले ही हमारी जनसँख्या बढ़ गई हो लेकिन मेरे प्रति सबका स्नेह आज भी सबसे ज्यादा है।

इस घर मे मेरे लिये माता पिता के रूप में आपके लेखक और उनकी पत्नी, भाई बहन और चाचा के रूप में उनके बच्चे और भाई सभी हमे बहुत चाहते है परन्तु मुझे सबसे ज्यादा, जब भी कोई इस घर मे फुरसत में होगा मुझे अपने हाथों में लेकर मुझसे बाते करेगा, मैं उत्तर तो नही दे पाता लेकिन ये तो समझ ही लेता हूँ कि ये उनकी स्नेह की भाषा है।

सबको मेरा खुश होकर उचक कर चलना बहुत प्रिय है, मैं भी इन्हें उचक कर दिख देता सब खुश हो जाते है, मुझे भी लगता मैं ज्यादा कुछ तो इन्हें नही दे सकता लेकिन अगर मेरे साथ कुछ पल के लिये ये सब अपने अपने तनाव भूल जाते है तो यही मेरी बड़ी उपलब्धि है।

मुझे नींद बहुत आती है मेरे बच्चे मेरी नींद न खराब कर दे इसलिये मैं अपने बच्चो से दूर एक बड़े कमरे में कभी पर्दे के पीछे, कभी सोफे या बेड के नीचे सो जाता हूँ, इस नींद के चक्कर मे मैं भूख तक भूल जाता हूँ और मेरे बड़े मुझे ढूढ कर जगा कर अपने हाथ मे लेकर मुझे खाना खिलाते है, फिर बोलेंगे “जावेद अंगड़ाई लो” सो कर उठा होता हूँ तो अंगड़ाई लेता ही हूँ, मेरी अंगड़ाई देख सब खुश हो उठते है सब को खुश होते देख मैं भी मन ही मन खुश हो जाता हूँ।

इतने प्यार स्नेह के बाबजूद मुझे इन बड़ो की एक बात बहुत बुरी लगती है ये कभी मुझे घर से बाहर नही निकलने देते, मैंने कई बार खुले दरवाजे से झाक कर देखा है बाहर बरामदे की हरियाली, सामने नीला आकाश, खुली हवा सब बहुत अच्छा लगता है। चूहा हूँ तो क्या हुआ आजादी तो मुझे भी चाहिये, मुझे भी तो देखना है नीला अम्बर, मुझे भी तो खुले बातावरण की ताजी हवा में सांस लेने का अधिकार है। जब भी मैं दरवाजा खुला देखता बाहर की ओर भाग पड़ता लेकिन कोई न कोई मेरा बड़ा मुझे उठा कर भीतर ले आएगा और दरवाजे बंद कर देगा, मुझे बहुत गुस्सा आता इस बात पर, लेकिन करू क्या चूहा हूँ न।

एक रात की बात है मेरे कमरे में बहुत ठंड लग रही थी बड़ो ने एसी चला रखा था, मैं ठंड के कारण सिकुड़ा हुआ लेटा था, मेरी माँ समान आपके लेखक पत्नी ने मुझे गोल सिकुड़ा हुआ देखा और उन्हें मुझ पर दया आ गई, उन्होंने मुझे उठाया थोड़ी देर स्नेह से मेरे ऊपर हाथ फेरा और फिर मुझे आंगन में छोड़ आई कि जावेद को छीक आ रही है कही ठंड न खा जाये।

मैं अकेला आंगन में घूमता रहा मेरे सारे परिजन चूहे दूसरे कमरे में थे और दरवाजा बंद था, अकेला था क्या करूँ कुछ समझ नही आया मैं घूमते घूमते आंगन में बनी सीढ़ियों के पास चला गया, सीढ़िया चढ़ना मेरे लिये सरल लगा, मैं सीढ़िया चढ़ने लगा मैं जीवन मे पहली बार सीढी चढ़ा होऊंगा, चढ़ता गया और चढ़ते चढ़ते छत तक आ गया छत के दरवाजे बंद थे जिनसे सांसे दिख रहे थे जिनसे मैं चूहा आसानी से निकल सकता था, तभी मुझे ध्यान आया घर के सभी बड़े मुझे बाहर जाने से मना करते है, मुझे नही जाना चाहिये, लेकिन मैंने सोंचा चूहा हूँ तो क्या बड़ा तो हो गया हूँ कब तक घर बालो की सुनता रहूँगा और मैं दरवाजे के बीच के गैप से बाहर आ गया।

वाह खुला सा आकाश तारे चंद्रमा ताजी खुली हवा सब मेरे है मैंने गहरी सी साँस ली, अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर आजादी को महसूस किया। वाह वाह क्या नजारा है मुझे अपने बड़ो पर गुस्सा आ रहा था क्यो मुझे अभी तक इस सुहाने नजारे को देखने से बंचित कर रखा था।

इतनी बड़ी छत मैं खुशी से उछला और उछलते हुये पूरी छत में दौड़ने लगा। अचानक सामने जाने कहाँ से बड़ी सी बिल्ली आ गई उसकी चमकती आंखे कह रही थी अब मेरी खैर नही, मैं तेजी से भागा, बिल्ली मेरे पीछे, अब लगा छत सच मे बहुत बड़ी थी बिल्ली किसी भी पल मुझे पकड़ सकती थी। मुझे लगा मैं पल दो पल का ही मेहमान हूँ। सामने बाथरूम दिखा जिसकी नाली का पाइप थोड़ा खुला था मैं अपनी जान बचाने उसी पाइप में घुस गया बिल्ली मेरे ऊपर कूदी उसका पंजा मेरी पूंछ पर पड़ा लेकिन मेरी गति इतनी तेज थी कि मैं बच गया।

मेरी धड़कन तेज थी सांसे फूली हुई किसी तरह मैं अपनी जान बचा कर बाथरूम में छिप गया।

यह कहानी मैं उन बच्चों के लिये बता रहा हूँ जो अपने बड़ो की बात नही मानते और अपनी मनमानी करते है और बाद में पछताते है।

बिल्ली अभी भी बाथरूम के बाहर खड़ी थी मैं उसकी गंध से समझ रहा था। वो तो ये कहिये की बाथरूम का दरवाजा बंद था और मैं सुरक्षित।

ईश्वर की कृपा कि पानी बरसने लगा बिल्ली मुझे अपना आहार बनाने की आशा छोड़ चली गई मैं रात भर बाथरूम में डरा हुआ पड़ा रहा।

सुबह हुई मैंने नाली से झांक कर देखा रोशनी दिखी कोई खतरे के चिन्ह नही दिखे। मैं बाहर निकला मैं फिर से आजाद था कोई डर नही मैं फिर से छत में घूमने लगा।

संकट तो आसमान से भी आ सकता है ये तो सोंच ही नही, एक कौआ तेजी से उड़ता हुआ आया मुझे उठाने उसकी पकड़ ढीली थी कि मैं उसके पंजो से बच गया। कौवा ऊपर उड़ कर दुबारा फि मेरी ओर लपका मैं फिर बाथरूम की तरफ भागा, ये क्या बाथरूम के सामने पाइप के ऊपर वही कल बाली बिल्ली बैठी थी।

अब??

आसमान से नाचती मौत सामने बैठी मौत, कहाँ जाऊ?

छत में तीस पैंतीस गमले रखे थे, मैं गमलों की ओर भागा कौवे ने मेरे भागते भागते एक कोशिश फिर की, लेकिन मेरी तो जान पर बनी थी मैं बच कर भाग निकला गमलों के बीच छिपने ही जा रहा था, सामने से नेवला आ गया वो भी मेरी ओर लपका मैं फुर्ती के साथ गमलों के बीच छिप गया।

अब बिल्ली और कौवे से तो डर नही था लेकिन नेवला तो गमलों के बीच मुझे ढूढ रहा था। गमलों से बाहर आता तो कौवा और बिल्ली के रूप में मौत बैठी थी और गमले के बीच मे नेवले के रूप में मौत मुझे ढूढ रही थी।

मुझे विविध रूप में ईश्वर याद आ रहे थे, अक्सर मैं अपने पिता रूपी शर्मा जी के साथ, उनकी पूजा में बैठा करता था, काश कुछ स्त्रोत ही सीख लिये होते तो आज काम आ जाते और ईश्वर से अपनी रक्षा की प्रार्थना कर लेता।

ईश्वर बहुत दयालु है, मेरी भावना पढ़ ली उसने मैं गमलों के बीच ऐसे फसा था कि नेवला मुझसे कुछ इंचों की दूरी में था और मोटा होने के कारण मुझ तक नही पहुच पाया, मैं आंखे बंद किये भयभीत बैठा था।

“जावेद जावेद” पुकारते हुये मेरे चाचा और बड़े भाई मुझे ढूढ रहे थे, काश मैं चिल्ला कर कह पाता कि मैं गमलों के बीच मे हूँ, मैं तो बाहर भी नही निकल सकता था क्यो की कुछ इंच की ही दूरी पर नेवला मुझे खाने को बैठा था।

चाचा और बड़े भैया सब मुझे ढूढ कर वापस चले गये मैं फिर भयभीत से मौत की प्रतीक्षा कर रहा था।

मुझे अपनी गलती का अहसास हो रहा था मेरे बड़े मेरी चिंता में परेशान, मैं भूखा और मौत के सामने बैठा था केवल अपनी एक गलती के कारण। रात में पानी गिरा था दिन में तेज धूप थी। धीरे धीरे दिन बीत गया।

मैंने कसम खा ली अब मैं अपने बड़ो की बात मानूँगा बस किसी तरह बच जाऊ।

नेवला बिल्ली और कौवा तीनो मुझे अपना आहार बनाने को बैठे थे। शाम हो गई और मेरी दीदी गमलों को पानी देने छत पर आई उसके साथ ही मेरे भैया भी “जावेद जावेद” पुकारते मुझे ढूढ रहे थे बिल्ली और कौवा दोनों भाग गए उन्हें देख कर। दीदी गमलों के पास आई तो नेवला भी डर कर भाग गया।

मैं निर्भय हो गमलों के बीच से बाहर आ गया। भैया ने मुझे देखा खुशी से चीखे “जावेद मिल गया”

भैया मुझे उठाये खुशी से चिल्लाते हुये छत से नीचे आ गये। अब क्या था मेरी माँ स्वरूपा मुझे हाथ मे लिये दुलारती रही। मैं पूरे दिन का भूखा मुझे जल्दी से खाना दिया गया। मैं जानवर हूँ तो क्या भावनाये तो मैं भी समझता हूँ, मेरी बजह से सब कितना परेशान थे और मैं खुद भी कितने बड़े संकट में फंस गया था।

माता पिता की छात्र छाया जब तक बनी रहे बच्चे बहुत सुखी रहते है उनके कष्ट तब शुरू होते है जब बच्चो को लगने लगता है कि वो अपने माँ बाप से भी ज्यादा समझदार हो गये है।

इस जावेद चूहे की सीख याद रखियेगा।

मौलिक कहानी स्वरचित

अम्बिका कुमार शर्मा( राजा)

अमृतनगर कॉलोनी, गांधीनगर महोबा

 

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