अस्पताल में ही मुलाकात हुई दोनों की। डॉक्टरी जाँच कराने आए थे दोनों। सुमि बेइंतहा चीख रही थी शायद दर्द था उसे।और अलोक कातर निग़ाहों से उस वार्ड को देख रहा था। चेहरे पर दर्द झलक रहा था उसके भी। रुई के फाहे को हाथ से दबाए सुमि बाहर निकल रही थी।

अंजान थी अलोक और उसके दर्द और प्रतिक्रिया से भी। यह रोज का सिलसिला था। अब अक्सर दोनों एक दूसरे से टकराते उसी वार्ड के पास। नज़रे मिलती और अपनी अपनी राह। उम्र महज २८ से३० साल।

और एक दिन बातचीत भी हल्की फुलकी।

सघन चिकित्सा वार्ड(कैंसर यूनिट)

बेहोशी की हालत में सुमि को एडमिट कराना पड़ा।लास्ट स्टेज कैंसर डिटेक्ट हुआ था और कीमोथेरेपी के लिए हिदायतें दी गई थी। सुबह अलोक और सुमि का आमना सामना और दोनों को भी एक दूसरे से पूछने की जरूरत नही पड़ी की हुआ क्या हैं।दोनों ही लाइलाज़ बीमारी से लड़ रहे थे।

रोज का दर्द रोज की आह और रोज जाँचे दिन गुज़र रहे थे जिंदगी की साँसे चल रही थी।

गर्मी और दर्द से बुरा हाल था सुमि का उठने की जद्दोज़हद पर आँखो की भाषा काम कर गई।अलोक उसे पानी पिलाता हुआ देखो तुम जल्दी ठीक हो जाओगी बस हिम्मत मत हारना मेरी तरह।जानती हो मै दो साल से इसे मात दे रहा हूँ।so be brave👍

मौन अभिव्यक्ति के ज़रिए दोनों एक दूसरे से जुड़ते चले गए। दोनों एक दूसरे के दर्द को बेहतर जानते थे और दोनों जानते थे हासिल कुछ नही होना मामला आर या पार का हैं। दोनों खुब बाते करते एक दूसरे के दर्द को समझते दिलासा देते।चूँकि दोनों का रिश्ता ही दर्द से था।

और एक दिन अलोक अपने दर्द को मात नही दे पाया चल बसा ।। be brave कहने वाला खुद जँग हार गया दर्द जीत गया था अलोक अंतिम सफ़र पर दूर ….. सुमि से और हर रिश्तें से ।

सुमि भी हार मान चुकी थी।और वह भी एक हफ़्ते बाद सबको अलविदा कह चल बसी उस दुनियाँ में जहाँ एक  दर्द का रिश्ता।उसका इंतज़ार कर रहा था।

.

डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय www.socialsandesh.in के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों .कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और social sandesh की उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं है ।

सभी चित्र गूगल से लिया गया है

Loading Facebook Comments ...

LEAVE A REPLY