बहू नहीं बेटी हो हमारी-मुकेश कुमार

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सिमरन कॉमर्स से ग्रेजुएट थी, वह एक कंपनी में अकाउंटेंट  की जॉब भी करती थी। वह एक खुले विचार की लड़की थी। पुरानी मान्यताओं  और कुप्रथाओं का हमेशा विरोध करती थी। उसकी नजर में लड़का और लड़की दोनों में कोई अंतर नहीं था।  शारीरिक रूप से भले ही लड़का और लड़की दोनों अलग-अलग हैं लेकिन लड़कियां भी तो हर काम कर सकती है जो एक लड़का करता है उसे ऐसा मानना था।  

उसकी माँ कभी भी उसको जॉब के लिए सपोर्ट नहीं करती थी उनका कहना था लड़की हो जॉब करके क्या करोगी कुछ दिनों बाद तुम्हारी शादी होगी और अपने ससुराल चली जाओगी।  

लेकिन उसके पापा महिपाल जी हमेशा अपनी बेटी को सपोर्ट करते थे उसे जो इच्छा होती थी  वह पूरा कर देते थे। इस बात को लेकर सिमरन की मां और उनके पापा में अक्सर कहा सुनी हो जाती थी।  देखो जी तुम सिमरन को ज्यादा ही सपोर्ट करके उसका मन बढ़ा रहे हो आखिर जाना तो उसे एक दिन ससुराल ही है, और लड़कियों के तो भाग्य में ही कीचेन  की महारानी होना लिखा होता है।

अब बिटिया बड़ी हो गई थी इस वजह से शादी तो करना ही था, अब  लड़के की खोजबीन जारी हुई सिमरन के लिए कितने सारे लड़के देखे गए।  कभी लड़का सिमरन को नहीं पसंद आता तो कभी उसके पिताजी को तो कभी उसकी मां को।  फाइनली एक लड़का पसंद आया बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था अब उसके साथ दिक्कत यह थी कि उसके माता-पिता गांव में रहते थे,  लेकिन आखिर में सब ने यही डिसाइड किया माता पिता गांव में रहते हैं तो क्या हो गया लड़का तो बेंगलुरु में रहता है और शादी के बाद सिमरन को बेंगलुरु में ही तो रखेगा।

सिमरन बोली “मम्मी लेकिन कभी-कभी तो गांव जाना पड़ेगा”।  सिमरन की मां सीता जी बोली कि “देख सिमरन अगर तू हर लड़के में कोई ना कोई कमी ढूंढेगी तो कभी भी तुम्हारी शादी नहीं होने वाली अगर साल मे 10 दिन  गांव चली जाएगी तो कौन सा आफत आ जाएगा हम भी तो गर्मी की छुट्टियों में गांव जाते थे”।

आखिरकार सब को लड़का पसंद आया और सिमरन की शादी कैलाश से हो गई । क्योंकि लड़के वाले गांव में रहते थे इस वजह से सिमरन की शादी गांव से ही करनी पड़ी। शादी के 10 दिन बाद ही कैलाश वापस बेंगलुरु चला गया सिमरन से यह बोला कि सिमरन मैं बहुत जल्दी तुझे बेंगलुरु ले चलूंगा कुछ दिन तुम मम्मी पापा के साथ एडजस्ट कर लो।

वहां मैं सब कुछ ठीक करके तुम्हें बुला लूंगा।  ऐसा सुनते ही सिमरन को लगा कि उसके पंख की कट गए।  समझ में नहीं आ रहा था कि वह कैसे गांव में रहेगी क्योंकि वहां पर बिजली भी आती थी तो सिर्फ 4 या 5 घंटे के लिए बाकी दिन  गर्मी में बिताना इतना मुश्किल था। सिमरन को लगा था वह शादी के कुछ दिन ही वहां पर रहेगी फिर कैलाश के साथ वापस बेंगलुरु आ जाएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपने आप को इस  गांव में मैनेज करें।

 वह परेशान होकर अपनी मां से बोली मम्मी जब तक कैलाश हमें बेंगलुरु नहीं ले जाते हैं तब तक आप ही दिल्ली बुला लो मुझे।  सिमरन की मां ने कहा बेटी ऐसे कैसे बुला लें अभी तो तुम्हें ससुराल गए 10 दिन भी नहीं हुए कुछ दिन मैनेज करो बेटी बहुत जल्द तुम्हें हम बुला लेंगे।

सिमरन जितना  ही ओपन माइंड की थी, उसकी सास मंजू जी उतना ही पुराने ख्यालों की वह आज भी 18वीं सदी में जी रही थी।  दुनिया भले अब 4जी में जी रहा हो लेकिन मंजू जी अभी भी जीरो जी मे जी रही थी।

कैलाश जब तक था तब तक तो सिमरन को 10 दिन कैसे बीता बिल्कुल ही पता ही नहीं चला क्योंकि कैलाश एक हंसमुख लड़का था उसे मजाक करने की बहुत आदत थी और जहां भी होता था उनको हंसाता रहता था उसका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा था।  10 दिनों में ही कैलाश ने सिमरन को अपना दीवाना बना लिया था।

कैलाश को बंगलुरु जाते ही उसकी सांस मंजू जी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था।  रोजाना की तरह आज भी सिमरन 8:00 बजे सो कर उठी। वह अपने कमरे से जैसे ही बाहर निकली मंजू जी ने अपना भाषण शुरु कर दिया था, “बहु यह तुम्हारा मायका नहीं बल्कि ससुराल है, 8:00 बजे तक सो कर उठना बहू के लक्षण नहीं है तुम्हें चाहिए कि 6:00 बजे उठ कर नहा धोकर पूरे घर की सफाई करो और उसके बाद सबके लिए नाश्ता बना दो हमारे घर में 8:00 बजे तक सब लोग नाश्ता कर लेते हैं अगर तुम 8:00 बजे सो कर ही उठा होगी तो बताओ हम नाश्ता कब करेंगे।”

मंजु जी ने सिमरन को यह भी बोला नाश्ता या खाना बनाने से पहले एक बार तो मुझसे पूछ जरूर लेना।

सिमरन ने सिर्फ इतना ही कहा की जी माँ जी  मैं खाना बनाने से पहले आप से पूछ लिया करूंगी।  

सिमरन की मां ने विदाई  होते वक्त सिमरन को यह बात बताई थी कि बेटी जहां जा रही हो वह तुम्हारा मायका नहीं है बल्कि ससुराल है और अपने सास की बातों को कभी भी जवाब मत देना थोड़ा बहुत तो तुम्हें ससुराल में  समझौता करना ही पड़ेगा तुम चाहोगी कि मायके का सुख ससुराल में मिले यह तो मुमकिन नहीं है। बस यही सोचकर सिमरन ने अपनी सास को कुछ नहीं कहा।

सिमरन अपने कपड़े अक्सर छत के ऊपर ही सूखाती  थी, एक दिन सुबह सुबह मंजू जी छत के ऊपर चली गई उसके बाद छत के ऊपर से ही बहू को आवाज देना शुरू किया “सिमरन सिमरन जल्दी से ऊपर आओ।”  सिमरन दौड़कर छत के ऊपर गई उसे लगा पता नहीं क्या हो गया है।

मंजू जी ने सिमरन के अंडर गारमेंट्स दिखाते हुए बोली बहू तुम्हें बिल्कुल ही शर्म नाम की चीज नहीं है क्या।  सिमरन बोली क्या हो गया माँ जी ऐसा क्या कर दिया मैंने। मंजू जी ने बोला यह कपड़े कोई ऐसी सूखते हैं क्या कोई देखेगा तो क्या सोचेगा इसे हमेशा कपड़े के अंदर ढँक कर  सुखाया करो।

यह बात सिमरन को बिल्कुल ही अजीब लगी लेकिन उसने कुछ नहीं बोला बस इतना ही कहा ठीक है मां  कल से इसे मैं ढँक कर ही सूखाउंगी।

सिमरन की सास मंजू जी  एक भी मौका नहीं छोड़ती थी बहू को ताने मारने की,  एक छोटी सी गलती क्या हो जाती थी सिमरन से उनका बस यही कहना होता था तुम्हारे मां बाप ने कुछ सिखाया नहीं है क्या।

एक  दिन खाने में थोड़ा सा नमक कम हो गया था इसके लिए मंजू जी ने सिमरन को इतना डांटा सिमरन रोने लग गई,”तुम्हें खाना नहीं बनाने आता है तो छोड़ दो कल से मैं ही  खाना बना लूंगी पता नहीं तुम्हारी मां ने क्या सिखाया है. बस बेटी पढ़ा देने से कुछ नहीं होता है तुम्हारे मां-बाप को यह भी समझना चाहिए था कि बेटी ससुराल में जाएगी तो कोई महारानी नहीं बन के जाएगी  घर के काम तो करने ही पड़ते हैं इतना तो तुम्हारे मां-बाप को सीखा कर भेजना चाहिए था।

सिमरन के ससुर बड़े  ही अच्छे नेचर के थे।  वह हमेशा सिमरन का सपोर्ट करते थे  हमेशा अकेले में सिमरन को कहा करते थे तुम अपनी सास की बातों को दिल से मत लो उसकी तो आदत है ऐसा करना मैं तो देख ही रही हो 30 सालों से उनको बर्दाश्त कर रहा हूं अब तुम भी धीरे-धीरे बर्दाश्त करना सीख लो।

सिमरन के ससुर ने मंजू जी को अकेले में समझा रहे थे कि मंजू तुम भी कुछ ज्यादा ही बहू पर गुस्सा हो जाती हो अगर नमक थोड़ा कम था तो प्यार से मांग ले कि बहू थोड़ा नमक दे दो लेकिन तुम्हें तो बात का बतंगड़ बनाने की आदत है बच्ची है धीरे-धीरे सब जान जाएगी उसने कौन सी खाना बनाया है अपनी ही बेटी का देख लो वह क्या यहां पर कभी खाना बनाती है लेकिन वह अपने ससुराल में जाकर सब कुछ धीरे-धीरे मैंनेज कर लिया या नहीं ऐसे ही यह भी धीरे-धीरे मैनेज कर लेगी।

सिमरन का मन अब  बिल्कुल ही गांव में नहीं लग रहा था वह अक्सर फोन पर कैलाश से यही कहती थी कि कब ले जाओगे मुझे बेंगलुरु अगर नहीं ले जा सकते हो तो मुझे मेरे मायके पहुंचा दो। करते-करते महीने-दो महीने बीत गए लेकिन कैलाश उसे बस टालता रहता था बोलता था अगले महीने ले जाऊंगा अगले महीने ले जाऊंगा सिमरन का बिल्कुल ही अब  किसी कम में मन नहीं लगता था,

वह सोचीं टाइमपास के लिए क्यों ना घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ा देती हूं कम से कम मेरा टाइम पास तो हो जाएगा।  वह इस बात का जिक्र अपने सास मंजू जी से की मैं ट्यूशन पढ़ाना चाहती हूं। इतना सुनते ही मंजू जी आग बबूला हो गई।  बहु तुम्हें कोई चीज की कमी है क्या जो तुम ट्यूशन पढ़ाओगी लोग क्या कहेंगे नई बहू से अभी दो महीना भी नहीं हुआ काम कराने लगे।  फालतू के बातें अपने दिमाग से निकाल लो तुम्हें तो घर की इज्जत की चिंता है नहीं।

सिमरन अपना मन मार कर इस बात को अपने मन में ही दबा दी।  सिमरन को हमेशा यही लगता था कि वह शादी करके अपने ससुराल में नहीं बल्कि किसी सेंट्रल जेल में बंद हो गई है जहां पर हमेशा जेलर की नजर कैदियों पर रहती है।

सिमरन शादी से पहले एक ओपन और खुले विचारों वाली लड़की थी जिसके सपने चांद छूने के थे पर हमारे देश में लड़कियों का संस्कार तो बस यही होता है शादी के बाद कुछ भी मत बोलो चाहे ससुराल में कितना भी दुख  क्यों ना हो अगर कुछ बहु बोलती है तो सीधे कहा जाता है इसकी मां बाप ने पता नहीं क्या शिक्षा दिया था क्यों ऐसा कर रही है बस यही सब सोचते सिमरन चुप हो जाती।

 

उसी समय कैलाश को फोन लगाया और कैलाश से बोला कि तुम मुझे यह बताओ बेंगलुरु ले चलते हो या नहीं।  कैलाश बोला कि अगले महीने के 7 तारीख को हमने टिकट करा दिया है वापसी का बस तुम्हें और 17 दिन गुजारने हैं।

सिमरन को ऐसा लगता था कि यह 17 दिन 17 साल हो गए हो।  उसका मन बिल्कुल भी गांव में नहीं लगता था वह शहर में जाकर खुद भी कुछ करना चाहती थी उसने अपनी पढ़ाई इसलिए नहीं की थी कि बस अपनी जिंदगी खाना बनाने और किचन में गुजार देगी।

5 तारीख को कैलाश  गांव आया और उसने अपनी मां से सिमरन को बेंगलुरु ले जाने के लिए बात की उसने बताया कि माँ मुझे वहां खाना बनाने में बहुत दिक्कत होता है ऑफिस का टाइम भी कभी लेट हो जाता है इस वजह से सिमरन को साथ रखना जरूरी है।

फिर सिमरन भी कोई गांव की तो है नहीं शहर की रहने वाली है यहां पर भी उसका मन नहीं लगता है शहर में जाएगी तो यह भी कुछ कर लेगी।   मंजू जी बोली हां बेटा तुम्हारी शादी क्या हो गई तुम तो अभी से बहू के पल्लू से ही बंध गए हो। जिस बेटे को खून पसीना बहाकर इतने दिन से बड़ा किया आज वह बहू का पक्ष लेने लगा उसके सामने मां-बाप पराए हो गए हमें तो नहीं बोला कि मां पापा तुम भी चलो बेंगलुरु बस तुम्हें अपनी बीवी  की याद आ गयी ले जाने के लिए.

पढ़ लिखकर अच्छा सीख गए हो बेटा बस तुमसे यही उम्मीद थी।  बेचारा कैलाश उसकी जिंदगी तो ऐसा फंस गई थी कि वह समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें मां को खुश करे या  बीवी को।

वैसे तो मंजू जी भी बहुत ही तेज स्त्री थी उन्होंने भी ठान लिया था कि बहू को बेटे के साथ नहीं भेजना है तो नहीं भेजना है।  उनके जाने से 1 दिन पहले ही मंजू जी ने अपने सीने में दर्द होने का बहाना बनाया। और अपने बेटे से बोलने लगी बेटा तुम बहू को ले जाना चाहते हो तो बेशक ले जाओ कोई बात नहीं मां बाप तो बूढ़े हो जाने के बाद कूड़े हो जाते हैं। अब हमें कौन पूछता है हम मरे या जिए।  कैलाश के पिता जी ने भी कैलाश को बहू को कुछ दिन अभी यहीं रहने के लिए बोल दिया उन्हें भी नहीं पता था कि मंजू जी, बहू को नहीं भेजने के लिए नाटक कर रही हैं। बेचारा कैलाश इस इमोशनल ड्रामे में फंस गया और अपनी पत्नी सिमरन को बहुत मुश्किल से मनाया कि सिमरन सिर्फ 1 महीने की बात है मां जैसे ही ठीक हो जाएगी मैं तुम्हें वापस बेंगलुरु ले चलूंगा।  सिमरन बेचारी क्या करती आखिर उसे मानना ही था क्योंकि कैलाश की मां ने ऐसा नौटंकी ही रच दिया था।

कैलाश के जाने के एक महीने बाद ही पता चला कि सिमरन गर्भवती है। सिमरन सोचीं कि मैं अपने मायके चली जाऊंगी क्योंकि यहां पर अपने सास के बारे में तो उसे पता चल ही गया था उसकी वह सेवा नहीं कर पाएंगी।

उसी समय सिमरन के ननंद भी गर्भवती थी।  

उसके ननंद के ससुराल में कोई भी सेवा करने वाला नहीं था इस वजह से सिमरन के सास ने  उस को यहीं पर बुला लिया था। सिमरन अपनी सास मंजू जी से अपने मायके में जाने की बात बोली।  मंजू जी कहने लगी बहू अगर तुम अपने मायके चली जाओगी तो लोग यहां पर क्या कहेंगे कि मैंने अपनी बेटी को बुलाकर सेवा कर रही हूं और बहू को उसके मायके भेज दिया नहीं बहू नहीं जैसे मैं अपनी बेटी की सेवा करूंगी वैसे ही तुमको भी करूंगी।

सिमरन अपनी मां को फोन करके यह बात बताया उसकी सास मना कर रही है मायके भेजने से।  सिमरन की मां बोली बेटी वह तुम्हारा ससुराल है और वही तुम्हारा घर है अगर मंजू जी तैयार है तुम्हें करने के लिए तो तुम्हें कोई एतराज नहीं होना चाहिए और फिर अपने मन से तो तुम मायके तो नहीं आ जाओगी ना।

सिमरन दिन भर अकेली रहती थी उसकी ननद  भी सिमरन से सही से बात नहीं करती थी दोनों मां बेटी बस एक दूसरे में रहती थी।  सिमरन को लग रहा था कि कहां से वह इस जेल में बंद हो गई है कब मुक्ति मिलेगी उसे इस जेल से।

वह जान गई थी कि कैलाश से भी कुछ कहने का फायदा है नहीं वह भी अपने मां के विरोध में जाकर कुछ नहीं कर सकता है वह अपनी मां का लाडला जो है।

मंजू जी हमेशा अपने बहू और बेटी में भेद भेदभाव करती थीं। अगर बाजार से ड्राई फूड भी खरीद कर लाती थी तो दो तरह के ड्राई फूड खरीद कर लाती थी एक सस्ते वाला और एक महंगे वाला।

महंगे वाला अपनी बेटी को खिलाती थी और सस्ते वाला अपने बहू को।  शाम को अगर दूध भी देना होता था बहू के दूध में आधा पानी और आधा दूध होता था और अपनी बेटी को प्योर दूध पिलाती थी.  यह सब देख कर सिमरन के ससुर बहुत दुखी होते थे लेकिन उनकी भी इस घर में एक आने की भी नहीं चलती थी इसलिए वह सिर्फ चुपचाप मूकदर्शक बने रहते थे।

समय बीतता गया और आखिर वह दिन आ ही गया दोनों को एक ही हॉस्पिटल में भर्ती किया गया।  सिमरन को लड़की पैदा हुई और उसकी ननद को लड़का पैदा हुआ। इसके बाद तो मंजू जी ऐसे भड़के जैसे सिमरन ने लड़की पैदा करके कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।  छूटी मिलने के बाद दोनों को हॉस्पिटल से घर लाया गया। दिनभर मंजू जी अपने लड़की के ही बच्चे को गोद में लिए घूमती रहती थी।

सिमरन अपनी किस्मत को कोस रही थी शादी से पहले कैसी उसकी जिंदगी थी और शादी के बाद उसकी जिंदगी क्या बनकर रह गई।

सिमरन के साथ एक बात यह अच्छा था कि सिमरन के ससुर और उसके पति कैलाश कभी भी सिमरन के विरोध में नहीं होते थे बल्कि उसको सपोर्ट की करते थे।  सिमरन के ससुर ने सिमरन को हिम्मत दिया बेटी कोई बात नहीं। बेटी पैदा हुई तो क्या हो गया आजकल बेटियां तो वह काम करती हैं जो हमारे बेटे नहीं कर पाते हैं तुम्हें तो बल्कि गर्व होना चाहिए कि तुमने एक लक्ष्मी को पैदा किया है।  सच में उस दिन से सिमरन को गर्व महसूस होने लगा और उसने अपनी बेटी का नाम भी लक्ष्मी रखने को ही सोचा।

कुछ दिनों बाद ही कैलाश गांव आया और सिमरन को बेंगलुरु लेकर चला गया वहां पर सिमरन को और उसके बच्चे को देखभाल करने के लिए सिमरन ने अपनी मां को बेंगलुरु बुला लिया था।

बेंगलुरु आने के बाद ऐसा लग रहा था कि सिमरन के शरीर में पंख लग गए हैं वहां पर वह उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहती थी अपने लाइफ में बहुत कुछ करना चाहती थी।  बस इंतजार कर रही थी उसकी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो जाए।

धीरे-धीरे समय बीतता गया उसकी बेटी लक्ष्मी अब 3 साल की हो गई थी वह प्ले स्कूल में जाना शुरु कर दी थी इधर सिमरन ने भी एक कंपनी में टैक्स कंसल्टेंट की जॉब करने लगी थी।  सिमरन जॉब और घर भी बहुत अच्छे से मैनेज कर रही थी कैलाश को भी अपने बीवी पर गर्व महसूस होता था क्योंकि वह अपने जॉब के कारण कहीं से भी कैलाश के देखरेख में कोई कमी नहीं होता था टाइम पर उसका नाश्ता बनाना लंच पैक करना शाम को आते ही डिनर बनाना सब कुछ नॉर्मल वाइफ की तरह करती थी।

इस वजह से कैलाश को भी उसके जॉब कोई एतराज नहीं था।एक दिन अचानक कैलाश के बाबूजी का फोन आया कि बेटा तुम्हारी मां का पैर में दर्द हो रहा था जहां हमने डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने बोला कि इनके घुटने का ऑपरेशन करना पड़ेगा।  

कैलाश बोला कि पापा इसमें सोच क्यों रहे हो मम्मी को लेकर आप बेंगलुरु आ जाओ यहीं पर उसका ऑपरेशन करा देंगे।  कैलाश के पापा ने जब मंजू जी को बेंगलुरु जाने की बात कही मंजू जी ने साफ इंकार कर दिया कि मैं कुछ भी हो जाएगा मैं बेंगलुरु नहीं जाऊंगी।

कैलाश के रिक्वेस्ट करने की वजह से मंजू जी तैयार हो गई थी बंगलुरु जाने के लिए कैलाश के मां पिताजी कुछ दिनों के बाद बंगलुरु पहुंच चुके थे स्टेशन से कैलाश को घर लेकर आया।

उस दिन सिमरन क्योंकि सास ससुर आने वाले थे इस वजह से साड़ी ही पहनी थी और सर के ऊपर पल्लू रखी हुई थी क्योंकि मंजू जी को यह चीजें पसंद नहीं थी की बेटी बहू जींस और टॉप पहन कर घूमें यहां तक कि उनको सलवार सूट पहनना पसंद नहीं था।

घर आते ही सिमरन ने अपने सास-ससुर को पैर छुए और उनको नाश्ता पानी कराया। सिमरन भी सब कुछ पहले का भूल चुकी थी धीरे-धीरे वह भी अब मैच्योर हो चुकी थी उसे दुनियादारी की समझ हो चुकी थी उसे अब  अपने सास की कोई भी बात का बुरा नहीं लगता था।

सिमरन को साड़ी पहने हुए देख कैलाश बोला ओहो क्या बात है आज साड़ी  मे ऐसा लग रही हो जैसे साक्षात देवी मां घर में आ गई हो। सिमरन बोली तुम भी ना कैलाश मजाक करने की आदत तुम्हारी अभी तक गई नहीं।  मां बाबूजी आ रहे थे तो क्या करूं इस वजह से मैंने पहना।

सिमरन कुछ दिनों के लिए अपने ऑफिस से छुट्टी ले लिया था।  शाम को अपने सास-ससुर को पार्क में घूमने ले जाती थी। सिमरन के सास ने  एक दिन बोला बहू यहां तो कोई भी साड़ी नहीं पहनता है तुम भी चाहो तो सलवार सूट पहन सकती हो।

सिमरन बोली ठीक है माँ जी कुछ दिनों के बाद सिमरन के सास का घुटने का ऑपरेशन हो गया और सिमरन ने उनकी इतनी सेवा की सिमरन के सास को लग रहा था  यह मेरी बहू नहीं बेटी है बल्कि बेटी से भी बढ़कर है। धीरे-धीरे सिमरन की ऑफिस की छुट्टी खत्म हो गई उन्होंने अपनी ननद को फोन करके बोला दीदी आप कुछ दिनों के लिए बंगलेरू आ जाओ जब तक माँ ठीक हो जाएंगी क्योंकि अब ऑफिस में मेरी भी छुट्टी नहीं है।  सिमरन के ननद को जब यह पता चला कि वहां जाकर सेवा करना पड़ेगा तो बच्चों के एग्जाम का बहाना बनाकर नहीं जाने को मना कर दिया।

यह बात जब सिमरन के सास को पता चला उसकी बेटी ने आने से मना कर दिया है उसको बहुत ही दुख हुआ इस बेटी के लिए मैंने अपनी बहू को इतना दुख दिया था आज मुझे जरूरत है तो वह मना कर रही है।

सिमरन सुबह उठकर जल्दी जल्दी घर का सारा काम निपटा देती थी और और सबकुछ  अपने ससुर जी को समझा कर चली जाती थी की दोपहर में मां जी को दवाई खिला देना और यह यहां पर खाना रखा हुआ है आप भी खा लीजिएगा और मां जी को भी खिला दीजिएगा।

शाम को सिमरन जल्दी से ही ऑफिस से घर आ जाती थी और घर आने के बाद जल्दी से कपड़े चेंज करके सबके लिए चाय बनाती  थी और उसके बाद सबके मन पसंद डिनर बनाती थी।

समय के साथ सिमरन बहुत बदल गई थी।  अपने बहू को देखकर अब सिमरन के सास मंजू जी की भी राय बदल गई थी।

जब मंजू जी ठीक हो गई एक दिन मंजू के सिमरन के ससुर जी के साथ पास के ही मॉल में शॉपिंग  करने गई और वहां से जींस और टॉप खरीद कर लेकर आए अपने बहू के लिए ।

बहू के  ऑफिस से आते ही उन्होंने बोला बहुत यह लो यह पहनोगी तो तुम पर बहुत ही अच्छा लगेगा। सिमरन को अंदाजा भी नहीं था कि उसकी सास मंजू जी इतनी बदल जाएंगी।  

मंजू जी ने बस इतना ही कहा कि जब मेरी बेटी कुंवारी थी तो जींस टॉप पहनती थी तो मुझे कोई एतराज नहीं था तो अगर हमारी बहू पहने ही तो मुझे ऐतराज़ क्यों रहेगा क्योंकि अब  आज से तुम बहू नहीं बेटी हो मेरी।

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