स्वाभिमान-हरदीप सबरवाल

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मकान बदलने के झंझट में रमेश तीन-चार दिन उलझा रहा, शाम को मां का फोन आ गया कि बहन का ससुर बीमार है दुकान से आते वक्त पिता को साथ लेकर उसे देख आना, रमेश के पिता हालांकि वहां जाना नहीं चाहते थे क्योंकि बहन के ससुर का स्वभाव और ताने देने की आदत उन्हे बिल्कुल पसंद नहीं थी, वो इतना स्वाभिमानी थे और किसी की गलत बात या ताने बर्दाश्त नहीं करते थे, मगर रमेश के कहने पर उसके साथ चल पड़े. जब वो बहन के घर में पहुंचे तो ससुर एक कमरे में आराम से लेटा TV पर एक फिल्म देख रहा था, बहनसामने आई रमेश को लगा कि उसके ससुर से ज्यादा तो उसकी बहन की तबीयत खराब है, जब उसने बहन से पूछा तो वह बोली कि नहीं मैं ठीक हूं.
रमेश बहन से बात करने के लिए बाहर चला गया और इस बीच वहां ससुर और उसके पिता अकेले रह गए ,
पिता ने कुर्सी पीछे की ओर की तो अचानक ही कुर्सी दीवार से लग गई, बहन का ससुर तपाक से बोल पड़ा, ” कमरा ही छोटा है और घर भी छोटा है पर चलो भगवान ने अपना तो दिया जिनको अपना नहीं दिया वह तो हर साल सिर के ऊपर सामान रखते हैं और कभी ईधर कभी उधर भटकते हैं”, पिता समझ गए कि उसका उलाहना उनके किराए के मकान के बदलने को लेकर है मगर वह चुपचाप बैठे रहे, तभी रमेश के जीजा वहां आ गए और ससुर ने तुरंत बात बदल दी और हस-हस कर बात करने लगा. कुछ देर बाद रमेश और पिता घर आ गऐ, पिता को असहज देख वह समझ गया कि जरूर कोई बात है, जब पिता ने पूरी बात बताई और गुस्से में कहा कि अगर इससे आगे वह कुछ और बोलता तो मैं वहीं पर उसे थप्पड़ मारता .
एक पल के लिए तो रमेश चुप रहा फिर अनायास ही उसके मुंह से निकल गया “पिताजी आप उसे 15 मिनट भी बर्दाश्त ना कर पाए और अपनी बेटी के बारे में तो सोचिए जो 15 सालों से लगातार उसे बर्दाश्त कर रही होगी और एक शिकायत कभी आपके सामने नहीं करने आई”, कुर्सी पर बैठे पिता आसमान की तरफ देखने लगे चुपचाप जैसे कुछ खो गया हो और उसे आसमान में ढूंढ रहे हो.
ना जाने क्यों रमेश को उसके पिता का 15 मिनट में खोया स्वाभिमान और उसकी बहन का 15 सालों से खोया स्वाभिमान तराजू के पलड़े में बराबर-बराबर तुलते नजर आए…
© हरदीप सबरवाल

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