सृष्टि तथा सात ऊर्ध्व एवं सात पाताल लोकों का वर्णन

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श्रीसूत जी बोले – मुनियो ! अब मैं कल्प के अनुसार सैकड़ों मन्वंतरों के अनुगत ईश्वर संबंधी कालचक्र का वर्णन करता हूं । सृष्टि के पूर्व यह सब अप्रतिज्ञात स्वरूप था । उस समय परम कारण, व्यापक एकमात्र रुद्र ही अवस्थित थे । सर्वव्यापक भगवान ने आत्मस्वरूप में स्थित होकर सर्वप्रथम मन की सृष्टि की । फिर अंहकार की सृष्टि की । उससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध नामक पञ्चतन्मात्रा तथा पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति की । इनमें से आठ प्रकृति हैं (अर्थात् दूसरे को उत्पन्न करनेवाली हैं) – प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श की तन्मात्राएं । पांच महाभूत, पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और मन – ये सोलह इनकी विकृतियां हैं । ये किसी की भी प्रकृति नहीं हैं, क्योंकि इनसे किसी की उत्पत्ति नहीं होती । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध – ये पांच ज्ञानेंद्रियों के विषय हैं । कान का शब्द, त्वक् का स्पर्श, चक्षु का रूप, जिह्वा का रस, नासिका का गंध है । प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान के भेद से वायु के पांच प्रकार हैं । सत्त्व, रज और तम – ये तीन गुण कहे गये हैं । प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और उससे उत्पन्न सारा चराचर विश्व भी त्रिगुणात्मक है । उस भगवान वासुदेव के तेज से ब्रह्मा, विष्णु और शंभु का आविर्भाव हुआ है । वासुदेव अशरीरी, अजन्मा तथा अयोनिज हैं । उनसे परे कुछ भी नहीं है । वे प्रत्येक कल्प में जगत और प्राणियों की सृष्टि एवं उपसंहार भी करते हैं ।
बहत्तर युगों का मन्वंतर का एक कल्प होता है । यह कल्प ब्रह्मा का एक दिन और रात है । भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और ब्रह्मलोक – ये सात लोक कहे गये हैं । पाताल, वितल, अतल, तल, तलातल, सुतल और रसातल – ये सात पाताल हैं । इनके आदि, मध्य और अंत में रुद्र रहते हैं । महेश्वर लीला के लिए संसार को उत्पन्न करते हैं और संहार भी करते हैं । ब्रह्मप्राप्ति की इच्छा करने वाले की ऊर्ध्वगति कही गयी है ।
ऋषि सर्वदर्शी (परमात्मा) ने सर्वप्रथम प्रकृति की सृष्टि की । उस प्रकृति से विष्णु के साथ ब्रह्मा उत्पन्न हुए । द्विजश्रेष्ठों ! इसके बाद बुद्धि से नैमित्ति की सृष्टि उत्पन्न हुई । इस सृष्टिक्रम में स्वयंभुव ब्रह्मा ने स्रवप्रथम ब्राह्मणों को उत्पन्न किया । अनंतर क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की सृष्टि की । पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिशाओं की कल्पना की । लोकालोक, द्वीपों, नदियों, सागरों, तीर्थों, देवस्थानों, मेघगर्जनों, इंद्रधनुषों, उल्कापातों, केतुओं तथा विद्युत आदि को उत्पन्न किया । यथासमय ये सभी उसी परब्रह्म में लीन हो जाते हैं । ध्रुव से ऊपर एक करोड़ योजन विस्तृत महर्लोक है । ब्राह्मण – श्रेष्ठ वहां कल्पान्तपर्यन्त रहते हैं । महर्लोक से ऊपर दो करोड़ योजन विस्तृत जनलोक है, वहां ब्रह्मा के पुत्र सनकादि रहते हैं । महर्लोक से ऊपर दो करोड़ योजनवाला तपोलोक है, वहां तापत्रयरहित देवगण रगते हैं । तपोलोक से ऊपर छ: करोड़ योजन विस्तृत सत्यलोक है, जहां भृगु, वस्ष्ठ, अत्रि, दक्ष, मरीचि आदि प्रजापतियों का निवास है । जहां सनत्कुमार आदि सिद्ध योगिगण निवास करते हैं, वह ब्रह्मलोक कहा जाता है । उस लोक में विश्वात्मा विश्वतोमुख गुरु ब्रह्मा रहते हैं । आस्तिक ब्रह्मवादी, यतिगण, योगी, तापस, सिद्ध तथा जापक उन परमेष्ठी ब्रह्मा जी की गाथा का गान इस प्रकार करते हैं –
‘परमपद की प्राप्ति की इच्छा करनेवाले योगियों का द्वार यहीं परमपद लोक है । वहां जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । वहां जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । वहां जानेवाला विष्णु एवं शंकरस्वरूप हो जाता है । करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान यह स्थान बड़े कष्ट से प्राप्त होता है । ज्वालामालाओं से परिव्याप्त इस पुर का वर्णन नहीं किया जा सकता ।’
इस ब्रह्मधाम में नारायण का भी भवन है । माया सहचर परात्पर श्रीमान हरि यहां शयन करते हैं । इसे ही पुनरावृत्ति से रहति विष्णुलोक भी कहा जाता है । यहां आने पर कोई भी लौटकर नहीं जाता । भगवान के प्रपन्न महात्मागण ही जनार्दन को प्राप्त करते हैं । ब्रह्मासन से ऊर्ध्व परम ज्योतिर्मय शुभ स्थान है । उसके ऊपर वह्नि परिव्याप्त है, वहीं पार्वती के साथ भगवान शिव विराजमान रहते हैं । सैकड़ों – हजारों विद्वान और मनीषियों द्वारा वे चिन्त्यमान होकर प्रतिष्ठित रहते हैं । वहां नियत ब्रह्मवादी द्विजगण ही जाते हैं । महादेव में सतत ध्यानरत, तापस, ब्रह्मवादी, अहंता – ममता के अध्याय से रहित, काम – क्रोध से शून्य, ब्रह्मत्व – समन्वित ब्राह्मण ही उनको देख सकते हैं – वहीं रुद्रलोक है । ये सातों महालोक कहे गये हैं ।
द्विजगणों ! पृथ्वी के नीचे महातल आदि पाताल लोक हैं । महातल नामक पाताल स्वर्णमय तथा सभी वर्णों से अलंकृत है । वह विविध प्रासादों और शुभ देवालयों से समन्वित है । वहां पर भगवान अनन्त , बुद्धिमान मुचुकुन्द तथा बलि भी निवास करते हैं । भगवान शंकर से सुशोभित रसातल शैलमय है । सुतल पीतवर्ण और वितल मूंगे की कान्तिवाला है । वितल श्वेत और तल कृष्णवर्ण है । यहां वासुकि रहते हैं । कालनेमि वैनतेय, नमुचि, शंकरकर्ण तथा विविध नाग भी यहां निवास करते हैं । इनके नीचे रौरव आदि अनेकों नरक हैं, उसमें पापियों को गिराया जाता है । पातालों के नीचे शेष नामक वैष्णवी शरीर है । वहां कालाग्नि रुद्रस्वरूप नरसिंह भगवान लक्ष्मीपति भगवान विष्णु नागरूपी अनन्त के नाम से प्रसिद्ध हैं

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