जानबे करते हैं कि हमरा एक से एक लोग से पाला पड़ते रहता है। तो ऐसने एकठो बिदवान जी हम से पूछे कि बताव तो, गंगा मइया तोहे पियरी चढइबो और राम तेरी गंगा मैली में का फरक है?

हमू कम ना हैं। उलटे फरिया लिये,पहिले ई बताइए कि ई जनरल नालेज का सवाल है कि कामनसेंस का? बिदवान जी बोले , कामनसेंस का। फिर का था।

हम चालुए हो गये, दूनो फिलिमे है। लेकिन पहिलकी पहिले बनी, दूसरकी बाद में। पहिलकी भोजपुरी में बनी दुसरकी हिन्दी में, पहिलकी को नजीर हुसेन बनाये, तो दुसरकी को राजकपूर । पहिलकी सादा बनी, तो दुसरकी रंगीन में।

एसे पहले कि बिदवान जी कुछ बोलें, हम उनही से पूछ दिये, अब आप हमरा ई जनरल नालेज वाला सवाल का जबाव बताइये कि गंगा मइया को केतना लोग पियरी चढ़ाया है? बिदवान जी बोले, ई तो शोध का बिसय है। प्रधनमंत्राी जी गंगा बेसिन अथॉरिटी बनाये हैं। ऊ एहू पर शोध् करबे करेगी?

हमरा मन अचकचाया, सो पूछ बैठे, कहीं ऊ एहू शोध ला राजे सरकार से पइसा मांगे लगे तब? तब का होगा? बिदवान जी डपटे, बुड़बके हो का? बताओ तो ई कौन नियम है कि, पियरी राज सरकार चढ़ावेगी और गिनती करे का पइसा केंद्र सरकार देगी?

घाटे-घाट पियरी फीचो तुम, सोडा-साबुन का खर्चा दूसर उठावे? पिअरी सूखेगा तोरा और अरगनी खोजोगे पड़ोसिया का? सांच कहे तो, एतना सवाल सुनके हमरा बोलतिये बंद हो गया। लेकिन हमू माने वाले थोड़े न थे। थेथरालॉजी देइए दिये, माने न नौ मन तेल होगा, ना राधरानी नाचेंगी? बिदवान जी को तो जैसे बिदवता झाड़े का मोके मिल गया, बेटा, एहू पर एकठो कमेटी बनेगी, जे बिचार करेगी कि तेल का खर्चा कइसे निकले। ई सरकारी योजना है।

बूझे ना? साचो हमको कुछ ना बुझाया, सो हम बोले, खर्चे निकाले काफेरा में कहीं सब योजनवा का तेल तो ना निकल जायेगा? बस का थ, एतना सुनते बिदवान जी हत्थे से उखड़िए गये, पियरी चढ़ावे का एतने शौक था, तो साफो-सफाई का सोचना चाहिए था कि ना? ना सोचे तो भुगतिये। बिदवान जी का गुस्सा देख के तो हम नरभसाइए गये।

एही अलबलाहट में सवालवे मुंह से निकल गया, सर, हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो सादा काहे बनी और राम तेरी गंगा मैली रंगीन काहे बनी? बिदवान जी हमरी हालत पर मुस्काये कि अपनी बिदवता पर उहे जानें, मुसकी छांटते हुए बोले, अरे बकलोल, एतनो नहीं बूझता है कि पाखंड सादगी में छुपता है और मैल रंगीन में?

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