सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे लालबहादुर शास्त्री

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देश के द्वितीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री न केवल अपनी सादगी और विनम्रता के लिये पहचाने जाते हैं बल्कि वह अपने उसूलों के भी पक्के थे। महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के आदर्शों को आत्मसात करने वाले शास्त्री जी अपने जीवन के किसी भी मोड़ पर उन आदर्शों से नहीं डिगे और सिर्फ स्वयं ही नहीं बल्कि अपने पूरे परिवार को उन आदर्शों से जोड़े रखा।

शास्त्री जी के पुत्र सुनील शास्त्री ने अपनी पुस्तक ‘लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’ में बताया है कि शास्त्री जी आज के राजनीतिज्ञों से बिल्कुल भिन्न थे। उन्होेंने कभी भी अपने पद या सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग नहीं किया।

अपनी इस दलील के पक्ष में एक नजीर देते हुए उन्होंने किताब में लिखा है, शास्त्री जी ‘जब 1964 में प्रधानमंत्री बने तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरलेट कार मिली जिसका उपयोग वह न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी।’

किताब के अनुसार एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिये इंपाला कार ले गये और उसे वापस लाकर चुपचाप खडी कर दी। शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलायी गयी और जब ड्राइवर ने बताया कि चोैदह किलोमीटर तो उन्होंने उसे निर्देश दिया, ‘लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।’

किताब के अनुसार शास्त्री जी यहीं नहीं रूके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुला कर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें। पुस्तक के अनुसार शास्त्री जी को खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में जो आनंद मिलता था,

उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। एक बार की घटना है जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे और वह मुंबई जा रहे थे। उनके लिये प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। गाडी चलने पर शास्त्री जी बोले, ‘डिब्बे में काफी ठंडक है, वैसे बाहर गरमी है।’ उनके पीए कैलाश बाबू ने कहा, ‘जी, इसमें कूलर लग गया है।’ शास्त्री जी ने पैनी निगाह से उन्हें देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, ‘कूलर लग गया है?

बिना मुझ बताए? आपलोग कोई काम करने से पहले मुझसे पूछते क्यों नहीं? क्या वे और सारे लोग जो गाडी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी?’ शास्त्री जी ने कहा, ‘कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिये, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिये।’

दिवंगत नेता ने कहा, ‘बडा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहां भी रूके, कूलर पहले निकलवाइये।’ मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रूकी और कूलर निकालने के बाद ही गाड़ी आगे बढी। आज भी फर्स्ट क्लास में उस जगह, जहां कूलर लगा था, वहां पर लकड़ी जड़ी है। पुस्तक में लिखा गया है, ‘यह बात सिद्धांत प्रतिपादित करने की नहीं, सिद्धांत को जीने की है,

उसे जीवन में उतारने की है। साधारण देशवासियों से, उन्हें कठिनाइयों से उबारने की उनमें सच्ची लगन थी। उनसे वे प्यार करते थे, क्योंकि वे उनके बीच से ही उभरे थे।’ लेखक ने लिखा है, ‘उनका काम करने का अपनेपन का तरीका अनोखा था। वे आदमी को उसके परिवेश से जोड़कर कुछ इस तरह व्यवहार करते थे कि वह खुद इस बात का अनुभव करने लगता था कि गलती फिर न हो।’

पुस्तक के अनुसार ‘आज के संदर्भ में उनकी सहजता के अर्थ नहीं लगाये जा सकते।’ शास्त्री जी के किफायती स्वभाव का जिक्र करते हुए किताब में सुनील शास्त्री ने लिखा है, ‘अब जबकि उनके पास चीजों की कोई कमी नहीं थी और वे प्रधानमंत्री थे, तब भी उनके काम और बात करने के तौर तरीके में कोई फर्क नहीं आया। तब भी वे अपने कपड़ों और खादी से लगाव रखते थे।’

पुस्तक में एक घटना का जिक्र करते हुए बताया गया है कि एकबार शास्त्री जी की अलमारी साफ की गयी और उसमें से अनेक फटे पुराने कुर्ते निकाल दिये गये। लेकिन शास्त्री जी ने वे कुर्ते वापस मांगे और कहा, ‘अब नवंबर आयेगा, जाड़े के दिन होंगे, तब ये सब काम आयेंगे। उपर से कोट पहन लूंगा न।’

शास्त्री जी का खादी के प्रति अनुराग ही था कि उन्होंने उन फटे पुराने समझ हटा दिये गये कुर्तों को सहेजते हुए कहा, ‘ये सब खादी के कपड़े हैं। बड़ी मेहनत से बनाए हैं बीनने वालों ने।

इसका एक एक सूत काम आना चाहिये।’ लेखक ने बताया कि शास्त्री जी की सादगी और किफायत का यह आलम था कि एक बार उन्होंने अपना फटा हुआ कुर्ता अपनी पत्नी को देते हुए कहा, ‘इनके रूमाल बना दो।’’ इस सादगी और किफायत की कल्पना तो आज के दौर के किसी भी राजनीतिज्ञ से नहीं की जा सकती। पुस्तक में कहा गया है, ‘वे क्या सोचते हैं, यह जानना बहुत कठिन था, क्योंकि वे कभी भी अनावश्यक मुंह नहीं खोलते थे। खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में उन्हें जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।’

 

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