हम महिलाओं को अक्सर शॉपिंग के लिये जाना जाता है ।और सिर्फ जाना ही नहीं जाता बदनाम भी किया जाता है। क्या लगता है आपको , नाइन्साफी है ? सच सच बताईये!! समझ रही हूं , मंद – मंद मुस्कान आपकी सब कह रही है। कुछ- कुछ तो सच है। अब देखिये न , आपकी अलमारियों में कपडों के ढेर हैं । लेकिन जब कहीं जाने के लिये कपड़े ढूंढो तो तो सबका एक ही डायलॉग होता है— हे भगवान क्या पहनूँ ? कपड़े ही नहीं हैं 😁 हंसिये मत प्लीज़ !पुराने समय में गिने चुने कपड़े हुआ करते थे।बड़े करीने से रखे जाते थे सहेज कर और कोई दिक्कत भी नहीं होती थी ।

इन दिनों एक तो हर मौसम और हर मौके के लिये अलग तरह के कपडे होते हैं दूसरी समस्या है रिपीट न होने देने की ।

नहीं भाई ये साड़ी तो पिछली बार वाले फंक्शन में पहनी थी सबने देखी हुई है नयी लेनी तो बनती है । बस चलो शॉपिंग !

दूसरा कारण है सेल । आजकल साल में कई बार सेल लग जाती है । फिर कभी मदर्स डे डिस्काउंट कभी वेलेनटाइन डे डिस्काउंट कभी तीज तो कभी करवा चौथ ।

पर क्या आप जानती हैं कि सेल पीरियड में सबसे घटिया और बचा खुचा माल ही मिलता है ।सस्ते के लालच में हम कभी कभी इतना ज़्यादा खरीद लेते हैं कि उसे इस्तेमाल करने का मौका आने तक उस का फैशन चल जाता है ।

जूते चप्पल तो मैचिंग के चक्कर में कभी-कभी थोड़े बहुत ऑड साइज़ के भी आ जाते हैं । आप कभी ध्यान दीजिये जो ड्रेस आप नॉन सेल के टाईम पर देख कर सोचती हैं कि सेल लगेगी तब लेंगे वह कभी सेल के टाईम मिलता ही नहीं । क्योंकि वह तो डिस्प्ले ही नहीं किया जाता। ऐसा सामान निकलता है सेल में जो अकसर बिकता नहीं।स्टॉक खत्म करने के लिये किया जाता है।कभी कभी तो कीमत बढ़ा कर लिखी हुई होती है और उसी सामान को डिस्काउंट लगा कर बेचा जाता है ।

हैण्ड बैग का भी यही हाल है।महँगे आते हैं लेकिन सेल में जब 30% डिस्काउंट देखते हैं तो बड़ी ब्रांड्स के बैग खरीदने का लालच हम त्याग नहीं पाते और नतीजा, वही ढेर के ढेर बैग ! रखने की जगह हो न हो चाहे किसी को गिफ्ट करने पड़ें लेकिन खरीदते समय हम सोचते ही नहीं।

खाने पीने का सामान तब सेल पर लगाया जाता है अक्सर जब एक्सपायरी नज़दीक होती है । एक बार मैंने 1+1 ऑफर में दो केचप की बोतल खरीद लीं लेकिन जब तक दूसरी इस्तेमाल करने का समय आया तो बेटी ने बताया कि वह तो एक्सपायेर्ड डेट की है । अगर कभी खरीदें तो ज़रूर डेट चेक कर लें ।

लोग सस्ते के चक्कर में इतने कपड़े खरीद लेते है कभी कभी कि वो कभी पहने भी नहीं जाते । क्या फायदा ऐसी शॉपिंग का !

सारी बातें कहने का मतलब यह है कि खरीदारी समझदारी से करें । बाज़ार वाले तो सब कुछ बेचने के लिये ही बैठे हैं लेकिन जेब और ज़रूरत के अनुसार की गयी खरीदारी में समझदारी है ।

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लेखिका:मंजु सिंह (वैसे तो ये retired टीचर हैं पर एक अच्छी लेखिका भी इन्हे सामजिक कुप्रथाओं और अनुचित मान्यताएँ जो वर्षों से चली आ रही हैं उनके प्रति जागरूकता लाने वाले और व्यक्तिगत समस्याओं पर लेख और कहानियाँ लिखना पसन्द है।

Source:https://hindi.momspresso.com/parenting/my-own-diary/article/samajhadari-se-karem-kharidari

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