व्यक्ति का महत्व उसके नश्वर शरीर से नहीं, उसकी समझ और कर्म से है…

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एक जगह सूखा वृक्ष खड़ा था, उसे बस्ती के लोग काटने की तैयारी में थे, उस सूखे वृक्ष ने लोगों पर कृतघ्नता का आरोप लगाते हुए कहा:- ‘‘ये वे लोग हैं, जो कभी मेरी छाया में विश्राम लेकर अपनी थकान से मुक्त होते थे, ऋतु आने पर मेरे फल-फूल का उपयोग करते थे।
अब जबकि मैं रोगी होकर सूख गया हूं तो इन्हें मेरा अस्तित्व में बने रहना भी सहन नहीं हो रहा।’’
पास ही में खड़ा एक हरा-भरा वृक्ष उसकी बात सुन कर मुस्कुराया, उसने कहा:- ‘‘मित्र, अपने सोचने का ढंग बदलो और यह कहो कि जब मैं हरा था तो भी लोगों की सेवा करता रहा और अब सूख गया हूं तो भी जलावन के रूप में उनका भोजन तैयार करने के काम आऊंगा।
सेवा-समर्पण का तुम्हारा व्रत अंत तक निभता रहा, क्या यह कम सौभाग्य की बात है, इसलिए दूसरों के लिए त्याग करने में सुख की अनुभूति करो।’’
जीवन में हमें ऐसे अवसरों की तलाश करते ही रहना चाहिए जब हम परोपकार के भागी बनें लेकिन यह भी ध्यान रखें कि किसी की सहायता करके अहंकार से उसका बखान न करते रहें, अपने ‘मैं’ को विसर्जित करने में ही सुख और शांति महसूस कर पाएंगे।
जीवन में अच्छी-बुरी परिस्थितियां सबके जीवन में आती हैं, जो बना है, वह मिटेगा भी, जो जन्मा है, उसकी मृत्यु भी होगी।
दुखदायी हालात और बातों को सहजता से लेने की मानसिकता बनाएं क्योंकि शांति और धैर्य ही महासुख है।
चिंता करने से समस्याएं हल नहीं होंगी, दुख ही उपजेगा इसलिए हर हाल में प्रसन्न रहें और दूसरों की प्रसन्नता में सुख का अनुभव करें।
जीवन चक्र चल रहा है, हरा-भरा वृक्ष निर्धारित समय पर जिस तरह सूखकर ठूंठ हो गया, उसी तरह हमें भी बुढ़ापे या रोग का कभी तो सामना करना ही है और एक दिन दुनिया से जाना भी है, फिर किसी से गिला-शिकवा किस बात का?
प्रयत्न यह करें कि हम दीन-दुखियों, रोगियों, निर्धन और निराश्रितों की सेवा में जो कुछ योगदान दे सकें, वह दें।
हम सकारात्मक दिशा में काम करें और प्रभु के प्रति समर्पण भाव रखें।
जीवन की सफलता इसी में है कि हम हर दिन और कार्य का प्रारम्भ सदा नई उमंग, उत्साह और आत्म-विश्वास के साथ करें, व्यक्ति का महत्व उसके नश्वर शरीर से नहीं, उसकी समझ और कर्म से है।

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