विधवा या सुहागन- Vardaan Singh Chamlasa

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रति बेहद खूबसूरत औरत थी और अपने घर संसार में व्यस्त और मस्त भी …पति और बच्चे उस पर जान छिड़कते थे कहीं कोई कमी न थी पर कभी कभी पति अनंग को एक बात सालती थी विशेष मौकों पर भी वो पूरा श्रन्गार तो करती किंतु माँग नहीं भरती थी कभी पूछा तो बेहद सर्द लहजे में मुझे एलर्जी है कह कर बात ख़त्म… उस पल अनंग को रति अजनबी सी लगती पर शायद ऐसा हो…
सोच कर मन समझा लेता… इस बार भी पूर्ण श्रन्गार में दीपावली के दिये का थाल लिये वो किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी …सहसा अनंग के मुख से निकल गया… कभी तो माँग भर लिया करो यार… हँसती खिलखिलाती रति के चेहरे पे सहसा अमावस की परछाई आई और चली गई…
अनंग बात सम्भालते हुवे बोला… छेड़ रहा हूँ यार बस… उस रात सब के हर्षॊल्लास से त्यौहार मना कर सो जाने के बाद थकी हुई रति की आंखों से नींद कोसों दूर थी…. वो भी दीपावली की ही तो रात थी..
बचपन से साथ साथ पले बढ़े माधव ने राधा कृष्ण की मूर्ति के सामने रति की माँग भरकर अनुरक्त भाव से कहा था… अब इस माँग में किसी और के नाम का सिन्दूर तो नहीं सजेगा … काँपते अधर अधखुले नयन से रति के मुख से अस्फ़ुट स्वर में निकला… नहीं
कल सुबह एक दोस्त की सगाई में मुंबई जाना है वहाँ से आते ही तुम्हें तुम्हारे घरवालों से माँग लूंगा… बस उसके बाद आज तक माधव की कोई खबर नहीं… उसके घरवालों ने आकाश पाताल एक कर दिया… आज तक कुछ पता नहीं चला.. उसे ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया…
घरवालों ने रति की शादी कर दी..ज़िन्दगी में सब कुछ सही है….लेकिन रति ने उसके बाद माँग में कभी सिन्दूर नहीं भरा..

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