विद्या की परिभाषा

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योवनम धन संपत्ति प्रभुत्व म अविवेकिता
एकैकम अनरथाय किमूयत्र चतुसथाय।
अथात: युवा अवस्था हो, धन संपत्ति प्रचुर मात्रा मे हो, कोई पोस्ट प्राप्त हो (जैसे सॉफ्टवेर इंजीनियर हु, मै आईएएस ही, मै कलेक्टर हु, मै इंजीनियर हु) इत्यादि और शास्त्र वेद का तत्वज्ञान प्रप्त न हो इन मे एक भी वस्तु अगर किसी को प्राप्त हो जाए तो जीव अपना अनर्थ कर बैठता है, और सभी वस्तु मे मिल जाए तो फिर तो वो जीव अपने आपको भगवान ही मान लेता है।
ग्रह ह्रहीत पुनि बात बस, तेहि पुनि बीछी मार । ताही पियाइअ बारुनी, कहहु कौन उपचार।
एक तो जीव का मन पहले से ही बंदर की तरह चंचल फिर उसे जीव(बंदर) को वायु रोग हो जाए और फिर उस जीव(बंदर) को बिच्छी डंक मार दे , और फिर जीव(बंदर) को मदिरा पिला दी जाए तो सोचिए उस जीव (बंदर) का क्या कोई उपचार कर सकता है वो जीव मदांध हो जाता है
इसी तरह किसी व्यक्ति को धन, संपत्ति, युवा अवस्था या कोई पोस्ट या डिग्री मिल जाए तो अहंकार से नहीं बच सकता है और भगवान शिव का केवल एक शत्रु है अहंकार जिस किसी व्यक्ति मे अहंकार आया की भगवान शिव मूड ऑफ हो जाता नो दो ग्यारह हो जाते।
विद्या की परिभाषा शास्त्रो मे कही गई है
सा विद्या या विमुक्तएत॥
विद्या वही है जो जीव को माया के बंधन से मुक्त करके भगवान शिव के प्रेम के बंधन मे बांध दे सदा के लिए इसके अलावा जितनी भी विद्याय है सब केवल अविद्या है अज्ञान है , श्रम ही फालतू का।
वसुदेव परा विद्या।
सा विद्या तन मतिर यया।
वही ज्ञान विद्या कहलाती है जो जीव को भगवान को ओर ले जाए अगर कोई विद्या जीव को संसार की ओर ले जाकर संसार के जड़ वस्तु और व्यक्ति मे आसक्ति कर व देती है तो महान अविद्या है अज्ञान है, नरक का द्वार है।
मनुष्य (स्त्री हो या पुरुष ) प्रत्येक को अपने शरीर मे कितनी आसक्ति होती है
जब की स्त्री के शरीर मे हाड़, मांस, मल, मूत्र , विस्टा, पाखाना , दुर्गन्द आदि भरा पड़ा है, इस अधम शरीर के प्रत्येक रोम रॉम से गंदगी ही निकलती रहती है, दो आँख से गंदगी, दो कान से गंदगी, मुह से दुर्गंध, प्रत्येक रोम रॉम से नहाते वक्त भी पसीना निकलता रेहता है, नाक से गंदगी, मूत्रइंद्रिय से गंदगी(एमसी , मूत्र) फिर मल आदि और पाँच किलो माल सदा प्रत्येक मनुष्य के पेट मे भरा पड़ा है …
आश्चर्य है पुरुष को ये सब ज्ञान है फिर भी वह स्त्री के गंदे शरीर मे आसक्त हो जाता है ये इसलिए होता है पुरुष की बुद्धि जब तक काम युक्त है तभी तक उतने समय के लिए ही उस पुरुष को स्त्री के शरीर से सुख मिलता है
कामी है स्त्री अच्छी लगती है
लोभी है धन अच्छा लगता है
क्रोधी है लड़ाई करना, गली देना अच्छा लगता है
द्वेषी है निंदा करना अच्छा लग रहा है
रागी है स्तुति (स्त्री या प्रेमिका की तारीफ करना अच्छा लग रहा है)
तभी तक जब तक ये माया के विकार मन पर हावी है बस उतने ही समय तक…
वैसे भी संसार संबंधी कोई भी ज्ञान महा अज्ञान ही है अविद्या ही है
(जैसे सॉफ्टवेर इंजीनियर हु, मै आईएएस ही, मै कलेक्टर हु, मै इंजीनियर हु मै एमबीए हु )
माया के जगत का ज्ञान जीव को चौरासी लाख योनियो मे ही घूमता है जीव को परमात्मा से नहीं मिलता यह सब ज्ञान (अज्ञान) केवल जीविका चलाने का साधन है यह पेट भरने का काम तो कुत्ते , गधे, बिल्ली भी कर लेते है इसी संसारी पोस्ट का तुम्हें क्या अहंकार है एक बार यमराज का जिस क्षण ऑर्डर हो जाएगा उस शान आप लोगो की यह डिग्रीया(जैसे सॉफ्टवेर इंजीनियर हु, मै आईएएस ही, मै कलेक्टर हु, मै इंजीनियर हु मै एमबीए हु ) आपको चौरासी लाख प्रकार के योनीयो मे जाने से नहीं बचा सकता मृत्यु के बाद केवल आपके कर्म ही आपकी सहइयता करेंगे बस
इसलिए भक्ति करो जल्दी जल्दी भगवान शिव के चरणों मे मन की आसक्ति करो शरणागत हो जाओ और सदा को माला माल हो जाएओ।

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