राह के काँटे-अम्बिका कुमार शर्मा

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“मन की उलझने है कि थमने का नाम नही ले रही” कम्मू सोच सोच कर परेशान हो रही थी कि आखिर उसने जो भी किया वो सही है या गलत? मांथे पर लकीरे उभर आई, कभी लगता मैं इतनी मतलबी कैसे हो सकती हूँ, कभी लगता जो किया यही सही है आखिर मुझे भी तो बचपन से यही मिला है। कम्मू को बचपन का स्कूल के दृश्य याद आ गया।
कमला या कम्मू यानी मैं और मेरी प्रिय सहेली नंदनी हम दोनों स्कूल से वापस आते एक दूसरे के गले मे हाथ डाले, सिर में सिर मिलाये, अपनी बातों की दुनिया मे खोये, मस्ती से चले आ रहे थे, मैं तो नंदनी की बातों में इस प्रकार डूबी थी कि मैंने देखा भी नही कब नंदनी की दादी ने नंदनी का हाथ खींच कर उसे मुझसे अलग कर दिया, मैं कुछ समझ पाती तब तक दादी की कर्कश आवाज हवा में गूँजने लगी “नंदनी, तुझे शर्म नही आती? एक ……(एक जाति सूचक शब्द) के साथ गले मे हाथ डाले घूम रही है, इनका तो धोखे से छू जाना भी पाप है हमारे लिये” दादी चिल्ला नंदनी पर रही थी और घूर मुझे रही थी।
तब तो ज्यादा नही समझ पाई थी क्योंकि छोटी थी लेकिन आज समझती हूँ दादी ने उस समय मेरे और नंदनी के बीच एक जाति की दीवार खड़ी कर दी थी। मैं घर आकर बहुत रोई मैंने रोते रोते अपनी माँ को पूरी बात बताई, माँ ने मुझे ही समझाया “वो ठाकुर है उसके साथ क्यो रहती हो?”
माँ ने उस दिन बहुत कुछ समझाया छोटी उम्र में ज्यादा तो नही लेकिन इतना तो समझ गई थी कि मैं एक दलित जाति में पैदा हुई साँवले रंग की साधारण रूप रंग की गरीब परिवार की बेटी हूँ जिसे बड़ी जाति के अमीर लड़कियों के साथ दोस्ती नही करनी चाहिये।
मैंने अपना मन मार कर नंदिनी का साथ छोड़ दिया और अपनी ही जाति की मेरे साथ पढने बाली निर्मला का साथ पकड़ लिया, हालांकि नंदिनी ने मुझे बहुत समझाया भी की उसकी दादी बूढ़ी हो गई है सठिया गई है उनकी बात का मैं बुरा न मानू फिर भी मुझे अपनी माँ की सीख याद आती रही।
निर्मला प्यार से उसे निम्मो भी कहते थे उससे दोस्ती में किसी को भी मुझसे बुराई नही थी निम्मो के पापा सरकारी अधिकारी थे और दूर किसी शहर में नौकरी करते थे वो घर पैसे भेज करते थे निम्मो अक्सर महंगी महंगी ड्रेस पहन कर स्कूल आती निम्मो ने मुझे भी महंगी महंगी चॉकलेट भी खिलाई।
धीरे धीरे बड़ी हुई लेकिन दलित होने के दंश ने पीछा नही छोड़ा, मुझे याद है एक दिन क्लास में एक पंडित जी का लड़का एक प्रश्न का उत्तर नही दे पाया था और उसका उत्तर मैंने दे दिया तो मेरे अध्यापक ने मेरी प्रसंसा में उस पंडित लड़के से कहा की तुम ब्राह्मण होकर भी नही पढ़ते और ये एस सी होकर इतनी होशियार है, पढ़ लो पंडित जी नही तो तुम्हे कौन सा आरंक्षण धरा है।
तब मैं आरंक्षण को समझी थी मुझे बुरा भी लगा कि सरकार हमे आरंक्षण की भीख क्यो दे रही है हमे वो सुबिधाये दे कि हम भी अपनी योग्यता से आगे निकले हमारा स्वाभिमान बढ़े मैंने बाबा साहब को पढ़ा था उनके समय मे कौन सा आरंक्षण था वो अपनी योग्यता से आगे बढ़े तभी तो आज भी उनका सम्मान है। फिर सोचती, जब मिल रहा तो क्यो न लो।
एक दिन स्कूल में मैं अपनी हेड से लड़ पड़ी जब उन्होंने मुझे भी बजीफ़ा दिया और निर्मला को भी बेचारी हेड यही कहती रही निर्मल भी तो हरिजन है जबकि मेरा कहना था उसके पापा तो बड़े अधिकारी है इतना सा बजीफ़ा उसके लिये कोई मायने नही रखता लेकिन अगर मुझे दोनों का हिस्सा मिल जाये तो मेरे परिवार के लिये बड़ी रकम हो जायेगी, हेड मेरे बचपने पर हँसती रही लेकिन वो भी क्या करती जो नियम है वही तो करेगी।
आज मुझे लगता है जो सक्षम हरिजन है वो अपना बजीफ़ा गरीब हरिजन के लिये क्यो नही छोड़ देते।
लेकिन कोई अपना स्वार्थ नही छोड़ता मैं और निर्मला साथ साथ पढ़ते पढ़ते बारहवी में आ गई अब हम दोनों गाँव के पास के कॉलेज में पढ़ने लगे थे, निर्मला शहर कोचिंग भी जाती मेरे परिवार में इतना पैसा नही था मैं तो निर्मला के नोट्स से ही पढ़ती, निर्मला के पापा, निर्मला की अनपढ़ मम्मी को अपने साथ रखने में शर्म महसूस करते थे नही तो निर्मला तो शहर के किसी बड़े स्कूल में पढ़ती तब तो मेरा पढना तो और कठिन हो जाता। निर्मला भले ही कोचिंग कर रही हो लेकिन होशियारी में मेरी गिनती उससे पहले होती थी। मैं इंटर गणित विज्ञान में बानबे प्रतिशत से बिना किसी कोचिंग पास हुई वही निर्मला छियासी प्रतिशत ला पाई।
निर्मला की पिछलग्गू मैं भी निर्मला की तरह इंजीनियर बनना चाहती थी निर्मला कोटा में कोचिंग करने लगी मैं घर पर ही खुद से पढ़ने लगी। आई आई टी के लिये मेरी माँ ने मजदूरी करके मेरा फॉर्म डलवाया पिता ने भी मजदूरी कर मुझे किताबे ख़रीदवाई लेकिन सब अरमान धरे रह गये आरंक्षण कोटे से निर्मला तो आई आई टी में प्रवेश पा गई, मैं रह गई मुझे तब भी बहुत दुख हुआ था कि जो हरिजन सक्षम है वो हम जैसे जरूरत मंद हरिजनों के लिये आरंक्षण क्यो नही छोड़ते ऐसे तो जो हरिजन एक बार सक्षम हो गया उसके बच्चे आगे बढ़ते रहेंगे और मेरे जैसे मजदूर माँ बाप के बच्चे हरिजन हो कर भी वही के वही बैठे रहेंगे।
मेरा और निर्मला का साथ छूट गया वो आई आई टी की इंजीनियर बनने जा रही थी मैं मिलने बाली बजीफे के सहारे बी ए करने अपनी माँ के साथ शहर आ गई।
दलित, हरिजन, एस सी, शूद्र, आरक्षित वर्ग जैसे कितनी
ही संज्ञाओं के बीच मैं अपनी तो पहचान ही भूल गई, इसी बीच मैंने इतिहास पढ़ा, मैं अक्सर सोचती मेरे पूर्वज गरीब रहे होंगे, अशिक्षित भो और बड़ी जातियों की सेवा करना उनका धर्म होगा सेवक का तो कोई सम्मान भी नही होता, फिर भी मध्यकालीन समय मे जब बड़े बड़े राजा महाराजाओं ने निजी स्वार्थ लालच में आ कर अपना धर्म परिवर्तन किया उस समय भी मेरे पूर्वज कितने कट्टर हिंदू न रहे होंगे कि उनके पास कुछ भी नही था और वो बहुत कुछ पा सकते थे धर्म परिवर्तन से, लेकिन उन्होंने अपना धर्म नही छोड़ा।
ऐसे पूर्वजो के बारे में सोंच कर मैं खुद ही गौरान्वित हो जाती जबकि मैं समझती थी आज आरंक्षण ने अगड़ों, पिछडो और दलितों के बीच न दिखने बाली रेखा खींच दी है।
मेरी इसी सोच के बीच एक घटना ने मेरा पूरा जीवन बदल दिया।
मेरी क्लास में एक अंकित पाठक पढ़ता था वो मुझे कभी चोर नजरो से कभी सामने से निहारा करता था।
मैं साँवली ही सही लेकिन आकर्षक तो लगती है थी लेकिन मेरा उस अंकित पाठक में कोई आकर्षण नही था, मैं तो केवल अपनी पढ़ाई और कुछ अपने खर्च के लिये ट्यूशन करती थी उसमें ही खोई थी।
एक दिन मैं क्लास में अकेली बैठी पढ़ रही थी तभी अंकित आ गया उसने बहुत साहस दिखाते हुये मेरे पास आ कर धीरे से कहा “कमला तुम मुझे बहुत अच्छी…..” वो अपनी बात पूरी कर पाता कि मैंने ही पूंछ लिया
“शादी करोगे मुझसे??”
अंकित को मेरे इस प्रकार के प्रश्न की उम्मीद नही रही होगी वो हड़बड़ा गया उसके चेहरे के भाव बोल रहे थे कि वो घबड़ा गया कुछ नही बोला।
“क्यो हम क्या तुम्हारे लिये मनोरंजन का साधन है?”
मेरे दोनों ही प्रश्न अंकित के लिये अप्रत्याशित प्रश्न थे बल्कि मुझे लग रहा था मेरे प्रश्न मेरे अंदर पलने बाली आग की तपन थे वो आग जो बचपन से पल रही थी मेरे हृदय में।
तब तक कुछ मेरी सहेलियां भी आ गई क्लास में मेरा साहस बढ़ गया अंकित कुछ बोल पाता कि मैंने एक जोर दार थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया मेरी सहेलियों को लगा अंकित ने कोई हरकत की होगी जिसका जबाब मेरा थप्पड़ था जबकि ये थप्पड़ मेरा आक्रोश था नंदिनी की दादी के लिये, निर्मला के आई आई टी के लिये, जिसे भुगता अंकित ने, लेकिन इस थप्पड़ की गूँज बहुत भारी थी पूरे शहर में चर्चा थी मेरे थप्पड़ की, मैं तो दलितों का चेहरा बन कर उभरी अपने कॉलेज में।
दलितों में मैं अपने साहस के लिये जाने जानी लगी बहुत जल्दी मेरी छवि दलित नेता की बन गई और मैं अपने कॉलेज की अध्यक्ष।
मैं आगे बढ़ना चाहती थी। इसी बीच मैंने अपने गाँव मे बिजली लाने के लिये आंदोलन किया मेरी सफलता यह थी कि मेरे गाँव मे सांसद, विधायक, डीएम और विभाग के इंजीनियर एक साथ खड़े थे और मेरे गाँव का विद्युतीकरण हो रहा था। समय बीतने के साथ अपनी शिक्षा पूरी करते ही मैं गाव की सबसे कम उम्र की सरपंच बनी।
मेरी इस राजनीतिक यात्रा की प्रमुख सहयोगिनी बनी, मेरी पड़ोस की मेरी ही जाति की एक विधवा चंपा बुआ जो अपने मायके में रह रही थी, वो मुझसे आयु में चार साल बड़ी थी।
वो मेरे साथ सभी बैठकों में जाती और अपने संपर्क भी बढ़ा रही थी।
मैं चंपा बुआ से अक्सर कहती बुआ अब मैं देखना एक दिन दलितों की सोच बदलूँगी उन्हें स्वाभिमान का पाठ सिखाऊंगी हमे भीख नही सम्मान के साथ अधिकार लेने है। बुआ भी मुस्कुरा देती।
एक दिन मैंने बुआ से कहा बुआ अब आप शादी कर लो, बुआ भड़क गई कहने लगी नही कम्मू मुझे शादी का बंधन नही चाहिये मैं स्वत्रन्त्र राजनीत करूंगी देखना एक दिन मेरे नाम का डंका बजेगा , तुम्हे देख कर मेरा मनोबल बढ़ा है मैं तुमसे भी आगे जाना चाहती हूँ।
बुआ अपनी बातों सोच से मुझे अपनी राह का कांटा लगी तब मुझे लगा ये चंपा बुआ क्यो अपने संपर्क बढ़ रही है।
मैंने आनन फानन में एक शराबी विधुर से बुआ का पुनर्विवाह बुआ की मर्जी बगैर उनके मायके के दबाब में करवा दिया।
मैं जानती थी कि जहाँ मैंने बुआ का विवाह करवाया है वो लड़का ठीक नही है लेकिन मेरी सोंच यही थी अब बुआ अपनी ही जिंदगी में उलझी, राजनीत के सपने भूल जायेगी।
सब मेरे विधवा विवाह के पुण्य कार्य से खुश हो रहे थे मुझे दुआ, आशीर्वाद दे रहे थे और मैं उलझन में उलझी सोच रही हूँ कि ये मैंने किया क्या?
ये तो मेरा लक्ष्य नही है।
तो क्या हुआ यही राजनीति है कोई भी अपने आगे किसी को नही आने देता जाति धर्म सब भूल जाते है।
अम्बिका कुमार शर्मा (राजा)
अमृत नगर कॉलोनी, गाँधी नगर, महोबा
 

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