राखियों से सजी धजी दुकाने रजनी के दिल मे किसी शूल के जैसे घात कर रही है। अपनी 13 साल की बेटी तनु का हाथ खिंचे दौड़ी जा रही है।

“मम्मी राखी दिलाओ ना, मैं भी बांधूंगी भाइ को” तनु ने जिद करते हुए कहा।

” सब बेकार के रिवाज हैं, हमे पैसे खराब नही करने” रजनी ने दांत मिसमिसाते हुए बड़ी बड़ी आंखों से घूरते हुए कहा।

” देखो न कितनी अच्छी राखी है, सब बांधते हैं। नेग बिन बांधे कैसे मिलेगा” इस बार तनु ने जोर लगाते हुए मां को एक दुकान के सामने रोक ही लिया।

” मेरे से ज्यादा दिक करी तो लगाउंगी एक, बाज़ार में छोड़ के चली जाऊंगी” रजनी का क्रोध सातवे आसमान पर था।

तनु समझ गयी, कहना बेकार है। माँ कभी किसी चीज़ को मना नही करती, एक राखी ही तो है, छोड़ो।

एक बहन का सबसे खूबसूरत दिन होता है राखी, भाई की कलाई पर राखी बांध कर बहन फूलों नही समाती। राखी का नेग, किसी की जीवनी नही चला सकता परंतु जीवन के कुछ पलों को खुशमय जरूर बना देता है।

दो भाइयों में अकेली बहन थी रजनी, प्यार से सभी रज्जो कहा करते थे। दोनो भाइयों के बाद रज्जो दुनिया मे आयी, रीति रिवाजों से अलग, पिता ने बड़े ही लाड प्यार से पाला पोसा। शादी के बाद भी कभी किसी बात की कमी नही होने दी। रज्जो को कभी लगा ही नही वो दूसरे घर गयी। पिता के बाद दुनिया ही बदल गयी। पिता के बाद पहली राखी थी जब सुबह सवेरे, हमेशा के जैसे बड़े चाव से राखी बांधने मायके पहुंची।

“रज्जो, फोन तो करना चाहिए था आने से पहले, अब तेरी वजह से देरी होगी। चल आ ही गयी है तो जल्दी से बांध दे।” बड़े भाई ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।

दोनो भाई, ससुराल जाने को तैयार थे, जल्दी-जल्दी राखी बंधाई, और समान ले कर घर के बाहर खड़े हो कर बोले-

“तुझे तो पता ही है, कितनी भीड़ होती है आज के दिन सड़को पर। कहीं छोड़ दें ?”

क्या इन्ही के लिए भीड़ होती है, मैं भी तो हमेशा आती हूँ, ऐसा बर्ताव! ना पानी पूछा, न हाल, भाभियों ने तो नमस्ते तक नही ली। दोनो के काम जमाने मे, जब कोई मदद नही कर रहा था तब राजेश ने ही पैसे दिए थे, हमेशा जीजा जी जीजा जी करके चिपटे रहते थे, आज जब हमारे हालात खराब हैं तो सीधे मुह बात तक नही कर रहे। मैं कुछ मांगने थोड़े ही आयी हूँ।

“नही-नही! तुम क्यों तकलीफ करते हो, मैं चली जाऊंगी” झूठी मुस्कान होठो पर लिए, रज्जो ने आंसुओं को रोकते हुए कहा।

दोनो भाई भाभी और भतीजे, भतीजी हाथ हिलाते अपनी – अपनी गाड़ियों में सवार हो कर निकल गए।

रज्जो कब तक आंसुओं को रोक पाती, नजरो से ओझल होने तक वहीं खड़ी हाथ हिलाती सोच रही है, खाली हाथ घर जाऊंगी तो राजेश क्या कहेंगे, आस पड़ोसी देखेंगे तो क्या सोचेंगे। पिताजी इतना देते थे कि दोनों हाथ थैलो को संभालते हुए थक जाते थे। आस पड़ोसन देख कर जलती थी। लेकिन आज खाली हाथ! क्या नेग के 100 रुपये भी भारी पड़ रहे थे?

“क्या हुआ, सब ठीक तो है?” राजेश ने प्रश्न करते हुए कहा

“हाँ!, ठीक है, क्यों क्या हुआ” अपना हाल छुपा कर उल्टा सवाल दाग दिया।

” इतनी जल्दी आ गयी, आज थैले भी नही हैं।”

“भाई ने कहा, सड़क पर भीड़ होगी,समान बाद में हम गाड़ी से पहुंच देंगे, भाभी को भी जाना था मायके । वो तो बोल रहे थे, पहले तुझे घर छोड़ आते हैं फिर चले जायेंगे, मैंने ही मना कर दिया, मालूम है ना कितनी भीड़ होती है सड़क पर” अपने पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए बड़े ही कॉन्फिडेंस के साथ झूठ बोला था पहली बार।

राजेश कपड़ो की दुकान चलाता है, दिन भर ऐसी ही औरतों की नजर पढ़ता है, समझ गया इस दफा वो मान-सम्मान नही मिला जो पिता के समय मिलता था। राजेश ने आगे कुछ कहना उचित नही समझा और बात रफा-दफा हो गयी।

किसी बात का जिक्र न हो इसका मतलब बात रफा-दफा हो गयी। ऐसी बाते और व्यहवहार दिलो दिमाग पर ऐसा जख्म दे जाता है जो कभी नही भरते।

पांच साल बीत गए, इन पांच सालों में न ही भाई आये न ही नेग। रज्जो ने तीज त्योहार छोड़ दिये। भाई दोज हो या राखी, ना कभी गयी न ही राखी भेजी।

तनु तेरह साल की हो गयी है, हर साल भाई के हाथ पर राखी बांधने की जिद करती है लेकिन रज्जो हमेशा डांट डपट कर चुप करा देती है। अब उसको यह सब बेमतलब और बकवास त्योहार लगने लगे हैं। कहती भी है, क्या राखी बांधने से ही भाई- बहन का प्यार बढ़ेगा। एक दिन लड़की को पराये घर जाना पड़ता है सब त्योहार धरे रह जाते हैं।

बाकी दिनों के जैसे ही आज की भी सुबह है फर्क सिर्फ इतना है, बच्चों के स्कूल की छुट्टी है, और पति राजेश आज छुट्टी रखते हैं। नाश्ते की तैयारी चल रही है, रज्जो ब्रेड रोल बना रही है रसोई में, राजेश और बच्चे बाहर टेबल से शोर मचा रहे हैं।

“ला रही हूं ….ला रही हूं, धीमी आंच पर पकते हैं, थोड़ा सब्र करो।” प्लेट में 4 रोले लाते हुए कहा

” सब्र ही तो नही होता, तुम बनाती ही इतने लाजवाब हो कि सब्र कैसे हो” राजेश ने आंख दबा कर मुस्कुराते हुए कहा।

” बच्चे बड़े हो रहे हैं, नॉटंकी करना छोड़ दो, सब जानती हूं मस्का लगाने में नंबर वन हो” हल्का सा हाथ मार कर वापस रसोई में जाते हुए बोली।

“मस्का! मैं तो मस्का नही लगाता, बताओ बच्चों क्या मैं मस्का लगा रहा हूँ?” राजेश ने थोड़ी ऊंची आवाज से कहा

“मस्का लगा कर ही तो, दिन भर माल बेचते हो”

तभी दरवाजे की घंटी बजी….

रज्जो : तुम खाओ, मैं देखती हूँ, कूड़े वाला आया होगा ।

दरवाजा खोला – दोनो भाई, उनके पीछे खड़ी दोनो भाभी, और बुआ बुआ कहते हुए भतीजे, भतीजी रज्जो के पैरों से लिपट गए। सभी के हाथों में झूलते भारी भरकम थैले, पांच साल के राखी के नेग की भरपाई करने को काफी थे।

रज्जो – ऐसे अचानक?

भाई : तू तो भूल ही गयी, भाइयों को। इस बार हम ही आ गए।

भाभी : दीदी, हर साल बस इंतज़ार करते समय गुजरता है, अब दीदी आएंगी, राखी बंधेंगी, न तुम आती हो न तुम्हारी राखी, लो इस बार हम ही आ गए।

रज्जो की आंखें खुशी से छलकने ही वाली थी, संभालते हुए बोली – आओ, अंदर आओ अब राखी क्या दरवाजे पर ही खड़े हो कर बँधाओगे। ब्रेड रोल बनाये हैं ले आऊ न ?

छोटा भाई : पहले राखी बांध दे, सूनी कलाई अब बर्दाश्त नही होती।

पल्लू की गांठ से 100 का नोट निकाल कर तनु को देते हुए बोली- जा जरा 6 राखी ले आ, दो सिंपल और 4 गुड्डे वाली अच्छी सी देख कर लीयो।

तनु- 100 में आ जायेगी? मैं भी ले लूं भाई के लिए? तनु ने बड़ी ही मासूमियत से पूछा, हैरान थी ये अचानक क्या हुआ।

रज्जो – ले 500 का ले जा, सबसे बढ़िया राखी लाना और कल्लू हलवाई से किलो भर मिठाई भी।

भाई, भाभी को देख सब गिला शिकवा भूल गयी, राखी के दिन भाई की सूनी कलाई आंखों में चुभने लगी, अपने को कोस रही थी, बेचारे कबसे राह देखते होंगे, और मैं अपनी झूठी शान में मरी जा रही थी। पापा जी माफ करना, मेरी मंशा बुरी नही थी।

घर मे रौनक हो गयी, राखी बंधी, मिठाइयां बटी, त्योहार का होना महसूस हुआ। रज्जो -भाभी रसोई में खाना पकाते हुए दीन दुनियां की कहानी में व्यस्त और इधर दोनो भाई, राजेश से व्यापार और राजनीति पर चर्चा में लीन। बच्चे तो बच्चे ही हैं, ना व्यापार समझते हैं ना ही दीन दुनिया को जानते हैं उनकी दुनिया सिर्फ माँ- बाप और उनकी जायदाद उनके खिलोने। हस्ते बोलते कब शाम हो गयी पता ही नही चला 4-5 घंटे, मिनट के समान लग रहे थे। इस साल पिताजी की कमी महसूस नही हुई, उन्ही के रिवाज के हिसाब से नेग मिला था।

बड़े भाई : छोटे वो, वकील साहब वाला पर्चा तो दस्तखत करा ले।

छोटे ने पर्चा निकाल कर रज्जो की तरफ बढ़ा दिया।

रज्जो : क्या है यह ? रज्जो ने पर्चा हाथ मे ले कर हैरानी से पूछा।

छोटा भाई : कुछ नही, वकीलों के चौचले है। तू नही समझेगी, दस्तखत कर दे।

रज्जो, दस्तखत करने को अंदर कमरे में चली गयी, काफी देर बाद भी जब रज्जो नही आई तो राजेश अंदर देखने गया।

रज्जो पलंग पर हाथ मे कलम लिए बैठी कुछ सोच रही है।

राजेश : क्या कर रही हो, बाहर सब इंतज़ार कर रहे हैं ।

रज्जो ने मुह उठा कर राजेश की तरफ देखा, उसकी आंखें बरस रही थी, सवाल कर रही थी, उसको क्या करना चाहिए। इससे पहले कभी रज्जो की ऐसी हालत नही देखा था, बेचैनी बढ़ी तो पर्चा रज्जो के हाथों से खींचते हुए पढ़ा, जिसमे जायदाद में रज्जो को हिस्सा नही चाहिए वो अपनी मर्जी से सारा हिस्सा छोड़ रही है वकीली भाषा मे लिखा था।

“यह तुम्हारा फैसला है, मैं इसमें कुछ नही कहूंगा। शायद दुनिया के सारे ऐशो आराम न दे सकूँ लेकिन दो रोटी देने की हैसियत है। बाकी तुम देखो।” राजेश के स्वर गंभीर थे।

रज्जो के मन मे सवालो का अंबार लगा था, दस्तखत किये तो कहीं राजेश गुस्सा न हो जाएं, न किये तो क्या भाई राखी बँधाएँगे। पांच साल में बहन की याद सिर्फ दस्तखत कराने के लिए ही तो नही आयीं? बहन जायदाद पर दावा ठोकेगी यही सोच कर तो इतना रूखापन नही था……

राजेश के जवाब से रज्जो को हिम्मत मिली।

दस्तखत करके पर्चा बड़े भाई को देते हुए बोली – भैया कहीं और भी दस्तखत करने हों तो बता देना। पिता ने जितना करना था कर दिया, वैसे भी लड़की तो पराई होती है, अब यही मेरा घर है, उस पर मेरा क्या अधिकार ये तो कानून ही गलत बना हुआ है।

दोनो भाई को शायद उम्मीद नही थी कि दस्तखत मिलेंगे, उनसे अधिक संशयः शायद दोनो भाभियों को था। सभी के चेहरे खिल उठे रज्जो की बात सुन कर। हसीं खुशी विदाई हुई, नेग के समान से घर भरा हुआ था। दोनो बच्चे, राजेश और रज्जो हाथ हिला कर सबको गाड़ी में जाते देख रहे थे। रज्जो का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था, आंखें आंसुओं से धुल कर चमक रही थी। मन मे एक ही विचार घूम रहा था,

आज रक्षाबंधन का नेग उसने दिया है भाइयों को।

रिश्ते जायदाद से अधिक अनमोल होते हैं, लेकिन हम सभी रिश्तों से अधिक जायदाद को एहमियत दे कर रिश्तों में दूरियां पैदा कर लेते हैं। थोड़े से मान सम्मान और नेग से कुछ नही बदलता।

प्रेम से ओत-प्रोत रिश्तों को सम्मान दीजिये और भाई बहन के इस पर्व को हंसी खुशी मनाइए। सभी को राखी के प्रेम भरे त्योहार की शुभकामनाएं।

Copyright: Dr.Vineet Sharma

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