रक्षक प्रभु

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इन्द्र से वरदान में प्राप्त एक अमोघ शक्ति कर्ण के पास थी । इन्द्र का कहा हुआ था कि इस शक्ति को तू प्राणसंकट में पड़कर एक बार जिस पर भी छोड़ेगा, उसी की मृत्यु हो जाएंगी, परंतु एक बार से अधिक इसका प्रयोग नहीं हो सकेगा । कर्ण ने वह शक्ति अर्जुन को मारने के लिए रख छोड़ी थी । उससे रोज दुर्योधनादि कहते कि तुम उस शक्ति का प्रयोग कर अर्जुन को मार क्यों नहीं देते । वह कहता कि आज अर्जुन के सामने आते ही उसे जरूर मारूंगा, पर रण में अर्जुन के सामने आने पर कर्ण इस बात को भूल जाता और उसका प्रयोग न करता । कारण यहीं था कि अर्जुन के रथ में सारथि के रूप में भगवान निरंतर रहते । अर्जुन का रथ सामने आते ही कर्ण को पहले भगवान के दर्शन होते । भगवान उसे मोहित कर लेते, जिससे वह शक्ति छोड़ना भूल जाता । वे हर तरह से अर्जुन को बचाने और जिताने के लिए सचेष्ट थे । उन्होंने स्वयं ही सात्यकि से कहा था –
‘हे सात्यकि ! मैंने ही कर्ण को मोहित कर रखा था, जिससे वह श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन को इंद्र की दी हुई शक्ति से नहीं मार सका था । मैं अपने माता पिता की, तुमलोगों की, भाईयों की और अपने प्राणों की रक्षा करना भी उतना आवश्यक नहीं समझता हूं । हे सात्यकि ! तीनों लोकों के राज्य की अपेक्षा भी कोई वस्तु अधिक दुर्लभ हो तो मैं उसे अर्जुन को छोड़कर नहीं चाहता ।’ धन्य है !
इसलिए भगवान ने भीमपुत्र घटोत्कच को रात के समय युद्धार्थ भेजा । घटोत्कच ने अपनी राक्षसी माया से कौरव – सेना का संहार करते करते कर्म के नाकों दम कर दिया । दुर्योधन आदि सभी घबरा गये । सभी ने खिन्न मन से कर्ण को पुकारकर कहा कि ‘इस आधी रात के समय यह राक्षस हम सबको मार ही डालेगा, फिर भीम अर्जुन हमारा क्या करेंगे । अतएव तुम इंद्र की शक्ति का प्रयोग कर उसे पहले मारो, जिससे हम सबके प्राण बचें ।’
आखिर कर्ण को वह शक्ति घटोत्कच पर छोड़नी पड़ी । शक्ति लगते ही घटोत्कच मर गया । वीर पुत्र घटोत्कच की मृत्यु देखकर सभी पाण्डवों की आंखों में आंसू भर आये । परंतु श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे हर्ष से प्रमत्त से होकर बार बार अर्जुन को हृदय से लगाने लगे । अर्जुन ने कहा – भगवन ! यह क्या रहस्य है ? हम सबका तो धीरज छूटा जा रहा है और आप हंस रहे हैं ? तब श्रीकृष्ण ने सारा भेद बतलाकर कहा कि ‘मित्र ! इंद्र ने तेरे हित के लिए कर्ण से कवच कुण्डल ले लिए थे, बदले में उसे एक शक्ति दी थी, वह शक्ति कर्ण ने तेरे मारने के लिए रख छोड़ी थी । उस शक्ति के कर्ण के पास रहते मैं सदा तुझे मरा ही समझता था । मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूं कि आज भी, शक्ति न रहने पर भी कर्ण को तेरे सिवा दूसरा कोई नहीं मार सकता । वह ब्राह्मणों का भक्त, सत्यवादी, तपस्वी, व्रताचारी और शत्रुओं पर भी दया करनेवाला है । मैंने घटोत्कच को इसी उद्देश्य से भेजा था । हे अर्जुन ! तेरे हित के लिए ही मैं यह सब किया करता हूं । चेदिराज शिशुपाल, भील एकलव्यस जरासंध आदि को विविध कौशलों से मैंने इसलिए मारा या मरवाया था, जिससे वे महाभारत समर में कौरवों का पक्ष न ले सकें । वे आज जीवित होते तो तेरी विजय बहुत ही कठिन होती । फिर यह घटोत्कच तो ब्राह्मणों का द्वेषी, यज्ञद्वेषी, धर्म का लोप करनेवाला और पापी था । इसे तो मैं ही मार डालता, परंतु तुमलोगों को बुरा लगेगा, इसी आशंका से मैंने नहीं मारा ।’ आज मैंने ही इसका नाश करवाया है –
‘जो पुरुष धर्म का नाश करता है, मैं उसका वध कर डालता हूं । धर्म की स्थापना करने के लिये ही मैंने यह अटल प्रतिज्ञा की है । मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूं कि जहां ब्रह्मभाव, सत्य, इंद्रियदमन, शौच, धर्म (बुरे कर्मों में), लज्जा, श्री, धैर्य और क्षमा हैं, वहां मैं नित्य निवास करता हूं ।’
अभिप्राय यह है कि तुम्हारे अंदर ये गुण हैं, इसलिए मैं तुम्हारे साथ हूं और इसलिए मैंने कौरवों का पक्ष त्याग रखा है, नहीं तो मेरे लिए सभी एक से हैं । फिर तुम घटोत्कच के लिए शोक क्यों करते हो ? अपना भाई भी हो तो क्या हुआ, जो पापी है वह सर्वथा त्याज्य है । इस प्रकार मित्र अर्जुन के प्राण और धर्म की भगवान ने रक्षा की
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