युधिष्ठिर की भूल

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🍁 🍁 🍁युधिष्ठिर की भूल 🍁 🍁 🍁
महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। चारों छोटे भाई सदा उनकी सेवा में लगे रहते थे। युधिष्ठिर का नियम था कि प्रतिदिन वह द्रौपदी के साथ राजमहल के मुख्य द्वार पर खड़े होते और आने वाले याचकों को उनकी अपेक्षा के अनुरूप सामग्री भेंट करते। सुबह से लेकर दोपहर तक धर्मराज का यह दान चलता था। एक दिन धर्मराज सभी को दान देकर राजमहल लौट आए। वह आसन पर बैठने को ही थे कि भीम ने आकर सूचना दी, दो याचक और आए है। वे बड़ी दूर से पहुंचे हैं और दर्शन तथा अपेक्षानुरूप सामग्री की कामना से भरे हैं। युधिष्ठिर उस दिन कुछ थके थे। उन्होंने भीम से कहा, ‘याचकों से कहो कि अब कल भेंट होगी।’ यह सुनकर भीम बाहर आए और राजमहल की सीढ़ियों पर खड़े होकर जोर-जोर से कहना शुरु किया, ‘हमारे महाराज अब तक धर्मराज थे। अब यमराज भी हो गए हैं।’ भीम का शोर सुन युधिष्ठिर आखिरकार बाहर आए और उनकी बात का अर्थ पूछा। भीम ने विनम्रता से कहा, ‘महाराज, आपने ही कहा था कि याचकों को कल बुलाऊं। आपकी बात और आने वाले कल पर आपका इतना विश्वास देख मुझे लगा कि आप तो यमराज ही हो गए हैं जो इतने विश्वास से कह सकते हैं कि कल आना। आपको इतना विश्वास है कि कल आप जीवित रहेंगे। मैंने तो सुना था कि जीवन का भरोसा एक पल भी नहीं। तब आप कैसे कह सकते है कि कल आना?’ युधिष्ठिर को तत्क्षण अपनी भूल का भान हुआ और उन्होंने उसी समय विलंब से पहुंचे दोनों याचकों को दान देकर विदा किया। युधिष्ठिर ने स्वीकारा कि अपने कार्य को कल पर लंबित नहीं करना चाहिए। ‘काल करे सो आज कर’ की प्रसिद्ध पंक्ति का यही आशय है कि अपने काम को कभी भी दूसरे दिन पर नहीं टालना चाहिए, उसे तुरंत करना चाहिए।
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