मै सुहागन हूँ

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कुछ दिन पहले मै घर का कुछ सामान खरीदने मार्किट जा रही थी ,तभी सामने से भागते हुए लोगों की भीड़ पर मेरी नजर पड़ी ,पलक झपकते ही अपने साथ धूल उडाती हुई उस भीड़ का मै हिस्सा बन गयी और एक युवती से जा टकराई ,सामने देखा तो उस युवती का चेहरा हल्दी सा पीला था ,घबराहट और डर के मारे वह कांप रही थी , उसकी सांस फूल रही थी और आँखे जैसे कुछ कहना चाह रही थी ,उसने पीछे मुड़ कर भीड़ को देखा और भाग कर एक दुकान की ओट में दुबक कर बैठ गई |
इतने में चार पांच आवारा किस्म के लड़के भागते हुए , आँखे मानो, किसी को खोजती हुई मेरे आगे से निकल गए |उनके जाते ही , मैने अपनी नजरें उस दुबकी हुई युवती की ओर घुमाई ,वो अभी भी उसी मुद्रा में बैठी हुई थी |
मै भी सतर्कता से धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ी और अपना हाथ उसके काँधे पर रखा ,मेरे हल्के से स्पर्श से ही वह चौंक उठी ,उसके भयभीत चेहरे की रंगत अभी भी उड़ी हुई थी ,होंठ कांपते हुए कुछ कहना चाह रहे थे ,
अपने हाथ का सहारा दे कर मैने उसे उपर उठाया |पता नहीं उस युवती से मेरा क्या रिश्ता था , मैने सान्त्वना देते हुए उसे गले से लगा लिया , मेरे गले लगाते ही वह मुझसे लिपट कर जोर जोर रोने लगी , रोते रोते उसकी हिचकी बंध गई ,वह कुछ बोलना चाहती थी लेकिन उसके रुंद्धे गले से आवाज नहीं निकल रही थी ,उसे जोर से अपने सीने से लिपटा लिया , उसे इस तरह रोते देख मै भी भावुक हो उठी और नम आँखों से उसे प्यार किया |
उसे मै अपने घर ले आई , पानी पिलाया और मैने उसका ढांढस बंधाया और धीरे धीरे जब वह सामान्य हुई , तो उसने अपनी कहानी बताई |
वह एक विधवा औरत थी , हाल ही में हुए एक कार एक्सीडेट में उसके पति की मौत हो गई ,इस हादसे के बाद उसकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी |जिसको वह अपना कह सके ऐसा इस दुनिया में कोई नहीं था, ससुराल वालों ने मनहूस कह घर से निकाल दिया ,हाँ एक भाई है जिसने उसे सहारा तो दिया, लेकिन भाभी के तानो ने वहां उसका जीना दुर्भर कर दिया |
एक दिन सबको छोड़ वह अपनी एक सहेली के संग रहने लगी और एक आफिस में छोटी मोटी नौकरी कर अपना पेट पालने लगी ,लेकिन हमारे ही समाज के कुछ तथाकथित सभ्य लोगों की भूखी नजरें उस पर पड़ गई |
वह जहां भी जाती उसके जिस्म को नोचने वाली निगाहें उसका पीछा नहीं छोडती , हर कोई ऐरा गेरा , उसके करीब आने की कोशिश करता और उस दिन तो हद पार हो गई जब भरे बाज़ार में भूखे भेड़ियों की तरह चार बदमाश उसके पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे |
उसकी दर्द भरी कहानी सुन मै दुखी और परेशान हो गई और उस रात उसे अपने घर रुकने को कहा. मेरे सहानुभूति भरे दो शब्द सुन वह उस रात मेरे घर रुक गई |
मै उस रात ठीक से सो नहीं पाई ,बार बार उसका चेहरा मेरी बंद पलकों में आ कर मुझे बेचैन करता रहा , कब सुबह हो गई , पता ही नहीं चला |जागते ही मै उसके कमरे में गई जहां वो रात भर सोई थी , लेकिन मुझे मिला एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा , जिस पर लिखा था ‘धन्यवाद’ ,बिन बताये वो कहाँ चली गई पता नहीं ?
दिन महीने गुजर गये ,धीरे धीरे मै भी उसे भूल गई और अपनी रोज़ मर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो गई कि अचानक एक दिन बाज़ार में ही उससे सामना हो गया उसका वो बदला हुआ रूप देख मै सकते में आ गई, मांग में सिंधूर, माथे पर लाल रंग की एक बड़ी सी बिंदिया , गले में मंगल सूत्र ,कलाईयों में हरे रंग की कांच की चूड़ियाँ, और मैने उससे कहा,”अच्छा किया जो तुमने शादी कर ली ”|
मेरी बात सुन वह मुस्करा दी ,”नहीं दीदी ,मैने शादी नहीं की ,यह सब सुहाग के प्रतीक चिन्ह पहन कर मैने अपने आप को लोगो की कामुक नजरों से बचाया है , यह सिंदूर आज भी मैने अपने पति के नाम का लगाया है , यह मेरे माथे की बिंदिया, यह मंगलसूत्र , यह चूड़ियाँ, पाँव में बिछुयें , सब उनके ही नाम के है मैने उनसे सिर्फ उनसे ही प्यार किया है ,भले ही वह शारीरिक रूप से आज मेरे साथ नहीं है लेकिन वो जिंदा है मेरे मन में ,मेरी यादों में ,वह न होते हुए भी हर पल मेरे साथ है |आज भी मेरा प्यार उनको सिर्फ उनको ही समर्पित है |
महिला के सुहाग के यह प्रतीक चिन्ह किसी की दासता को नहीं अपितु उसके भावनात्मक समर्पण को दर्शाते है और मै भावनात्मक रूप से आज भी उनसे उतनी ही जुडी हुई हूँ जितनी पहले थी |उनके जाने के बाद जब मैने इन प्रतीक चिन्हों को पहनना छोड़ दिया था तो मेरी जिंदगी में एक सूनापन आ गया था ,लेकिन आज इन्हें फिर से धारण कर मुझे एक बार फिर यह एहसास होने लगा है कि” मै सुहागन हूँ”,जी हां ”मै सुहागन हूँ ”
  सोर्स:https://bit.ly/2PYOrrm

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