मैं हूँ ना

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रमेश की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, उसे अपनी गलती लग रही थी। सब घटनाये चलचित्र सी आँखों के सामने से गुजर रही थी।
कॉलेज के दिनों में ही उसे अपनी जूनियर राखी से प्यार हो गया। रमेश को पता था जातीय भिन्नता के चलते उसके घर बाले उसका विवाह राखी से होने नही देगे इसलिये उसने अपने प्यार को ताकत बनाया और राखी के नाम पर जी जान लगा कर नौकरी के लिये कोशिशे की, उसके मेहनत रंग लाई उसे लिपकीय संवर्ग में नौकरी मिल गई।
वही हुआ जिसका डर था, पिता जी साफ साफ कह दिया शादी उनकी ही विरादरी में होगी अगर नही करनी तो यह घर हमेशा के लिये छोड़ना होगा।
रमेश ने राखी से शादी की और अपने पिता का घर और संबंध दोनों हमेशा के लिये छोड़ दिये।
राखी के मायके बालो ने साथ दिया, रमेश अपनी ससुराल में ही राखी के साथ रहने लगा।
सब कुछ बढिया चल रहा था कि एक दिन आफिस से घर वापिस आते समय रमेश का गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया, चोट पैर में थी रमेश के दोनों पैर काटने पड़े।
रमेश के पिता ने “धर्म विरुद्ध काम किया है तो परिणाम भुगतो, हमसे कोई उम्मीद मदद की मत करना हमारे लिये तो तुम उसी दिन मर गये थे जब अपने मन की शादी करके घर छोडा था” कह कर खुद को अलग ही रखा।
तब भी सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, आज रमेश ने, राखी के भाई और भाभी की बाते धोखे से सुनी तब उसे लगा कि वो अपाहिज अब अपनी ससुराल में बोझ है।
अपनी दुर्दशा सोंच सोंच कर रमेश के आँसू बह रहे थे, राखी को भी मैं अपाहिज अब बोझ लग रहा होऊँगा, रमेश सोंच रहा था कि राखी समान समेटती सी उसके पास आई और बोली
“मैंने एक किराये का घर देख लिया है, अब हम वही रहेंगे, मैं खुद कोई न कोई काम करुँगी, हमे किसी पर बोझ नही बनाना”
रमेश समझ गया राखी ने भी अपने भाई की बात सुन ली है, उसने राखी से पूँछा
“तुम अकेले घर बाहर सब जिम्मेदारी अकेले कैसे उठा पाओगी?”
“मेरा साथ देने के लिये तुम हो ना” राखी ने मुस्कुरा कर कहा
“मुझ अपाहिज से क्या होगा ?” उदास रमेश ने गहरी सांस ली
“तुम्हारा साथ देने को मैं हूँ ना” राखी ने रमेश का हाँथ पकड़ते हुये मुस्कुरा कर कहा।
अम्बिका कुमार शर्मा(राजा)
अमृत नगर कालोनी, महोबा जनपद

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