मैं तो कृष्ण हो गया !

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भगवान ! मेरा उद्धार करो ! मेरी नौका पार लगाओ । मेरे पापों के बोझ से बस, यह डूबना ही चाहती है । बड़ी जीर्ण है यह, और फिर ऊपर से बोझ बेतौल है । विपरीत बयार बह रही है, चारों और घोर अंधकार छाया हुआ है, हाथों हाथ नहीं सूझता । खेने की कला भी नहीं मालूम । एकमात्र तुम्हारा ही भरोसा है । तुम्हीं पार लगाने वाले हो !
मुरारे ! क्षमा करो, अपरोधों को क्षमा करो, नहीं तो मेरा कहीं ठौर – ठिकाना नहीं । बड़ा अधम हूं मैं । जीवनभर पाप पंक मे ही पड़ा रहा, दिन के चौबीस घण्टे और वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन भू – भार को बढ़ाने में ही बिताये । भूलकर भी कभी तुम्हें स्मरण नहीं किया । परमात्मन ! मुझे अपनाओ ! शपथपूर्वक कहता हूं, मुझे अपनी करनी पर बड़ी आत्मग्लानि होती है, पछता रहा हूं, विश्वास रखो, अब ऐसा नहीं होगा । अब संभलकर चलूंगा, दीनों की दीनता पर ध्यान दूंगा, दुखियों के दु:ख दूर करूंगा, भूखों को भोजन दूंगा, निर्वस्त्रों को वस्त्र पहनाऊंगा, सच कहता हूं, सदा परोपकार रत रहूंगा – पाप की कमाई पुण्य कार्यों में लुटाऊंगा, कुकृति के कलंक को सुकृति के सरोवर में धो डालूंगा ।
जगदीश्वर ! बड़ा मूर्ख बना में । अहंकारवश प्रतिज्ञा कर डाली संसार को संकटमुक्त करने की । तुम्हारी शक्ति का ध्यान तक नहीं किया । यह नहीं सोचा कि शक्ति के स्त्रोत तो तुम्हीं हो, तुम्हारी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । मनुष्य बना फिरे चाहे जो, वास्तव में उसकी कोई हस्ती नहीं, उसका अस्तित्व तुम्हारी अनुकंपा पर ही निर्भर है । मैंने अपनी सारी पूंजी लुटा दी, दिन रात को एक कर दिया, खाना पीना सोना धोना सब कुछ भूल गया, सदा गद्दी का आदी मैं गांव गांव और वन वन मारा मारा फिरा, और भी अनेकों को अपना साथी बनाया, पर आज कई वर्षों के बाद देखता हूं, देश की दशा नहीं सुधरी । यहीं नहीं, बल्कि दिन दिन बिगड़ ही रही है । संतापों का संताप बढ़ ही रहा है, अन्याय और अत्याचार का आतंक फैलता ही जाता है । समझ लिया, भलीभांति समझ लिया, तुम्हारी दया के बिना कुछ भी संभव नहीं । तुम जबतक बल नहीं देते तबतक कोई बलवान नहीं हो सकता । इसलिए अब तुम्हीं से विनम्र निवेदन करता हूं, मुझे वह शक्ति दो, जिससे मैं संसार को संकटमुक्त कर सकूं ।
करूणाकर कृष्ण, करूणा करो ! दयासागर कृष्ण, दया दिखलाओ ! कृपालु कृष्ण, द्रवित हो जाओ, राधारमण कृष्ण, मुझमें भी रम जाओ ! दीनतापहारी देव कृष्ण, मेरी दीनता पर तरस खाओ ! नयन सुखकंद कृष्ण, मेरे नयनों की प्यास बुझाओ ! अशरण शरण कृष्ण, मुझे शरण दो । भक्तवत्सल कृष्ण, भावमय प्रेम से मुझे धन्य करो ! बालकृष्ण, मुझे ‘मुकुट की लटकन, पगन की पटकन तथा लहराती हुई काली अलकन के साथ, मधुर मुस्कानसहित मुख की मटकन की छटा’ दिखलाओ ! मानिनी गोपांगनाओं के मान को दूर करने के अभिप्राय से अंतर्धान होने के बाद उनका विरहविलाप सुनकर पुन: प्रकट होनेवाले प्रेम कृष्ण, मेरे सम्मुख भी प्रकट होकर मेरा परिताप हरो ! द्रौपदी की लाज रहनेवाले कृष्ण, तनिक अपने भक्त की भी लाज रखो ! गजराज को उबारनेवाले कृष्ण, मुझे डूबते को उबारे । खंभ फाड़कर प्रकट हो प्रह्लाद की रक्षा करने वाले कृष्ण, इस दीन की भी व्यथा हरो ! राधाकृष्ण, गोपीकृष्ण ! हरे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !!!
अरे, यह क्या ? मैं किसे ढूंढ़ता था ? किसे खोजता था ? किसके लिए विलाप करता था ? किसके लिए पागल हुआ फिरता था ? किसे चाहता था, और किससे मांगता था ? कहां था ? और कौन था ? – सर्वत्र कृष्ण ही तो है ? सब कुछ कृष्ण ही तो है ? वंशी की तान में मोहन के गान में, बालक की बोली में, साधू की झोली में, परमहंस की ठठोली में कृष्ण ही कृष्ण । मूक की मूकता में, अंध की अंधता में, दीन की दीनता में, मूर्ख की मूर्खता में सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण । ज्ञानी के ज्ञान में, ध्यानी के ध्यान में, योगी के योग में, भोगी के भोग में, रोगी के रोग में, वियोगी के वियोग में – सब जगह कृष्म ही कृष्ण । प्रेमी के प्रेम में, नेमी के नेम में कृष्ण ही कृष्ण । जपिया के जप में, तपिया के तप में कृष्ण ही कृष्ण ! घर में, द्वार में, सर सरिता में, वन – उपवन में, पवि पर्वत में , धन – दौलत में, खड्ग खंभ में, मुझमें सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण ।
देह प्राण में, तन में, मन में, अंग अंग में, रोम – रोम में, कृष्ण ही कृष्ण । कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! वह कृष्ण । मैं कृष्ण । बस, कृष्ण । कृष्ण ! ! कृष्ण !!!
कृष्ण कृष्ण कहते मैं तो कृष्ण हो गया ।
कृष्ण कृष्ण कहते मैं तो कृष्ण हो गया ।
अहं ब्रह्मास्मि !भगवान ! मेरा उद्धार करो ! मेरी नौका पार लगाओ । मेरे पापों के बोझ से बस, यह डूबना ही चाहती है । बड़ी जीर्ण है यह, और फिर ऊपर से बोझ बेतौल है । विपरीत बयार बह रही है, चारों और घोर अंधकार छाया हुआ है, हाथों हाथ नहीं सूझता । खेने की कला भी नहीं मालूम । एकमात्र तुम्हारा ही भरोसा है । तुम्हीं पार लगाने वाले हो !
मुरारे ! क्षमा करो, अपरोधों को क्षमा करो, नहीं तो मेरा कहीं ठौर – ठिकाना नहीं । बड़ा अधम हूं मैं । जीवनभर पाप पंक मे ही पड़ा रहा, दिन के चौबीस घण्टे और वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन भू – भार को बढ़ाने में ही बिताये । भूलकर भी कभी तुम्हें स्मरण नहीं किया । परमात्मन ! मुझे अपनाओ ! शपथपूर्वक कहता हूं, मुझे अपनी करनी पर बड़ी आत्मग्लानि होती है, पछता रहा हूं, विश्वास रखो, अब ऐसा नहीं होगा । अब संभलकर चलूंगा, दीनों की दीनता पर ध्यान दूंगा, दुखियों के दु:ख दूर करूंगा, भूखों को भोजन दूंगा, निर्वस्त्रों को वस्त्र पहनाऊंगा, सच कहता हूं, सदा परोपकार रत रहूंगा – पाप की कमाई पुण्य कार्यों में लुटाऊंगा, कुकृति के कलंक को सुकृति के सरोवर में धो डालूंगा ।
जगदीश्वर ! बड़ा मूर्ख बना में । अहंकारवश प्रतिज्ञा कर डाली संसार को संकटमुक्त करने की । तुम्हारी शक्ति का ध्यान तक नहीं किया । यह नहीं सोचा कि शक्ति के स्त्रोत तो तुम्हीं हो, तुम्हारी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । मनुष्य बना फिरे चाहे जो, वास्तव में उसकी कोई हस्ती नहीं, उसका अस्तित्व तुम्हारी अनुकंपा पर ही निर्भर है । मैंने अपनी सारी पूंजी लुटा दी, दिन रात को एक कर दिया, खाना पीना सोना धोना सब कुछ भूल गया, सदा गद्दी का आदी मैं गांव गांव और वन वन मारा मारा फिरा, और भी अनेकों को अपना साथी बनाया, पर आज कई वर्षों के बाद देखता हूं, देश की दशा नहीं सुधरी । यहीं नहीं, बल्कि दिन दिन बिगड़ ही रही है । संतापों का संताप बढ़ ही रहा है, अन्याय और अत्याचार का आतंक फैलता ही जाता है । समझ लिया, भलीभांति समझ लिया, तुम्हारी दया के बिना कुछ भी संभव नहीं । तुम जबतक बल नहीं देते तबतक कोई बलवान नहीं हो सकता । इसलिए अब तुम्हीं से विनम्र निवेदन करता हूं, मुझे वह शक्ति दो, जिससे मैं संसार को संकटमुक्त कर सकूं ।
करूणाकर कृष्ण, करूणा करो ! दयासागर कृष्ण, दया दिखलाओ ! कृपालु कृष्ण, द्रवित हो जाओ, राधारमण कृष्ण, मुझमें भी रम जाओ ! दीनतापहारी देव कृष्ण, मेरी दीनता पर तरस खाओ ! नयन सुखकंद कृष्ण, मेरे नयनों की प्यास बुझाओ ! अशरण शरण कृष्ण, मुझे शरण दो । भक्तवत्सल कृष्ण, भावमय प्रेम से मुझे धन्य करो ! बालकृष्ण, मुझे ‘मुकुट की लटकन, पगन की पटकन तथा लहराती हुई काली अलकन के साथ, मधुर मुस्कानसहित मुख की मटकन की छटा’ दिखलाओ ! मानिनी गोपांगनाओं के मान को दूर करने के अभिप्राय से अंतर्धान होने के बाद उनका विरहविलाप सुनकर पुन: प्रकट होनेवाले प्रेम कृष्ण, मेरे सम्मुख भी प्रकट होकर मेरा परिताप हरो ! द्रौपदी की लाज रहनेवाले कृष्ण, तनिक अपने भक्त की भी लाज रखो ! गजराज को उबारनेवाले कृष्ण, मुझे डूबते को उबारे । खंभ फाड़कर प्रकट हो प्रह्लाद की रक्षा करने वाले कृष्ण, इस दीन की भी व्यथा हरो ! राधाकृष्ण, गोपीकृष्ण ! हरे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !!!
अरे, यह क्या ? मैं किसे ढूंढ़ता था ? किसे खोजता था ? किसके लिए विलाप करता था ? किसके लिए पागल हुआ फिरता था ? किसे चाहता था, और किससे मांगता था ? कहां था ? और कौन था ? – सर्वत्र कृष्ण ही तो है ? सब कुछ कृष्ण ही तो है ? वंशी की तान में मोहन के गान में, बालक की बोली में, साधू की झोली में, परमहंस की ठठोली में कृष्ण ही कृष्ण । मूक की मूकता में, अंध की अंधता में, दीन की दीनता में, मूर्ख की मूर्खता में सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण । ज्ञानी के ज्ञान में, ध्यानी के ध्यान में, योगी के योग में, भोगी के भोग में, रोगी के रोग में, वियोगी के वियोग में – सब जगह कृष्म ही कृष्ण । प्रेमी के प्रेम में, नेमी के नेम में कृष्ण ही कृष्ण । जपिया के जप में, तपिया के तप में कृष्ण ही कृष्ण ! घर में, द्वार में, सर सरिता में, वन – उपवन में, पवि पर्वत में , धन – दौलत में, खड्ग खंभ में, मुझमें सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण ।
देह प्राण में, तन में, मन में, अंग अंग में, रोम – रोम में, कृष्ण ही कृष्ण । कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! वह कृष्ण । मैं कृष्ण । बस, कृष्ण । कृष्ण ! ! कृष्ण !!!
कृष्ण कृष्ण कहते मैं तो कृष्ण हो गया ।
कृष्ण कृष्ण कहते मैं तो कृष्ण हो गया ।
अहं ब्रह्मास्मि !

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