मेरी भाभी-पल्लवी विनोद

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मैं गरिमा अपने दोनों भाइयों की लाडली बहन।आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाना चाहती हूँ।मेरी कहानी,मेरी भाभी की कहानी।

‘वो’ उम्र में मुझसे एक साल छोटी है लेकिन मेरे बड़े भाई की पत्नी है तो पद में मुझसे बड़ी है।जब भइया की शादी ठीक हुई तो मेरी सभी सहेलियाँ मुझसे कहने लगीं,”अब तेरा राज खत्म गरिमा,अब तो तेरे घर पर तेरी भाभी का राज चलेगा।सच कहूँ तो बहुत डर लगता था मुझे।भाभी एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की थीं तो डर लगता था कि कहीं हम पर रौब न जमाये।मेरे इस डर के बारे में मैं कभी किसी से कुछ न कहती, बस खुद से हर रोज नए सवाल और जवाब सोचती रहती।

आखिर वो दिन भी आ गया जब लाल जोड़े में सजी मेरी गुड़िया सी भाभी हमारे घर आ गयी।उसका मासूम चेहरा देखते ही मेरे सारी शंकाएं खत्म हो गईं।जब वो अपनी पायल झनकाती,चूड़ियाँ छनकाती घर में चलती तो लगता मेरा घर अनगिन सूर्य रश्मियों से चमक उठा है।

माँ-पापा भइया सब उसकी मासूमियत के दीवाने हो गए थे।कोई काम आए न आये सब करने की कोशिश करती।दिन भर गुनगुनाती,खिलखिलाती रहती।आस-पड़ोस हर जगह उसकी ही चर्चा होती।

बहुत खुश थी मैं इतनी प्यारी भाभी पा कर लेकिन कुछ और भी था जो इन खुशियों के साथ मेरे मन में उसके प्रति भर रहा था।जिस घर में दिन भर गरिमा-गरिमा होता था,वो घर अब सलोनी के नाम से गूंजने लगा।जो भाई कभी मेरे नखरे उठाते थे वो अब उसके गुण गाने लगे।

‘भाभी’ शब्द ही चुभने लगा था।मैं धीरे-धीरे घर से दूर होने लगी।अजीब सा अकेलापन लगने लगा था अपने ही घर में।सलोनी मुझसे जितना अच्छा बर्ताव करती मैं उतना ही कुंठित हो रही थी।कभी-कभी लगता वो पहले जैसी खुश नहीं रहती अब,फिर भी मैं उससे कुछ नहीं पूछती थी।

घर पर किसी को कुछ जाहिर नहीं होने देती लेकिन मैंने उससे बातें करना भी कम कर दिया था।जलन और कुंठा ने मुझे अंदर ही अंदर बहुत परेशान कर रखा था लेकिन दूसरों के सामने मैं उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार रखती।इसी बीच मेरी तबियत बहुत खराब हो गयी,भाभी मेरा बहुत खयाल रखती,उतना ख्याल तो कभी मां ने नहीं रखा था।टायफॉइड की वजह से बहुत कमजोरी हो गयी थी,वो दिन रात बस मेरे साथ ही लगी रहती थी।एक दिन मुझे उलटी करते देख वो रोने लगी,भइया माँ सब उसे ही चुप कराने लगे।मुझे लगा,वो प्यार का नाटक कर रही है भला कोई अपनी ननद के लिए इतना परेशान कैसे हो सकता है।

घर में मेरी शादी की बात भी चलने लगी थी।हर कोई मुझसे कहता,”अपनी भाभी जैसी बहू और भाभी बनना”मैं बस मुस्कुराकर रह जाती।मन में सोचती इसके जैसी अच्छी बनने का नाटक कैसे करूँगी।लेकिन भगवान ने हमारे लिए कुछ और ही सोच रखा था।

भइया की शादी के डेढ़ साल बाद ही हमारे जीवन का सबसे खराब समय आया।एक दिन रात को पापा की तबियत अचानक बहुत खराब हो गयी,भइया उस समय काम के सिलसिले में बाहर गए हुए थे।छोटे भइया दिल्ली में पढ़ते थे।हम सब बहुत घबरा गए पर भाभी ने उस समय बहुत हिम्मत दिखाई,हम दोनों मिलकर पापा को हॉस्पिटल ले गए,वहाँ डॉक्टर्स ने कहा कि पापा को ब्रेन हैमरेज हो गया है।हालत ठीक नहीं है।हम दोनों 22-23 साल की लड़कियां ही थे,बात-बात पर रोने वाली भाभी अचानक से बहुत मजबूत हो गयी।मुझे पकड़ कर बैठ गईं।इस तरह से सम्भाल रही थी जैसे वो मुझसे छोटी न होकर 10-15 साल बड़ी कोई समझदार औरत हो।

पर समय पर किसका बस चला है।पापा, एक अनंत यात्रा पर चले गए।हम सबको अकेला छोड़,अनाथ कर गए।माँ को सदमा लग गया था,2 महीने तक वो बिस्तर पर ही पड़ी रहीं।भाभी उस समय 1 महीने की प्रेग्नेंट थीं,जाने उस लड़की में कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी।सारा काम अकेले सम्भाल लिया।मैं तो पापा के गम में सबकुछ भूल गयी थी।अपनी बीमार माँ को देख कर एक दिन मैं बहुत टूट गयी और कहने लगी मैं अनाथ हो गयी भाभी,सब खत्म हो गया।अब मुझे भी नहीं जीना।

उसने मुझे बहुत तेज से अपनी बाहों खींच लिया,और खूब रोई।वो कहने लगी,”दीदी ऐसे मत बोलिये,जब तक मैं जिंदा हूँ आपको पापा की कमी महसूस नहीं होने दूँगी और माँ बहुत जल्दी ठीक हो जायेंगी।मैंने आपको कभी बताया नहीं,मेरी एक दीदी थीं मुझसे दो साल बड़ी।बचपन में उनकी तबियत बहुत खराब हो गयी और कुछ ही दिनों में वो हमें छोड़कर चली गईं।मुझे उनकी बहुत याद आती थी,हम हमेशा साथ खाते,साथ सोते और साथ खेलते थे।मुझे आज भी याद है वो रात जब उनको खूब उल्टियाँ हो रही थीं।मम्मी पापा उनको हॉस्पिटल ले कर गए लेकिन वो वापस नहीं आईं।हॉस्पिटल जाते समय वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थीं।आज भी वो मुस्कान भूल नहीं पायी हूँ।”

दीदी,जब आपको पहली बार देखा तो आप मुझे देख उसी तरह मुस्कुरायी थीं,मुझे लगा मेरी दीदी वापस मिल गयी।अब आप मुझे छोड़कर कभी मत जाइयेगा। ये कहकर वो फिर से रोने लगी।शर्म आ रही थी मुझे अपनी सोच पर,मैंने क्या सोचा था उसके बारे में और वो क्या है।हम सब अपने गम में परेशान थे,कोई ये नहीं सोच रहा था कि इस समय उसे हमारी जरूरत है।उसके जीवन का जो पल खुशियों से चहकता होना चाहिए था उन्हीं पलों में वो इतना कष्ट इतना दर्द झेल रही है।बस पोंछ लिए मैंने अपने आँसू और माँ को भी बहुत समझाया।

या कहिये उसने इन आँसुओं को विदाई के अलावा कभी बहने ही नहीं दिया,जाने क्या समझाया कि मेरे 28 साल के भइया अचानक मेरे पापा बन गए।सच में जादूगरनी है मेरी भाभी,सब पर जादू कर देती है।लेकिन वो कहती है,हमने उन्हें इतना प्यार दिया कि वो हमारी अपनी बन गयी।मेरा कन्यादान मेरे भाई-भाभी ने ही किया था,वो पूरी रात रोती रही।विदाई के वक़्त ऐसे पकड़ लिया जैसे मुझे जाने ही नहीं देगी।

आज भी मेरे पति हँस कर कहते हैं,भाभी जी आपने तो विदाई में मुझे डरा ही दिया था।दस साल हो गए मेरी शादी को,लेकिन आज भी मेरे हर दुःख-सुख की सबसे बड़ी साथी है मेरी भाभी।मेरे बच्चों की जान बसती है उनकी सलोनी मामी में।मेरे और मेरी ननद के बीच भी बहुत प्यारा रिश्ता है और उसकी वजह भी वही है।उसने ही मुझे समझाया कि रिश्ते खून से नहीं प्रेम से जुड़ते हैं,प्रेम जो निश्छल हो,प्रेम जिसमें रिश्तों का अहम न हो,प्रेम जिसमें किसी तरह का बंधन न हो।

पल्लवी विनोद

 

 

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