माँ को बुलाओ!

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“सब कुछ सही चल ही रहा था कि एक दिन अग्रेजी के अध्यापक बहुत गुस्सा हो गए, क्योंकि बार-बार सिखाने के बाद भी उसने सही उत्तर नहीं दिए।”

माँ के गुज़र जाने के बाद पाखी को नाना नानी पाल रहे थे। पारिवारिक अनबन के कारण पिता से कभी मुलाकात नही हुई। उसे ये सिखा दिया गया था, “अगर कोई पूछे माता पिता के बारे मे तो कह देना नही है, और नाना नानी के पास रहती है और वह यही करती रही। पाखी बड़ी हो रही है।अब वो कक्षा तीसरी मे आ गई है। वैसे तो बहुत बातें करती हैं पर यहाँ चुप सी है। शायद थोड़ा झिझक रही है, हो भी क्यों ना, नया स्कूल, नए छात्र, नए टीचर और नई भाषा, सब कुछ नया। धीरे-धीरे वक्त के साथ वह माहौल में ढल गई है। परिक्षा हुई पर परिणाम से खुश नहीं है।
हर साल जो कक्षा में प्रथम द्वितीय आती थी वह जैसे तैसे पास हुई है, घर मे तो सब खुश थे पर वो खुद नही। अभी तक जिस स्कूल में थी वहाँ पढ़ाई तो अंग्रेजी में होती थी, पर बोल चाल की भाषा हिन्दी थी, वैसी ही जैसी घर पर होती। पर यहाँ अंग्रेजी ही माध्यम है बोल चाल का शायद इसीलिए ऐसा हुआ। क्लास टीचर को रिपोर्ट कार्ड देने गए तो पाखी की तरफ देखते हुए नाना जी से मैडम बोली, “और मेहनत की जरूरत है, प्यारी बच्ची है कर लेगी। क्यों पाखी?”
पाखी ने जरा सा मुस्कुराहट के साथ हामी भरी दी।
नाना जी बिनती करते हुए बोले, “मैडम जी थोड़ा ध्यान दे दीजिए।”, अभिवादन किए और घर चल दिए।
क्लास टीचर  को पसंद थी इसलिए मैडम थोड़ा सख्ती से पेश आने लगी, और धीरे-धीरे बाकी अध्यापक भी। जैसे भी अध्यापक उसे बेहतर बना सकते थे, कोशिश करने लगे। अब सही जवाब न देने पर, या बाते करने पर या किसी भी प्रकार की गलती पर उसे सज़ा मिलने लगी है। उसे कभी-कभी कक्षा से बाहर निकाल दिया जाता, कभी जगह पर खड़ा कर दिया जाता, तो कभी जगह बदल दी जाती तो कभी ज़मीन पर बैठा दिया जाता। शायद शिक्षकों को लगता था कि वह और अच्छा कर सकती है, तो यह सिलसिला अब आम हो गया।
 
सब कुछ सही चल ही रहा था कि एक दिन अग्रेजी के अध्यापक बहुत गुस्सा हो गए, क्योंकि बार-बार सिखाने के बाद भी उसने सही उत्तर नहीं दिए। सर ने डायरी मँगाई, कुछ लिखा और हाथ मे देते हुए डाटते हुए कहा, “अपनी मम्मी से कहना मैने उन्हें बुलाया है, शिकायत करनी है।” पाखी यह सुनकर स्तब्ध रह गई। ये कोई समय नहीं है माता पिता को स्कूल बुलाने का, वह डर गई, समझ नहीं पा रही था। अब क्या होने वाला था, उसे बाकी दोस्तो के जैसे डाँट पड़ेगी या माँ को शर्मिंदा होना पड़ेगा। सर अपना सामान लेकर कक्षा से चले गए और पाखी अपना सर झुकाए अपने स्थान की ओर बढ़ रही थी तभी उसके दोस्त नमन ने देखा कि पाखी की आँखों से आँसू टपक रहे थे।
 
नमन हँसते हुए बोला, “अरे! रो क्यूँ रही हो, कुछ नही होगा। बस थोड़ी डाँट पड़ेगी।”
 
इतना सुनते ही जो आँसू टपक रहे थे, वो बहने लगे।
 
नमन बोला, “अरे! इसमें रोने जैसा क्या है?” ठहर कर फिर बोला, “थोड़ी सी डाँट पड़ेगी बस!”
 
“हाँ! और क्या!”, संचिता ने हामी भरते हुए कहा।
 
नमन ने और दोस्तो को इशारे मे बताया कि वह रो रही है। जो भी दोस्त थे सब उसके पास आ गए, और कहने लगे – ” चुप हो जाओ।”
 
“थोड़ी डाँट पड़ेगी! सुन लेना।”
 
“कुछ नही होता।”
 
“मुझे देखो रोज़ ही डाँट पड़ती है, मै रोता हूँ क्या?”, एक ने खुद की उपमा देते हुए कहा। और सब कुछ ना कुछ कहते रहे उसे चुप जो कराना था।
 
अपने आपको समझदार बताते हुए नमन ने कहा,” अरे! कुछ बोलो भी क्यों डर रही हो। क्या मैं तुम्हारी मम्मी से बात करूँ? आता हूँ शाम को घर तुम्हारे।”
 
चुप्पी तोड़ते हुए, रोना रोक कर पाखी अखिरकार थोड़ी गुस्से और थोड़े असहाय स्वर मे बोल ही दी, “माँ नही है किससे मिलोगे।”
 
“सब की होती है”, एक मित्र ने कहा। “सर, को बता दो माँ अभी नही है।”
 
“कहाँ गई माँ? बुला लो उन्हें”, नमन ने कहा। भरी हुई आँखे और लड़खड़ाती आवाज़ में बार बार एक ही बात बोलती रही, पर इस बार थोड़ा जोर देकर, “माँ नहीं है।”
 
और बस वो रोती रही सब समझ गए पर कोई कुछ बोल नही पाया। उस रुदन मे अध्यापक का डर ज़्यादा था या माँ के ना होने का गम ये कहा नहीं जा सकता लेकिन, आज वो ये समझ गई थी कि “माँ नही है” ये कहने का अर्थ क्या होता है
 
 
 
 
 
 
 

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