महानता का लक्षण

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एक बार सूरज के मन में यह विचार उठा कि मैं दुनिया का कितना उपकार करता हूँ , मैं प्रकाश देता हूँ , सोये हुए लोगों को जगाता हूँ | मेरे आते ही चोरी-डकेती सब बंध हो जाती है | लोग अपने-अपने काम धंधे में लग जाते है | तो क्यों न आज जाना जाए की आखिर यह दुनिया मेरे बारे में क्या सोचती है ?
 
सूरज ने अपनी पत्नी से कहा – “चलो , मनुष्य लोक में चले हम देखेगें कि लोगों के मन में हमारे लिए क्या धारणा है ? जनता हमारे बारे में क्या सोचती है ?” दोनों वेष बदलकर धरती पर आये | दोनों बाजार में गए | वहाँ बहुत सारे लोग बैठे हुए थे | एक आदमी ने कहा – “देखो भाई ! यह सूरज कितना अच्छा है | हमें कितना प्रकाश दे रहा है ?”
 
दूसरे आदमी ने कहा – “क्या प्रकाश दे रहा है ? इस भयंकर गर्मी में तो सारा शरीर झुलस रहा है | हम तो चाहते है कि सूरज चला जाए और आकाश में बदल छा जाए , बरसात आये |”
 
सूरज जैसे ही कुछ आगे बढ़ा दुसरे मोहल्ले में पहुँचा | अपना वही प्रश्न लोगों के सामने रखा | लोग बोले – सूरज बड़ा धोखेबाज है | अगर कोरी रात होती , अँधेरा होता तो धोखा ही नहीं होता | सूरज जब छिप जाता है तो समस्या पैदा कर देता है | या तो प्रकाश करना नहीं चाहिए या फिर निरंतर प्रकाश देते रहना चाहिए |”
 
सूरज ने शहर के अनेक भागों में अपने बारे में होने वाली प्रतिक्रियाओं को सुना | बहुत कम लोग ही उसे ऐसे मिले जो सूरज कि प्रशंसा कर रहे थे | चारों तरफ अपने बारे में होने वाले नुक्ता-चीनी से सूरज परेशान हो गया | वह खिन्न स्वर में बोला – “इन लोगों का भला करना काम का ही नहीं है | अब मैं उगना ही बंद कर दूंगा | कहीं एकांत गुफा में जा कर बैठ जाऊंगा |”
 
सूरज की बातें सुनकर सूरज की पत्नी ने कहा – “महाराज ! आप जैसे यशस्वी राजा को ऐसा चिंतन शोभा नहीं देता | क्या आप नहीं जानते कि क्षुद्र आदमी  का काम ढेला फेंकना है और महान आदमी का काम उसे झेलना | महान आदमी क्षुद्र व्यकियों के व्यवहार से क्षुब्ध हो कर कभी भी अपनी महानता नहीं छोड़ते | यही महानता का लक्षण है |

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