बे-नाम खत

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बारिश का मौसम और बिजली की कटौती तो मानो इस देश की वो प्रेम कहानी है जिसमें दोनों प्रेमियों का मिलन आखिर हो ही जाता है। उसी अँधेरे में अभी अभी ही मोमबत्ती जला कर बैठी हूँ ये ख़त लिखने। जाने कितने ही ऐसे ख़त अलमारी के कोने में धूल खा रहे हैं, जाने कब इन्हें अपना कोई पता मिलेगा, जाने कब…
 
माचिस की तीली बुझा कर एक कोने में फेंक तो दी, मगर उसकी अटपटी, कभी लुभावनी तो कभी नापसंद आने वाली गंध इस अध्-जले से कमरे में फ़ैल रही है, और देखते ही देखते ये बारिश की इन सर्द हवाओं संग घुल मिल जाएगी, और मन को लुभा भी जाएगी। कमाल है ना! हम इंसानों में भी तो कुछ ऐसा ही होता है, किसी के साथ से हमारी कमियाँ नज़रंदाज़ हो जाती हैं, और मुरझाया हुआ सा फूल भी खिल उठता है, बस ज़रूरत होती है तो ऐसे एक साथ की…
 
देखो! कहा था ना मैंने कि ये लुभाने लगेगी, और आखिर वही हुआ, घुल गई ये गीली माटी की महक में, उन भीगे हुए नीम के पत्तों और सीढ़ियों के नीचे मकान-मालिक की पकती बिरयानी की चटपटी खुशबू के संग, जो लहराते हुए मेरे कमरे की इकलौती खिड़की से अंदर प्रवेश कर रही है। शुक्र है इस बेजान, सुनसान बंद कमरे में एक खिड़की तो है, एक उम्मीद की राह तो है, एक आज़ाद, बेपरवाह सांस लेती हवा तो है।
 
स्याह के कुछ धब्बे तो पहले ही सौगात ले आए हैं इस ख़त पर, जिसमें आज मैं तुमसे एक हसीन वाक़या साझा करने वाली हूँ जो अभी कुछ देर पहले ही मुझ संग हुआ, वाकई बेहद ख़ूबसूरत और, चलो खुद ही जान लो –
 
प्रिय प्रियतम,
 
इस बात में कोई संदेह नहीं कि मुझे बारिश के मौसम से बेइंतेहा मोहब्बत है, कितना ख़ूबसूरत होता है ये मौसम, सदाबहार वाली ख़ूबसूरती, बिलकुल यहाँ आँगन में बरसों से कब्ज़ा किए हुए उस पीपल के पेड़ की भाँती, फॉरएवर ब्यूटीफुल! तुम तो जानते हो कि कैसे मैं कुछ चीजों को लेकर, कुछ बातों को लेकर अपनी ही धारणाएँ बना लेती हूँ, और ऐसी ही कुछ धारणा मैंने प्रकृति की सुन्दरता को लेकर बना रखी थी। मैं मानती थी कि प्रकृति का आनंद गाँवों में, खुले बगीचों में, खेत-खलियानों में, जंगलों में ही उठाया जा सकता है, मगर आज मुझे इसी प्रकृति ने गलत साबित कर दिया (और इस बात का मुझे कोई खेद नहीं)। मेरे कमरे की खिड़की से कुछ क़दमों की दूरी पर ही एक तनहा सी स्ट्रीट-लाइट है, गर्दन झुका, जो एकटक सड़क पर लबाबब बहते पानी पर नज़र टिकाए खड़ी है। बड़े आश्चर्य की बात है कि वो बत्ती सिर्फ रौशनी ही नहीं, बल्कि उससे कुछ ज़्यादा दे रही है। जानते हो क्या? नज़ारा! नज़ारा बादलों से तेज़ गति से आती बारिश की बूंदों का, नज़ारा उन बूंदों का धरती से टकराने का मानो उसे जीवंत करने में लगी हो। इतनी सारी बूँदें, टप-टप-टप-टप, बम्बई की सड़कों सा दृश्य मालूम पड़ता है, कभी भीड़ बढ़ती है, कभी घटती है, कभी हवा संग दाएँ ओर तो कभी बाएँ ओर। आज बड़े खुश लग रहे हो तुम, क्या तुम्हें भी बारिश से मोहब्बत है? तुम्हारी वो खिलखिलाती हुई हँसी मुझ तक पहुँच रही है, छत पर पड़ती वो भारी बारिश की बूंदों में घुल कर। शायद मुझसे भी ज़्यादा खुश हो तुम, तभी इस मौसम की सबसे लम्बी फ़ुहार है आज। ऊपर से बादल भी मेहरबान है, देखो कितनी कम गड़गड़ाहट कर रहे हैं। मेरे डर को जानते हुए ही शायद तुमने इन्हें धीमे बोलने को कहा है। शुक्र है कोई तो मेरी परवाह करता है।
 
धीरे धीरे ये बारिश कम होने लगी है, शांत होने लगी है, लगता है अब बादल भी थक गए हैं, थके भी क्यूँ ना, पिछले छः घंटो से लगातार बरस रहे हैं। बारिश को धीमा होते देख मैं दौड़ पड़ती हूँ कमरे से बाहर, सीढ़ियों से उतर बगीचे में, आखिरी कुछ बूंदों का लुत्फ़ उठाने, उन्हें अपने भीतर समाने। स्याह रात – न चाँद – न सितारे, कुछ बिखरे हुए बादल, कुछ सिमटती बूँदें, और बाहें फैलाए – आँखें मूँदे बेवजह मुस्कुराती मैं!
 
अपनी आँखें खोलती हूँ तो दूर आकाश में बादलों से लिपट बिजली चमकती है, और उस छोटे से लम्हे में मेरी आँखें कुछ कैद करती हैं, और मैं वहीं ठहर जाती हूँ, वैसे ही कुछ और लम्हों के लालच में! वो लम्हें जिनमें एक तस्वीर सी कैद है, तस्वीर जो यूँ तो बहुत साधारण है, मगर शायद मेरे लिए नहीं, आज की रात नहीं, इस पल नहीं।
 
बगीचे में दीवार के सहारे रेंगती एक कपड़े सुखाने वाली रस्सी तनी सी है, जिस पर रात के इस पहर कोई कपड़े तो नहीं, मगर शायद कोई मोती छोड़ आया, बहुत सारे, एक कतार में, छोटे-बड़े, भीतर अपने एक दुनिया लिए, बिजली में टिमटिमाते ये बारिश की बूंदों के मोती जो हर चमकती बिजली में सितारे से लगने लगते हैं, वो मोती! हर एक मोती में समाई एक दुनिया है, बस उस दुनिया में सब कुछ ज़रा छोटा है, मगर फिर भी कितनी विशाल है वो दुनिया अपनेआप में! मैं वहीं खड़ी हो जाती हूँ, चुप, शांत, स्तब्ध इस कदर की खूबसूरती से, कि अचानक ही मैं सिहर उठती हूँ।
 
छपाक !
 
एक सितारा टूट, मेरे दांए गाल पर गिर पड़ता है,
मानो तुम चोरी-चुपके से आ, अपना स्पर्श छोड़ गए,
मानो तुम मुझ पर अपनी कोई छाप छोड़ गए,
मानो तुम खुदको, मेरे साथ छोड़ गए…
 
तुम्हारी,
मीरा

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