बगिया-सुप्रिया देउसकर

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जब से घर के इकलौते बेटे का कार एक्सीडेंट में निधन हुआ था, उनके घर मे एक अजीब सी उदासी छाई रहती थी।ज़ाहिर था, पर खुशी के मौके पर भी सभी के चेहरे पर हँसी, भूले भटके ही आती थी और पूनम का हाल तो और भी खराब था ।वो मुस्कुरा भी देती तो अनजाने ही उसे मन में खयाल आता कि वो गुनाह कर रही है। वैसे घर परिवार के लोग अच्छे थे पर कभी कभी अनकही सी बातें पूनम के कानों में गूंजती रहती थी।
दिल लगा रहे, इसलिए वह नर्सरी से लाये हुए पौधों की देखभाल में ही वक़्त गुजारने लगी।उनके ही बारे में जानकारी बढ़ाने लगी ।दोपहर का समय तो काम में निकल जाता था।कभी किसी रिश्तेदारी में गयी भी तो या तो अधिक पूछ परख होती या सहानुभूति दिखाती लोगों की नजरें ….उफ्फ उसका दम घुटने लगता था।इसलिए वो बाहर भी कम ही जाती थी।
शाम होते ही वह छत पर चली जाती थी।
सामने के मकान के ऊपर वाले पोर्शन की खिडकी से दो आंखें उसका पीछा करती सी मालूम होती थी।पहले पूनम को लगा कि शायद उसका वहम है क्योंकि अभी तक उस घर में सिर्फ चाचा चाची के अलावा उनकी एक बेटी थी,उसे यही मालूम था ।किसी और को उसने देखा ही नही था पर जब से उसे इस बात का अहसास हुआ तब से जाने अनजाने ऊपर आते ही उसकी नजर भी अनायास उस तरफ चली जाती थी,पर अपनी स्थिति का भान होते ही वो खुद को सम्हाल लेती थी।
रोज का नियम हो चला था।अब उसे उन आंखों की आदत सी हो चली थी।
आज जब वो ऊपर आयी तो सामने वाली खिड़की खाली थी। पूनम बार बार वहां देखती पर वो आँखे नही दिखी।उसने बहुत देर तक कई बार उस तरफ देखा पर निराशा ही हाथ लगी, किन्तु वो क्यों बेचैन हो रही है ये उसकी समझ मे नही आ रहा था।
एक दिन सुबह जैसे ही सारे काम निपटा कर वो कमरे में जाने को हुई दरवाजे पर आहट हुई।दरवाजा खुलते ही सामने वाले चाचा चाची एक युवक और एक अधेड़ पुरुष के साथ अंदर आये।युवक को देखते ही उसका दिल धड़का।वो आंखे देखते ही पहचान गयी, पलट कर अंदर जाने लगी।
अंदर से उसकी सास बाहर आई और फिर वे लोग आपस मे कुछ बाते करने लगे।
फिर धीरे से उसकी सास अंदर आयी और बोली” तुम्हारे लिए रिश्ता लेकर आये है और मैने हाँ कह दिया है पापा को भी कोई ऐतराज नही है”वो अवाक रह गयी। उसके मुँह से कुछ शब्द ही नही निकले वो कुछ कहती इसके पहले सास बोली “आओ, तुम्हे बाहर बुला रहे है।”
” माँजी, लोग क्या कहेंगे,मैने तो ऐसा कुछ सोचा नही। मैं आप लोगों को छोड़कर कही नही जाना चाहती ,और हम उन्हें जानते ही कितना है ?”
“तू नही जानती पर हम् तो सालों से जानते है न्.,,,वो भी हमें अच्छे से जानते है। उनकी इच्छा दिखी तभी तो आलोक बार बार यहाँ नागपुर आता रहा वर्ना वो तो मुम्बई में रहता है।”
“और जब तू ऊपर जाती तो वो वहीं से तुझे देखता था। ऊपर बगीचा भी तो इसी कारण लगाया था पापा ने,ताकि तू ऊपर जाकर थोड़ा अपना मन बहलाये।
” बेटा, तुम्हे वहाँ भेजने से हम अकेले तो हो जाएंगे पर तुम्हारे आगे तुम्हारा पूरा जीवन है,जो ऊपर खिली हुई तुम्हारी बगिया की तरह ही खिला हुआ देखना चाहते है हम “
“माँ “..वो आगे कुछ बोल नही पाई।उसकी आंखो के आगे पापा का नर्सरी से पौधे लाना ,नए गमले लाकर उन्हें जबरदस्तीे छत पर रखवाना अब उसके समझ मे आने लगा ।
और इधर उसकी सास बेटे की तस्वीर के सामने खड़ी थीं।उनकी एक आंख रो रही थी तो दूसरी मुस्कुरा रही थी।बेटे के आखरी शब्द उन्हें याद आ रहे थे “माँ, पूनम का ध्यान रखना …..”
सुप्रिया देउसकर …..
 

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