प्रेम ही ईश्वर है

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कहानी जो हृदय को छू जाये
मैं आज आपको एक ऐसे महान साध्वी की कहानी सुनाने जा रहा हु, जिसका नाम प्रेमलता था. जिसने शैतान से प्रेम करने को कहा , उससे नफरत करने को नहीं. यही बात जान एक साधु बड़े ही संकोच मैं पड़ गए, और फिर क्या हुआ अब हम आगे कहानी मैं पढ़ेंगे. एक बार महान साध्वी प्रेमलता एक धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं.
पुस्तक में एक जगह लिखा था, शैतान से घृणा करो, प्रेम नहीं. प्रेमलता ने वह लाइन काट दी. कुछ दिन बाद उससे मिलने एक साधु आए. वह उस पुस्तक को पढ़ने लगे. उन्होंने कटा हुआ वाक्य देख कर सोचा कि किसी नासमझ ने उसे काटा होगा. उसे धर्म का ज्ञान नहीं होगा. उन्होंने प्रेमलता को वह पंक्ति दिखा कर कहा, जिसने यह पंक्ति काटी है वह जरूर नास्तिक होगा.
प्रेमलता ने कहा, इसे तो मैंने ही काटा है. साधु ने अधीरता से कहा, तुम इतनी महान साधु होकर यह कैसे कह सकती हो कि शैतान से घृणा मत करो. शैतान तो इंसान का दुश्मन होता है. इस पर प्रेमलता ने कहा, पहले मैं भी यही सोचती थी कि शैतान से घृणा करो. लेकिन उस समय मैं प्रेम को समझ नहीं सकी थी.
लेकिन जब से मैं प्रेम को समझी, तब से बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं कि घृणा किससे करूं. मेरी नजर में घृणा लायक कोई नहीं है. साधु ने पूछा, क्या तुम यह कहना चाहती हो कि जो हमसे घृणा करते हैं, हम उनसे प्रेम करें. प्रेमलता बोली, प्रेम किया नहीं जाता. प्रेम तो मन के भीतर अपने आप अंकुरित होने वाली भावना है.
प्रेम के अंकुरित होने पर मन के अंदर घृणा के लिए कोई जगह नहीं होगी. हम सबकी एक ही तकलीफ है. हम सोचते हैं कि हमसे कोई प्रेम नहीं करता. यह कोई नहीं सोचता कि प्रेम दूसरों से लेने की चीज नहीं है, यह देने की चीज है. हम प्रेम देते हैं. यदि शैतान से प्रेम करोगे तो वह भी प्रेम का हाथ बढ़ाएगा.
साधु ने कहा, अब समझा, प्रेमलता! तुमने उस पंक्ति को काट कर ठीक ही किया है. दरअसल हमारे ही मन के अंदर प्रेम करने का अहंकार भरा है. इसलिए हम प्रेम नहीं करते, प्रेम करने का नाटक करते हैं. यही कारण है कि संसार में नफरत और द्वेष फैलता नजर आता है. तो दोस्तों इस कहानी का सार यही कहता है की कभी भी किसी से घरना या द्वेष या दुश्मनी नहीं करनी चाहिए, बल्कि उससे सदा ही प्रेम करना चाहिए. क्योकि प्रेम ही ईश्वर है और प्रेम ही भक्ति है.

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