आज ज्यादा बातें नहीं बस २ अलग अलग ढंग की कविताएँ,लिखी है…आधार प्रेम ही है ….एक में आगृह है दूसरी में भक्ति का अंश….

1)जानती हू तुम दिल की दिल में रखते हो

हमेशा शांत रहते हो कभी कभी बरसते हो

यूं सब समाकर ना रखो ,छलकता जाम हो जाओ

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कभी तो खासपन छोड़ो ज़रा से आम हो जाओ

2)तुम्हे देखकर ग़ज़ल कह ना दू मैं

महकता सा पावन कमल कह ना दूं मैं

 

तुम पहली किरण,चमकती ओंस सी हो

निर्मल सी, चंचल सी, निर्दोष सी हो

 

जहाँ अनंत प्रेम होता है ,उस अंक सी हो

हृदय मोती तुम्हारा तुम शंख सी हो

 

रुई का फाहा भी तुम्हे छुना  चाहे

कलंक ना लगे तुम्हे , इस बात से घबराए

 

कभी वन की चिड़िया कभी हिरनी सी चंचल

मूरत सी सुन्दर वेसी ही अविचल

 

तुम्हे प्रेम करने का सोचु भी कैसे?

तुम प्रेम की देवी, मैं हूँ  भक्त जैसे ….

मैं वैराग धरकर तुम्हे पूजना चाहू

तुम पास बुलाओ पर मैं दूर जाऊं

तुम्हारे प्रेम से डरता हूँ  मैं किंचित

रह ना जाऊं  कही तेरी भक्ति से वंचित…..

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Source:http://meriparwaz.blogspot.in/

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