प्यार की दस्तक

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न्यूज़ देखते हुए पापा ने ससुराल से पहली बार घर आयी बिटिया से पूछा,”शिव तुम्हें ख़ुश रखता तो है न। वहाँ कोई दिक़्क़त तो नहीं है बेटा।”
“हाँ पापा, शिव बहुत अच्छे हैं। वो भी बिलकुल आपकी तरह ही हैं। आप माँ का ख़्याल जैसे रखते हैं सेम वैसे ही वो मेरा रखते।”
अवंतिका बोल ही रही थी कि उसका फ़ोन बजा और वो उठ कर बाहर आ गयी। पापा न जाने किस सोच में डूब गए।
“ख़्याल माँ का! मेरी तरह! नहीं, मैंने कभी आशा का ख़्याल नहीं रखा। उसे घर की ज़िम्मेदारी में फँसा अकेला छोड़ दिया। आजीवन मैं पैसे कमाने के पीछे भागता रहा, कभी नहीं दो पल सकून से उसके पास बैठा और उससे उसकी मन की बात जान ने की कोशिश की।
जब बातें भी होती, तो घर-ख़र्च, बच्चों की पढ़ाई और माँ-बाबूजी के हेल्थ पर होती। कभी उसका हाथ थाम कर, उन हाथों को सहलाया नहीं…।” अपनी ही उधेड़बुन में डूबे थे कि, आशा दूध और दवाइयाँ ले कर आ गयी।
“लीजिए दवाइयाँ।” दूध का ग्लास वही टेबल पर रख आस-पास बिखरीं चीज़ों को समेटने लगी।
आज बरसों में पहली बार मिस्टर सहाय उन्हें देख रहे थे। आँखें कितनी धँस गयीं हैं। बाल सफ़ेद हो गये। वक़्त ने सारी ख़ूबसूरती छीन लिया। कैसे घुटने पर हाथ रख चल रहीं हैं।
मन चीख़ उठा उनका। ब्याह कर लाए थे, तो सूरज की लालिमा थी, आखों में बच्चों जैसी सोखियाँ थी, सब छीन लिया मैंने।
“आशा! आशा!” दूध का गिलास वही मेज़ पर रख भाग कर उनके पास गए और उनकी हथेली को अपनी हथेली में भर कर, उनके सिंदूर भरी माँग को चूमने लगे। फिर ख़ुद को स्यंत करते हुए बोले,”तुम मुझे माफ़ कर पाओगी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ। ज़िंदगी भर मैंने तुम्हें सिवाय एक मशीन के और कुछ न समझा। बस यही सोचता रहा, तुम्हें खाने-कपड़े के सिवाय और क्या चाहिए.?आशा बोलो।” कह कर नज़रें नीची करके चुप हो गये।
आशा जी के आँखों से गरम आँसू निकलने लगे। उन्होंने बिना कुछ बोले सब कह दिया।
आज सारे गिले-सिकवे आँसुओं में धूल गये। उम्र के साठवें बसंत में उनके जीवन में प्यार ने दस्तक दी थी।
 

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