पैरों से पेंटिंग बनाने वाली “फूट पेंटर” दीपा की कहानी

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दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी हिम्मत वाली महिला दीपा की कहानी सुनाऊंगा जो अपने हौसलों कि से  आज एक नई पहचान बना रही हैं वह अपने पैरों से पेंटिंग करती हैं अगर उनके बारे में कुछ पंक्तियां कहा जाए तो यह कम नहीं होगा।
जब टूटने लगे हौसले तो बस ये याद रखना,
बिना मेहनत के हासिल तख्तो ताज नहीं होते॥
ढूंढ़ लेना अंधेरे में ही मंजिल अपनी दोस्तों,
क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते॥
 
दोस्तों अगर शीलाजी चाहती तो जिंदगी में आए अपने बड़े तूफान से भी अपने गुमनामी और अंधेरों में छिप जाती  या किसी के सामने जाकर अपनी कमियों का रोना रोती लेकिन उन्हें पता है कि हमारा समाज हमारा देश अगर किसी के सामने आप गिड़गिड़ाओ तो वह आपको और नीचे समझता है तो उन्होंने अपने जीवन में अपने बलबूते कुछ करने को सोचा दोस्तों आपको बता दें कि शीला जी हाथ से विकलांग है लेकिन हिम्मत उनमें इतनी है कि कई हाथों वालों को भी पीछे छोड़ सकती हैं दोस्तों ऐसी हैं हमारी आज की कहानी की नायिका शीला जी ।
 
दोस्तों इन्होंने बहुत कम उम्र में ही एक रेल हादसे के दौरान अपने दोनों हाथ और अपने पैर की 3 अंगुलियां गवा दी थी इस हादसे ने शीला से उनकी मां को भी छीन लिया था एक छोटी सी बच्ची के लिए बहुत मुश्किल था बगैर मां और अपने दोनों हाथों के बिना जिंदगी गुजारना लेकिन शीला ने हार नहीं मानी वैसे तो शीला जी गोरखपुर के एक मध्यमवर्गीय फैमिली से बिलोंग करती हैं लेकिन उनका नाम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी नया नहीं है लखनऊ वाले अधिकतर लोग शीला जी की कला और उनके हौसलों के दीवाने हैं शीला जी की सरप्राइज करने वाली बात यह है कि वह अपनी पेंटिंग अपने पैरों से बनाती हैं और पेंटिंग भी ऐसा हाथ वाले लोग भी ऐसा पेंटिंग नहीं बना सकते हैं जो भी इनकी पेंटिंग को देखता है बस उसके मुंह से एक ही बात निकलता है वह क्या बनाया है
दोस्तों हादसे के बाद शीला जी ने हार नहीं मानी और वह अपने हौसलों के कारण रंगों और कुचियों से खेलना शुरु कर दिया और आगे चलकर शीला ने लखनऊ विश्वविद्यालय में आर्ट्स से ग्रेजुएशन किया और पैरों से पेंटिंग बनाना शुरु कर दी शीला पेंटिंग करते समय अपने पैरों और मुंह दोनों का इस्तेमाल करती हैं इसी दौरान उनकी मुलाकात सुधीर नामक एक शख्स से हुई और उन दोनों में आपसी तालमेल और प्यार का रिश्ता बड़ा और कुछ दिनों बाद सुधीर और शीला की शादी हो गई शीला अपने शादी के बाद भी रंगों से खेलना बंद नहीं किया और सुधीर के हिम्मत और उत्साह बढ़ाने के साथ ही उनकी कलाकारी को निखार आया और साथ ही उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया फिर बात चाहे किचन में खाना बनाने की हो या फिर कोरे कागज में रंग भरने की शीला एक हिम्मतवाली महिला हैं और अपने परिस्थितियों से किस तरह सामंजस्य बिठाना है वह अच्छी तरह से जानती हैं।  उन्होंने अपने अपंगता को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपना साहस बनाया आज उसके उनके दम पर उनकी पहचान पूरे देश में हो रही हैं उनके बनाई गई पेंटिंग की प्रदर्शनी कई बड़े शहरों लखनऊ दिल्ली मुंबई बेंगलुरु आदि में लगाई जा चुकी है शीला दो बच्चों की मां है बच्चों को भी उनकी तरह ही पेंटिंग का बहुत शौक है शीला अपने काम को लेकर बहुत ही गंभीर है वह अपनी इस पेंटिंग को एक मुकाम तक ले जाना चाहती हैं वह लगातार मेहनत करती है शीला जी को प्राकृतिक और औरतों की पेंटिंग बनाना अच्छा लगता है शीला जी चाहती हैं कि वह हर ऐसे बच्चों को पेंटिंग सिखाएं जिनकी किसी हादसे के दौरान उनके पैर हाथ अब नहीं रहे शीला यह कहती है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है अगर आप में हौसला जुनून और कुछ करने का इरादा है तो आप एक सकारात्मक सोच के साथ कुछ भी कर सकते हैं शायद इसीलिए कहा गया है कि कोई भी कला किसी उम्र का  मोहताज नहीं होता।
तो दोस्तों उम्मीद है आपको यह शीला जी की जिंदगी की कहानी पसंद आई होगी इससे आपको काफी हौसला मिला होगा अपने जीवन में कुछ करने के लिए फिर मिलते हैं ऐसे ही कोई हिम्मतवाली प्रेरणादाई कहानी के साथ तो इंतजार कीजिए।  हमारे अगले पोस्ट का दोस्तों अगर यह कहानी आपको पसंद आई हो तो प्लीज लाइक और शेयर जरूर कीजिए अगर किसी भी भाई या बहन को इस कहानी से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में थोड़ा सा भी सकारात्मक बदलाव आता है तो हम अपने आप को उन का आभारी समझेंगे
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