पुनर्जन्म पर शोध और मानव की अज्ञानता

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निम्नलिखित मामलों में एक जिज्ञासु मन अपने अज्ञान के बारे में जागरूक हो जाता है :-

  1. हम कहाँ से आते हैं और हम कहाँ जाएंगे?
  2. हम यहाँ क्यों आते हैं और हमें इस उद्देश्य की याद क्यों नहीं है?
  3. धर्मपरायण होने के बावजूद हमें दुःख क्यों भोगने पड़ते हैं?

यहाँ एक राजा की कहानी है जो स्वयं एक मूर्ख व्यक्ति को देखना चाहता था। उसने मूर्ख की तलाश में कई लोगों को भेजा। वे कई बेवकूफों के यहाँ गए लेकिन कोई भी परिवार यह स्वीकार नहीं करता कि उनका तथाकथित व्यक्ति पूरी तरह से मूर्ख है, बल्कि उन्होंने दावा किया कि वह समझदार है। बेवकूफों को खोजने में असफल सभी लोग एक-एक करके वापस आ गए लेकिन अभी एक व्यक्ति रह गया था। राजा को उम्मीद थी कि वह जरूर मूर्ख व्यक्ति को लेकर लौटेगा।
उस व्यक्ति ने लंबे समय तक खोज की लेकिन वह भी असफल रहा और कुछ महीनों के बाद वह भी लौट आया। उस समय तक राजा मृत्यु-शैय्या पर लेटा अपनी मृत्यु के इंतजार में था। आखिरी व्यक्ति को लौटा देख कर राजा ने उससे पूछताछ की। उसने अपनी असफलता स्वीकार कर ली और फिर राजा से पूछा कि वह बिस्तर पर क्यों लेटे हैं। राजा ने उसे बताया कि वह जाने वाले हैं। कहाँ, कब और कैसे – क्रमशः उस व्यक्ति ने पूछा।
राजा ने इन सभी सवालों के बारे में अपनी अज्ञानता व्यक्त की। साथी ने उसे ही एक वास्तविक मूर्ख माना, जो कहीं जाने के लिए तैयार है परंतु गंतव्य स्थान, समय और यात्रा के साधनों के बारे में नहीं जानता है।
इस कहानी का तात्पर्य यह है कि हम सब (एक संत को छोड़कर) इन मामलों में अज्ञानी हैं। शास्त्रों (उपनिषद) ने लोगों को चेतावनी दी है कि इन सवालों के जवाब जाने बिना मरने के बाद पुनर्जन्म के माध्यम से वापस लौटना पड़ता है। पहले पैराग्राफ में दिये गये सवालों के बारे में अपनी समझ के अनुसार निम्नलिखित प्रस्तुत है :-
जिस तरह से एक विशेष यंत्र के माध्यम से बहने वाला करेंट, ऊर्जा के अन्य रूपों में परिवर्तित हो सकता है, जैसे गर्मी, ध्वनि, प्रकाश, चुंबकत्व। यह गैजिट के अनुसार गर्मी या शीतलता पैदा कर सकता है, जबकि यह स्वयं न तो गर्म है और न ही ठंडा है। इसी तरह, जीवन शक्ति (आत्मा) एक विशेष प्रजाति में प्रवेश करती है और शरीर को जीवित रखती है, और जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो प्राणी निष्क्रिय हो जाता है।
शरीर और व्यवहार (स्वार्थी या परार्थी या मिश्रित) उसके पिछले कर्मों और मानसिक प्रवृत्तियों पर निर्भर करते हैं तथा जीवात्मा इनके दुःख-सुख भोगने के कारण भोक्ता कहलाती है।
जीवन के दौरान हम स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण पाप कमाते हैं और दूसरों की सहायता एवं अच्छा व्यवहार करके पुण्य कमाते हैं। दूसरे शब्दों में हम अपने कार्यों के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियायेँ इकट्ठी करते हैं। यह तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने स्वार्थ को छोडकर अच्छाई अपना लेते हैं।
उस स्थिति में कोई कार्रवाई स्वार्थ-बुद्धि के साथ नहीं की जाती बल्कि मानवता के कल्याण के इरादे से एक समर्पित कर्तव्य के रूप में की जाती है। सम्पूर्ण सृष्टि भगवान और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती है।
एक नवजात शिशु सभी के लिए खुशी का एक स्रोत है। बाद में बड़े होने पर वह कुछ प्रवृत्तियों को अपनाता है जो उसे अपने माता-पिता और विभिन्न संबंधों के माध्यम से मिलती हैं। तब कुछ लोग उसे पसंद करते हैं एवं दूसरों को वह नापसंद होता है।

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