पुण्य का घड़ा-हरीश पांडे

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“लो आज ये आखिरी धागा भी टूट गया जिसने हमारे एक होने की आस को बांध के रखा था।” करहाती हुई आवाज़ में सोफे  पर बैठे हुए मनीष ने बिना सर उठाये कहा।
“तलाक!” मनीष ने बड़बड़ाते हुए कहा।
साहिल ने ढांढस बधाने हेतु उसके कंधे पे हाथ रखा और उसके बगल में बैठते हुए बोला – ” ठीक है न, अब उसकी खुशी इसी में थी तो उसने ये कदम उठा लिया।”
“उसकी खुशी? और मेरी खुशी का क्या?” मनीष ने प्रत्युत्तर किया।
साहिल चुप रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने भाई जैसे दोस्त को वो किस तरह से इस ग़म के दरिया से उभारे।
वो मनीष के साथ बहस नहीं करना चाहता था न ही वो उसे इस समय किसी किताबी ज्ञान की घुट्टी पिलाना चाहता था।
‘जो तन लागे, सो तन जाने’ वाली बात थी जिसे वो भी बख़ूबी जानता था इसलिए चुप रहने में ही बेहतरी समझ के उसके समक्ष बैठा रहा।
“बोल न भाई, मेरी खुशी का क्या? क्या वो मायने नहीं रखती किसीके? उसके? तेरे? भगवान के?” मनीष ने फिर प्रश्न किया।
“रखती है न यार। तू ऐसे क्यों बोल रहा है?” साहिल ने करुणावश बोला।
“अगर मायने रखती है तो फिर मिलती क्यों नहीं मुझे खुशी? या वो भी तलाक दे चुकी है मुझे?” मनीष ने यथार्थ पर व्यंग्य सा करते हुए कहा।
“तू चाय पियेगा?” साहिल ने उठते हुए पूछा।
“ज़हर पियूँगा। ले आएगा थोड़ा।” मनीष किसी चोट खाये हुए सांप की तरह फुफकार रहा था।
साहिल परिपक्वता का परिचय देते हुए चुपचाप रसोईघर में चला गया।
दो मिनट बाद मनीष भी उसके साथ रसोईघर में था।
“अब तू भी मुझे सहन नहीं कर पा रहा है न। मुझे तमीज़ नहीं है। मैं समाज मे रहने लायक नहीं हूँ न।” मनीष रुआंसा होकर बोला।
साहिल का चुप रहना उसे खल रहा था परन्तु उसकी चुप्पी ने मनीष का लहज़ा काफी हद तक बदल दिया था।
“कब से जानते हैं हम एक दूसरे को?” इस बार साहिल ने प्रश्न किया।
“कॉलेज से,” मनीष ने सीधा सा जवाब दिया।
“लगभग 10 सालों से,” साहिल ने उत्तर को आंकड़ों में ढालते हुए कहा।
“हाँ, तो फिर तू ही बता न कि मुझमे बहुत ऐब है क्या? प्यार ही तो करता था न मैं उससे…और अभी तक करता ही हुँ। फिर भी मेरे साथ ऐसा क्यों?” मनीष धीरे से बोला।
” देख तेरे साथ ऐसा क्यों? इसका जवाब मेरे पास नहीं है। तेरे साथ गलत हुआ है, पर ज़रूरी नहीं कि उसका जवाब जानना ज़रूरी है।” साहिल ने चाय को छानकर कपों में डालते हुए कहा।
“क्या मतलब?” मैं गलत भी सहूँ और उसका कारण भी न पूछूँ? वाह अब ये ही सुनना बाकी रह गया था।” मनीष ने कटाक्ष किया।
“चल अगर तुझे कारण पता भी चल जाये तो क्या होगा?” साहिल ने उसे कप पकड़ाते हुए प्रश्न किया।
“तसल्ली,” मनीष तपाक से बोला।
“वो तो तब न जब तुझे ये सुनने को मिले कि वो तेरे लायक नहीं थी या तू ग़लत नहीं था या ऐसा ही कुछ और। मग़र तुझे ये सुनने को मिले कि सारी ग़लती तेरी ही थी और तू उसके लायक नहीं था क्या तब भी तू तसल्ली का ही अनुभव करेगा?” साहिल ने चाय की चुस्की लेते हुए मनीष को सोचने पे मजबूर करते हुए कहा।
“पर मैं जानता हूँ कि ये सच नहीं है, और मैं ये भी जानता हूँ कि वो भी जानती है कि मैंने उसके लिए कितना कुछ किया है।” मनीष ने भी चाय का घूंट पीते हुए कहा।
“तो तू ये सब उसके मुँह से सुनना चाहता है न बस।” साहिल ने बात का निचोड़ निकालते हुए कहा।
“नहीं, बिल्कुल ऐसा भी नहीं है। पर मेरा सवाल उसकी सोच को लेके है। ये वो ही लड़की थी जिसने मेरे साथ शादी करने के लिए मुझे खूब मनाया। तुझे पता है मैं उस समय निश्चित रूप से तैयार नहीं था। उसी ने मुझे इस सफर के लिए मनाया और फिर अब उसी ने इस सफर को इस तरह से ख़त्म कर दिया।” मनीष ने लंबी सांस भरते हुए कहा।
“तो तुझे शादी के लिए हां नहीं करनी चाहिए थी।” साहिल ने प्रश्न किया।
“पर मैं उससे प्यार करता था यार। और वो भी करती थी। इसीलिए तो शादी की थी। तुझे सब पता तो है।” मनीष ने प्यार का हवाला देते हुए खुद को बचाया।
“पर एक बात बोलूं मैं,” मनीष ने साहिल के कुछ और बोलने से पहले खुद ही कहा।
“हाँ, बोल।” साहिल ने कहा।
अब तक वो दोनों अपनी चाय के साथ दोबारा हॉल में आ चुके थे।
“मुझे उसको बहुत पहले तलाक़ दे देना चाहिए था। मनीष सोफे पे बैठते हुए बोला।
“तो दिया क्यों नहीं?” साहिल भी उसके बग़ल में बैठकर बोला।
“बस मैं ये रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता था। मैं उसकी बेवफ़ाई सह तो रहा था पर उसको वापस आने का मौका भी दे रहा था। मुझे भी उसकी ख़ुशी ही चाहिए थी पर उसके झूठ सुनके गुस्सा भी आ जाता था। यार, जो लड़की मुझसे शादी करने के लिए, मुझे बिना झिझक के बोल सकती है, मना सकती है क्या वो मुझे सब सच नहीं बता सकती थी। वो एक बार मुझे सब सच सच कहती और रिश्ता तोड़ने को कहती न, तो मैं ख़ुशी ख़ुशी हाँ कर देता। पर उसने इतना भी ठीक नहीं समझा। रोज़ रोज़ उसके झूठ, उसके लड़ने के बहाने और बदतमीज़ी के बावजूद पता नहीं क्यों मैं किस आस में बैठा था।” मनीष एक सांस में बहुत कुछ बोल बैठा।
“और फिर ये अलग होने का ख़्याल कैसे आया?” साहिल ने तफ्तीश की।
“एक रोज़, मोहतरमा बोलीं की ऑफिस के काम के सिलसिले से बाहर जाना है। दो तीन रोज़ में लौटेंगी। शायद फ़ोन पे बात भी न हो पाएं तो कोई चिंता मत करना। फिर उसके बाद वो ‘दो-तीन रोज़’ पूरे ही नहीं हुए। बस एक मैसेज आया कि अब हम साथ नहीं रह सकते।” मनीष पुरानी बातों को याद करते हुए बोला।
“और फिर तूने क्या लिखा?” साहिल ने पूछा।
“लिखा तो बहुत कुछ, पर उसने उत्तर देना ज़रूरी नहीं समझा। मेरी ये ही जिज्ञासा ख़त्म नहीं हुई थी कि अचानक एक दिन उनका तलाक का नोटिस भी आ धमका। बाद में किसी क़रीबी से मालूम हुआ कि वो अपने ऑफिस के ही किसी मित्र के साथ बहुत जल्द शादी भी करने वाली हैं।
महसूस तो मुझे बहुत कुछ बहुत पहले से ही हो रहा था, पर वो डर इतनी जल्दी हक़ीक़त बन रूबरू हो जाएगा इसका कोई अंदेशा नहीं था, बस शायद ये ही बात कचोटती है। जहां आप खुद के विचारों को ग़लत साबित करना चाहते हैं, वहां सही साबित हो जाओ तो ज़िन्दगी एक अज़ाब सी लगने लागती है।” मनीष के सब्र का बांध अब बुरी तरह से टूट चुका था। जो आंखें कुछ देर पहले अंगारे बरसा रही थी अब वो जलवर्षा कर रहीं थीं।
साहिल ने झटपट अपने दोस्त को गले लगाया और उसकी पीठ सहलाने लगा।
दो क्षण को सन्नाटा पूरी जान लगाकर चिल्लाया।
“पुण्य का घड़ा,” साहिल मनीष की पीठ सहलाते हुए ही बोला।
“हाँ…?” मनीष थोड़ा देर से बोला।
परंतु ये ‘हाँ’ सहमति में नहीं अपितु शंका में था जिसका अभिप्राय मनीष का दिमाग लगाने में असफल था।
“जैसे पाप का घड़ा होता है ना जो बुरे कर्मो को इकट्ठा करते करते फूट जाता है। वैसे ही पुण्य का घड़ा भी होता है… ये प्रकृति का अपना तरीका है चीजों को बराबर मात्रा में रखने का। तुझे मौके मिले थे खुद को और ज्यादा चोट खाने से रोकने के, खुद तलाक़ की पहल करने के… पर जब तूने नहीं किया तो किसी को तो ये करना ही था। तू अपने प्रयासों की हद को बहुत पहले ही पार कर चुका था। तुझे बहुत पहले ही रुक जाना चाहिए था इस राह पर चलने से। बस अब तेरा खुद का निर्णय नही है इसलिये तुझे ज्यादा बुरा लग रहा है पर ये तेरे भले के ही लिए है। तेरा पुण्य का घड़ा फूट चुका है।” साहिल ने पता नहीं ऐसा क्या कहा पर मनीष का रोना यकायक बढ़ा और फिर रुक गया।
उसने साहिल को थोड़ा और ज़ोर से गले लगाया और धीरे से हंसते हुए बड़बड़ाया …. “पुण्य का घड़ा।”
शायद उसको उसके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल चुके थे!!!

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