पहला प्यार-अम्बिका कुमार शर्मा

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“अरे, आज तो मान्या का जन्मदिन है?” गहरी नींद में सोते हुये विशु को अपने ही सपनो में आवाज सुनाई दी और नींद खुल गई,
“हा आज मान्या का जन्मदिन है उसे जल्दी से शुभकामनाये प्रेषित कर दूं”सोचते हुये विशु ने अपना मोबाइल हाथ मे लिया,
“अरे आज आप बहुत जल्दी उठ गये?” सामने से मुस्कुराती हुई चली आ रही प्रिया ने पूछा
विशु ने केवल मुस्कुरा कर देखा और अपने मोबाईल में कुछ करने लगा।
“आप जल्दी से फ्रेश हो जाओ, मैं चाय लाती हूँ” कह कर प्रिया वापस किचिन चली गई।
विशु कुछ सोचता रहा फिर मोबाईल में जन्मदिन की शुभकामनाये लिखा और मान्या के व्हाटसअप पर भेज दिया, खुद ही मुस्कुराया, तब तक प्रिया चाय के साथ अखबार ले कर आ गई।
“आज कहाँ जायेगे? आफिस या साइड?” प्रिया ने पूँछा
“देखो, अभी कुछ तय नही, बताऊंगा” अखबार पर ध्यान केंद्रित करते हुये विशु ने कहा।
प्रिया वापस किचिन चली गई।
विशु अखबार देख रहा था उसे अखबार में भी मान्या ही दिख रही थी, वो मान्या के बारे सोचने लगा।
वर्षो पुरानी घटना हो गई जब विशु ने मान्या को पहली बार सायकिल सीखते हुये देखा था, शाम का हल्का सा अंधेरा हो रहा था, जिस कॉलोनी में विशु रहता था उसमें बाहरी लोगों का प्रवेश न के बराबर था इसलिये ज्यादा चहल पहल नही होती थी। इसलिये विशु अकेले ही कालोनी में घूम रहा था।
सामने से मान्या सायकिल पर चली आ रही थी, उसके हावभाव बता रहे थे वो सीख रही है, विशु दाई ओर बढ़ा मान्या भी दाये हुई, डर कर विशु बाये हुआ मान्या भी हड़बड़ाहट में बाये हो गई, विशु फिर हटा तब तक मान्या पास बाले घर के किनारे लगी मेहदी की हेजिंग में जाकर गिर गई।
“शुक्र है किसी ने देखा नही” विशु ने मन ही मन सोचा, फिर मान्य की मदद के लिये बढ़ा, मान्या अपने सफेद दुप्पटे जिस पर लाल रंग के छीटे बने थे को संभालती हुई उठी, पास आते विशु ने उसके साँवले सलोने सुंदर से चहरे को देखा जिसकी बड़ी बड़ी कजरारी आंखो ने विशु को घूर कर देखा, विशु को लगा मानो उसने ही मान्या को धक्का दिया है, विशु सहम गया, मान्या के पास जाने की हिम्मत ही नही पड़ी, मान्या ने खुद को संभाला, उठी सायकिल उठा कर लंगड़ाती हुई चल दी।
“ये लड़की है कौन? इसे पहले तो कभी अपनी कॉलोनी में देखा नही? अच्छा ये रहा किसी ने देखा नही, नही तो अगर कही मेरे पिता को किसी कुछ भी बता दिया वो तो वैसे भी टाईगर नाम से प्रसिद्ध है” सोचते हुये विशु भी आगे बढ़ गया।
अखबार देखते विशु को मान्या से अपनी पहली मुलाकात याद आई, विशु के चेहरे पर मीठी से मुस्कान आ गई।
पहले प्यार की तो स्मृतियां भी कितनी मीठी होती है, विशु फिर सोचने लगा,क्या दीवानगी थी उस उमर में मान्या की साँवली सलोनी सूरत के चक्कर मे साँवरे कन्हैया, साँवरे से राम जी, नीलकंठ महादेव सभी उसके प्रिय उपास्य देव् हो गये थे,
कोई अभिनेत्री शेष नही थी जिसकी शक्ल मान्या से न मिलती हो सब मे विशु को मान्या ही नजर आती थी और तो और ग्वारफली भी किसी की फेवरेट सब्जी कैसे हो सकती है? विशु सोचा करता था लेकिन जब से उसे पता चला था कि गवारफली मान्या की पसंदीदा सब्जी है तब से वो जब भी सब्जी लेने जाता गवारफली जरूर लाता ताकि उसके घर के सभी गवारफली खाये ताकि जब मान्या ब्याह कर विशु के घर आये सब को बड़े चाव से गवारफली खाते देखे और खुश हो।
विशु को वो होली याद आ गई जब वो मान्या को अपने रंग में रंगना चाहता और लाख कोशिशों के बाद भी रंग नही पाया,
विशु होली की रंगीन यादों में डूबा था कि उसके मोबाईल की रिंगटोन बजी, बॉस का फोन सुबह सुबह?
“गुड मॉर्निंग सर” विशु ने फोन उठाया।
“गुड मॉर्निंग, यार आज किसान बंधु की बैठक है, डीएम का प्रोग्राम है, मैं यहॉ लखनऊ में हूँ तो आप चले जाना और वो चेकडैम पर जो आपकी सर्वे रिपोर्ट थी उसे लिये जाइयेगा, उस पर चर्चा होगी, कुछ अधिग्रहीत भूमि के मुआवजा प्रकरण भी है देख लीजियेगा” बॉस ने कहा
“जी सर” विशु ने धीरे से कहा।
काल पूरी हुई तो स्कूल बैग लिये विशु की बेटी सामने खड़ी थी,
“पापा, स्कूल बस छूट गई आप स्कूल छोड़ देंगे प्लीज़” उसकी बेटी बोली, सिफारिस में प्रिया साथ खड़ी थी।
बेटी को बाइक से स्कूल छोड़ते विशु अपनी किसान बंधु की बैठक के बारे में सोच रहा था।
“ये पहले प्यार की कोमल स्मृतियां भी कितनी नादान होती है, हमेशा साथ होती है और मुस्कान ही देती है वो नही जानती की वर्तमान की जिम्मेदारियों ने अपना आकार इतना बड़ा कर रखा है कि पुरानी स्मृतियों को आगे बढ़ने ही नही देती” विशु बेटी को स्कूल छोड़ कर वापस आ गया।
“काश तुम आते” नामक अपने उपन्यास का एक अंश
अम्बिका कुमार शर्मा(राजा)
अमृत नगर कालोनी, गाँधी नगर, महोबा
 

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