ध्यान नहीं टिकता*

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हरिया आज बहुत समय बाद अपने गुरूवर से मिलने खातिर उनकी कुटिया पहुंचा।
वहां जा के देखा गुरूवर ध्यान में थे।
सो चुप चाप नीचे बैठा इंतजार करने लगा।
कुछ क्षण बाद गुरूवर ने आंखे खोली,और नुरानी मुस्कान के साथ बोले, हरिया।
उसने उठ कर उनके चरणों में प्रणाम किया और बोला ,गुरू जी बहुत कोशिश के बाद भी मन नहीं टिकता।
कभी खेत खलिहान कभी कुछ तो कभी कुछ।ध्यान नही टिकता ।
गुरूवर मुसकराए और बोले ,चलो आज तुम्हारे घर चलते हैं ।
अहो भाग्……हरिया खुशी से बोला।
गुरूवर ने कहा मैं जो भी करूँ ध्यान से देखना ।
घर पहुंचकर गुरूवर ने थोड़ा खांसने की आवाज की।
तो हरिया की बीवी ने लंबा घूंघट औढ लिया ।
अंदर बुलाकर उसकी बीवी ने गुरूवर के पांव छुकर अशिरवाद प्राप्ति के बाद पानी लेने रसोई में जाने लगी,गुरू जी ने रोककर कहा हरिया तुम पानी लाओ।
हरिया भागता हुआ रसोई में गया,जल्दी से गिलास को मटके में डालकर वापिस आ ही रहा था कि रसोई की चौखट से पांव टकराने से थोड़ा पानी गिर गया।
गुरूवर ने पानी का गिलास लेकर अपने पास ही रख दिया।अब उसकी बीवी से कहा ,बेटी तुम एक गिलास पानी लेकर आओ, जोकि पूरा उपर तक भरा हो किन्तु। “”ध्यान ” से ।
उसकी बीवी के रसोई घर में जाते ही गुरूवर ने कहा,हरिया रसोई से लेकर यहां तक,रास्ते में बाधा उत्पन्न कर दो।
हरिया ने रास्ते में कुछ न कुछ रख दिया।
उसकी बीवी ने पहले चौखट पाल की,फिर सारी बाधाओं को लांघते हुए गुरूवर को पानी का गिलास दिया।
गुरू जी ने तशतरी समेत ही लेकर कहा बेटी बैठ जाओ।
गुरूवर बोले,,,,,,,,हरिया,, हमें हर काम को एकाग्रता से करना चाहिए।
इतना लंबा घूंघट,सधे हुए कदम,चौखट,बाधाएँ भी एक निपूण ग्रहणी को रोक न पाए।अब जरा अपने गिलास और दुसरे गिलास में अंतर देखो।तुम्हारा गिलास आधा खाली है ।
और दुसरे गिलास की तशतरी तक में एक बूंद तक नही गिरी।
इसे कहते हैं ध्यान,,,, एकाग्र चित मन का टिकना,, सिर्फ उस केंद्र बिंदु की तरफ गौर करना।
घूंघट में उसे सिर्फ अपने पांव जितनी ही जमीन नजर आ रही होगी।ऐसे ही दुनिया का ख्याल समेट कर एकाग्रता के साथ। जैसे…….
उसका ध्यान केवल पानी के गिलास में ही था।।
*ध्यान फकीरी सीखनी*
*पनिहारिन से सीख।*
*बातें करे सखियन से,*
*’ध्यान’ गगर के बीच*।।
*राधास्वामी जी*

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