दो गोपियाँ

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दो गोपियाँ रास्ते में खड़ी हैं, गुमसुम हैं, देखने में लगता है कि बड़ी उदास हैं, हैं नहीं, पूछो तो कहती हैं कन्हैया कहीं गया थोड़े है, यहीं है ।
हैं ? यहीं है ? कहाँ ? दिखता तो नहीं ?
तो एकसाथ बोलीं, मुझे दिखता है । भीतर दिखता है । “सखी री ! मन के श्याम भले ।”
“जिगर में छिपी है तस्वीरे यार ।
जब जरा नज़रें झुकाईं दीदार हो गया ॥”
सूरदास कुएँ में पड़ गए, शिकायत नहीं करते, रोते नहीं, भजन गा रहे हैं, कन्हैया ने हाथ दिया तो पकड़कर बाहर आ गए, अब कन्हैया हाथ छुड़ाए तो ये छोड़ें नहीं । जोर आजमाईश बढ़ी तो हाथ छूट गया । सूरदास जी कहने लगे, निर्बल जानकर हाथ तो छुड़ाकर जा रहे हो, मन से निकल कर जाओ तो तुम्हें सबल मानूं ।
इधर वासुदेव जी कन्हैया को यशोदा मैया के पास लिटा तो गए, पर मैया तो सो रही
है, जानती नहीं कि कन्हैया मेरे पास है ।
मेरे प्यारे, मेरे भोलेराम ! वह परमात्मा न दूर था, न है, न हो ही सकता है ।
वह तो सदा साथ है, बाहर भीतर सब और पसरा है, छाया है ।
तुझे नहीं दिखाई देता ? कारण क्या है ?
कारण तुम्हारा मन है । तुम्हारा मन परमात्मा से जितना दूर है, परमात्मा तुम्हें
उतना ही दूर है । यदि मन से दूरी नहीं है, परमात्मा मन में ही है, तो तुम्हें वह
संग ही है ।
और इसमें कठिन क्या है ? तुम अभी आँखों को बंद करो, भगवान के एक रूप की कल्पना करो, जितने समय तक कल्पना रहेगी, उतने समय वह मन में ही रहेगा ।
बस बार बार के अभ्यास से जब यह कल्पना मन में बैठ जाएगी, दृढ़ हो जाएगी,
तब वह परमात्मा तुम्हारा हो जाएगा, तब देह भले छूट जाए, वह नहीं छूटने का ॥

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