देव प्रतिमा निर्माण विधि

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सूत जी बोले – ब्राह्मणों ! मैं प्रतिमा का शास्त्रसम्मत लक्षण कहता हूं । उत्तम लक्षणों से रहित प्रतिमा का पूजन नहीं करना चाहिए । पाषाण, काष्ठ, मृत्ति का, रत्न, ताम्र एवं अन्य धातु इनमें से किसी की भी प्रतिमा बनायी जा सकती है । उनके पूजन से सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं । मंदिर के माप के अनुसार शुभ लक्षणों से संपन्न प्रतिमा बनवानी चाहिए । घर में आठ अंगुल से अधिक ऊंची मूर्ति का पूजन नहीं करना चाहिए । देवालय के द्वार की जो ऊंचाई हो उसे आठ भागों में विभक्त कर तीन भाग के माप में पिण्डि का तथा दो भाग के माप में देव प्रतिमा बनाये । चौरासी अंगुल (साढ़े तीन हाथ) की प्रतिमा वृद्धि करनेवाली होती है । प्रतिमा के मुख की लंबाई बारह अंगुल होनी चाहिए । मुख के तीन भाग के प्रमाण में चिबुक, ललाट तथा नासिका होनी चाहिए । नेत्र के मान के तीसरे भाग में आंख की तारिका बनानी चाहिए । तारिका के तृतीय भाग में सुंदर दृष्टि बनानी चाहिए । ललाट, मस्तक तथा ग्रीवा – ये तीनों बराबर माप के हों । सिर का विस्तार बत्तीस अंगुल होना चाहिए । नासिका, मुख और ग्रीवा से हृदय एक सीध में होना चाहिए । मूर्ति की जितनी ऊंचाई हो उसके आधे में कटि – प्रदेश बनाना चाहिए । दोनों बाहु, जंघा तथा ऊरु परस्पर समान हों । टखने चार अंगुल ऊंचे बनाने चाहिए । पैर की लंबाई चौदह अंगुल में बनानी चाहिए । अधर, ओष्ठ, वक्ष:स्थल, भ्रू, ललाट, गण्डस्थल तथा कपोल भरे पूरे सुडौल सुंदर तथा मांसल बनाने चाहिए, जिससे प्रतिमा देखने में सुंदर मालूम हो । नेत्र विशाल, फैले हुए तथा लालिमा लिए हुए बनाने चाहिए ।
इस प्रकार के शुभ लक्षणों से संपन्न प्रतिमा शुभ और पूज्य मानी गयी है । प्रतिमा के मस्तक में मुकुट, कण्ठ में हार, बाहुओं में कटक और अंगद पहनाने चाहिए । मूर्ति सर्वांग – सुंदर, आकर्षण तथा तत्तत् अंगों के आभूषणों से अलंकृत होनी चाहिए । भगवान की प्रतिमा में देवकलाओं का आदान होनेपर भगवत्प्रतिमा प्रत्येक को अपनी ओर बरबस आकृष्ट कर लेती है और अभीष्ट वस्तु का लाभ कराती है ।
जिसका मुखमण्डल दिव्य प्रभा से जगमगा रहा हो, कानों में चित्र विचित्र मणियों के सुंदर कुण्डल तथा हाथों में कनक मालाएं और मस्तक पर सुंदर केश सुशोभित हों, ऐसी भक्तों को वर देनेवाली, स्नेह से परिपूर्ण, भगवती की सौम्य कैशोरी प्रतिमा का निर्माम कराये । भगवती विधिपूर्वक अर्चना करने पर प्रसन्न होती हैं और उपासकों के मनोरथों को पूर्ण करती हैं ।
नव ताल (साढ़े चार हाथ) की विष्णु की प्रतिमा बनवानी चाहिए । तीन ताल की वासुदेव की, पांच ताल की नृसिंह तथा हयग्रीवकी, आठ ताल की नारायण की, पांच ताल की महेश की, नव ताल की भगवती दुर्गा की, तीन तीन ताल की लक्ष्मी और सरस्वती की तथा सात ताल की भगवान सूर्य की प्रतिमा बनवाने का विधान है । भघवान की मूर्ति की स्थापना तीर्थ, पर्वत, तालाब आदि के समीप करनी चाहिए अथवा नगर के मध्य भाग में या जहां ब्राह्मणों का समूह हो, वहां करनी चाहिए । इनमें भी अविमुक्त आदि सिद्ध क्षेत्रों में प्रतिष्ठा करने वाले के पूर्वा पर अनंत कुलों का उद्धार हो जाता है । कलियुग में चंदन, अगरु, बिल्व, श्रीपर्णिक तथा पद्मकाष्ठ आदि काष्ठों के अभाव में मृण्मयी मूर्ति बनवानी चाहिए
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