तृष्णा के त्याग से इतना सुख प्राप्त होता है कि इसके एक अंश की बराबरी कामसुख या स्वर्गसुख नहीं कर सकता ।’

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राजा नहुष की छ: संतानों में से महाराज ययाति दूसरी संतान थे । इनके बड़े भाई का नाम यति था । वे बचपन से निवृत्तिमार्ग में अग्रसर होकर ‘ब्रह्म’ स्वरूप हो गये, अत: कोसलदेश का शासन ययाति के हाथों में आया । ये बहुत शूर वीर थे । अपने पराक्रम से आगे चलकर ये सम्राट हो गये थे । ये युद्ध में देवताओं, दानवों और मनुष्यों के लिए दुर्धर्ष थे । ये परमात्मा के भक्त, पुण्यात्मा और धर्मनिष्ठ थे । ये अपने पास क्रोध को फटकने नहीं देते थे । सभी प्राणियों पर इनकी अनुकंपा बरसती रहती थी । इन्होंने अगणित यज्ञ याग किये थे ।
महर्षि शुक्राचार्य की कन्या देवयानी इनकी पत्नी थी । दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा अपनी दासियों के साथ देवयानी की दासी बनकर साथ आयी थी । आगे चलकर राजा ययाति ने चुपके से शर्मिष्ठा को भी अपनी पत्नी बना लिया था । देवयानी को इस रहस्य का तब पता चला, जब इसने शर्मिष्ठा के तीनों लड़कों को देखा । इससे क्रुद्ध होकर देवयानी अपने पिता महर्षि शुक्राचार्य के पास चली गयी । पीछे – पीछे ययाति भी वहां जा पहुंचे । अपनी लाडिली पुत्री को दु:खी देखकर शुक्राचार्य को क्रोध हो आया । उन्होंने ययाति को बूढ़ा होने का शाप दे दिया । शाप देते ही महाराज ययाति बूढ़े हो गये । उन्होंने महर्षि की बहुत अनुनय – विनय की । तब शुक्राचार्य ने परिहार बतलाया – ‘यदि तुम्हारे पुत्रों में से कोई तुम्हारा बुढ़ापा लेकर अपनी जवानी दे दे, तब तुम फिर जवान हो सकते हो ।’
महाराज ययाति घर लौट आये । सबसे पहले ये देवयानी के पुत्रों के पैस पहुंचे । देवयानी से इनके दो पुत्र थे – यदु और तुर्वसु । महाराज ने उनसे अलग अलग जवानी की मांग की, परंतु दोनों ने इसे अस्वीकार कर दिया । तब महाराज शर्मिष्ठा के ज्येष्ठ पुत्र अनु के पास गये । अनु ने भी महाराज की मांग अस्वीकार कर दी । शर्मिष्ठा के दूसरे पुत्र द्रुह्युने भी यह मांग ठुकरा दी । अंत में महाराज शर्मिष्ठा के तीसरे पुत्र पुरु के पास गये । पुरु ने अपनी जवानी देकर पिता का बुढ़ापा अपने ऊपर ले लिया । पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र को आशीर्वाद दिया – ‘मेरे साम्राज्य पर तुम्हारा और तुम्हारे वंशजों का ही आधिपत्य होगा ।’
युवावस्था प्राप्त महाराज ययाति विषय भोग में लिप्त हो गये । काम चार पुरुषार्थों में एक है । यह त्याज्य नहीं है, किंतु इसका अतियोग अनुचित है । फलत: महाराज वासनाओं की गहराई में उतरते चले गये । बहुत दिनों के बाद उन्हें अपनी भूल का भान हुआ । भगवान की कृपा से उनकी आंखें खुल गयीं । अब विषय वासनाएं विष प्रतीत होने लगीं । उन्होंने संसार को अपनी जो अनुभूति दी है, वह इस प्रकार है – ‘काम की तृष्णा उपभोग से कभी कम नहीं होती, प्रत्युत और बढ़ती ही चली जाती है । अग्नि में जैसे – जैसे घी डाला जाता है, वैसे वैसे उसकी लपटें बढ़ती जाती हैं, ठीक यहीं दशा विषय भोग की है । पृथ्वी में जितने धन – धान्य, पशु पक्षी और स्त्रियां हैं, वे सब एक पुरुष के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं । इसलिए मनुष्य को भोग की ओर न बढ़कर इंद्रियों का नियंत्रण करना चाहिए । मन को परमात्मा में लगाना चाहिए । विषयभोग मन को परमात्मा की ओर से हटा देता है । सच्चा सुख ब्रह्म की प्राप्ति में ही संभव है । तृष्णा ऐसा भयानक रोग है, जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाता है । केश, दांत, नख – ये सब जीर्ण हो जाते हैं, किंतु मरते दम तक तृष्णा जीर्ण नहीं होती । इस तृष्णा के त्याग से इतना सुख प्राप्त होता है कि इसके एक अंश की बराबरी कामसुख या स्वर्गसुख नहीं कर सकता ।’
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