टेढ़ी खीर

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शादी की बारात की दावत चल रही थी। महमानों की बहुत सेवा हो रही थी। महमानों में एक सज्जन जिनको सब भाई साहब कह कर बुलाते थे, वे जन्म से ही नेत्रहीन थे। खाने के बाद खीर परोसी गई। भाई साहब को खीर बहुत पसन्द आई। उन्होंने परसने वाले सज्जन को बुला के पूछा कि ये क्या है?

उसके कहने पर कि ये खीर है तो भाई साहब ने पूछा कि इसका कैसा रंग है? जब उन्हें बताया कि इसका सफेद रंग है तो वह फिर बोले कि सफेद क्या होता है।

परसने वाले ने कहा कि जैसा बगुले का रंग होता है वैसा ही खीर का रंग है। भाई साहब ने बगुला भी नहीं देखा था तो बोले कि भाई बगुला क्या होता है। परसने वाले को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने अपने हाथ को मोड़ कर बगुले की गरदन बना कर भाई साहब को कहा कि ऐसा होता है। भाई साहब ने जब परसने वाले के हाथ को छुआ तो बोले, “अरे! ये तो टेढ़ी खीर है!”

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