जटिल समस्‍या, आसान समाधान

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मधेशपुर के राजा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कर्णसेन को मधेशपुर का राजा बनाया गया। कर्णसेन को समझ नहीं आ रहा था कि वे कैसे अपने राज्‍य भार को संभाले किन लोगों पर विश्वास करें और किन पर विश्‍वास न करें, इसी बात से वे बहुत चिंतित रहते थे।
एक दिन वे अपने महल के रोशनदान से बाहर की ओर देख रहे थे कि अचानक उनकी नजर लोगों के एक समूह पर पड़ी जो कि एक साथ एक ही दिशा में कहीं जा रहे थे।
उत्सुकतावश कर्णसेन ने अपने सेनापति से पूछा, ये सभी कहाँ जा रहे हैं, वो भी एक साथ?“
सेनापति ने कहा, “महाराज आपके राज्‍य में एक प्रख्‍यात् साधु आए हैं। ये सभी लोग उन्ही का उपदेश को सुनने जा रहे हैं। सुना है, महाराज के पास प्रत्‍येक समस्‍या का समाधान है।”
यह सुन कर कर्णसेन ने सेनापति से कहा, “हम भी साधु के उपदेश सुनना चाहते हैं। हमे भी उनके आश्रम जाना चाहिए।
राजा और सेनापति साधु के आश्रम पहुँचे। उस समय साधु भोजन कर रहे थे। राजा ने आपनी व्‍यथा साधु को कह सुनाई और उनसे अपनी समस्‍या का निवारण मांगा।
साधु अपना भोजन पूर्ण करके अपने लकड़ी के आसन से उठने लगे, तो अचानक ही उनका दुशाला, आसन कि कील में फंस कर फट गया, जिसे सिलने के लिए साधु ने अपनी झोली से सुई धागा बाहर निकाला और सुई में धागा पिरोने का प्रयास करने लगे। बुढापे की वजह से साधू की आंखें बहुत कमजोर हो चुकी थीं, इसलिए सुई में धागा पिरोना उनके लिए काफी कठिन प्रतीत हो रहा था।
साधु को धागा पिरोने में परेशान होते देख कर्णसेन ने कहा, “महाराज। आप ये पुराना दुशाला मुझे दे दीजिए। मैं आपको राज-महल से कुछ नए रेशमी कपड़े व दुशालाऐं भिजवा देता हूँ।”
साधु ने कहा, “राजन्, मैं आपके राज-महल के कपड़े नहीं ले सकता,लेकिन अगर आप मेरी मदद करना ही चाहते है, तो केवल इस सुई में धागा पिरो दीजिए।”
कर्णसेन ने सुई में धागा पिरोकर साधु को दे दिया।
साधु ने अपने दुशाला में टांका लगाया और कहा, “राजन, मनुष्य को कभी भी किसी पर भी निर्भर नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि दूसरों पर निर्भरता ही कई समस्‍याओं का मूल कारण होता है। तुम भी दूसरों पर अपनी निर्भरता से छुटकारा पाओ और अपने निर्णय स्‍वयं अपने विवेक से लो। यही तुम्‍हारी सभी समस्‍याओं का समाधान है।”
 

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