जगमगाती रात

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आज दोनों दूल्हा दुल्हन के जोड़े में सजी नक्काशीदार   स्वर्ण-सिहासनों पर बैठे हुए बिल्कुल नए जोड़े की तरह लग रहे थे। उन्हें दूर से देखकर तो कोई कहीं नहीं सकता था कि उनकी शादी के 25 वर्ष बीत गए हैं। महंगे बालों में लगा हुआ बेले का गजरा कान से सटा कंधे पर लटका लटक रहा था।  दूर से ही उनका गोरा चेहरा हर मेहमान को अपनी ओर खींच रहा था।
इस पार्टी में शुक्ला जी ने शहर के सभी खास लोगों को आमंत्रित किया था।  क्योंकि वह बड़े पदाधिकारी थे, इसलिए उनकी जान-पहचान शहर के गिने चुने लोगों से थी और शहर का कोई ऐसा व्यक्ति ना था जो उनके रुतबे का कायल ना हो इसलिए समाज में उनकी काफी इज्जत और धाक बनी हुई थी।
विवाह की रजत जयंती में मनोज शुक्ला और कामिनी शुक्ला ने एक-दूसरे को जय माला पहनाकर 25 वर्ष पहले हुए अपने विवाह में हुई रस्म को दुहराया,  जिसकी कितनी ही तस्वीरें ली गई। वीडियोग्राफी हुई। कामिनी शुक्ला तो अपनी शादी की यादों में इस तरह खो गई थी कि उन्हें लगा कि सचमुच उनकी शादी ही हुई है अभी अभी।  मन प्राण तक रससिक्त हो चुका था।
दूसरी और मनोज शुक्ला इस समारोह की तैयारी देखकर गर्व से भर गए थे बड़े शानदार ढंग से उन्होंने अपनी शादी की रजत जयंती को मनाना चाहता और इसके लिए काफी खर्च भी किया था उनके मंसूबे पूरे हो गए थे। एक तालाब के किनारे यह पार्टी हो रही थी जिसके चारों तरफ बिजली जगमगा रहे थे। खुले आकाश के नीचे लॉन में भी बैठने की व्यवस्था थी और पंडाल भी सजे  हुए थे। पूरे वातावरण फूलों और लजीज पकवानों की खुशबू से भरा हुआ था। सुंदर पोशाकों में सजे हुये वेटर स्टार्टर और ड्रिंक सर्व कर रहे थे। हर आमंत्रित को लग रहा था कि वह इस पार्टी का खास मेहमान है ।
और वह अपनी यथार्थ जिंदगी के कसैलापन को भूलकर थोड़ी देर के लिए इस खूबसूरत दुनिया का एक हिस्सा बन जा रहा था।  कोई बड़ा सा गुलदस्ता लेकर आ रहा है तो कोई उपहार तो कोई लिफाफा. हर आमंत्रित शुक्ला जी की दरियादिली और पत्नी प्रेम से प्रभावित हो रहा था।  वह सोच रहे थे कि कितने खुशनसीब हैं शुक्ला जी! किस्मत इतनी मेहरबान है उन पर धन दौलत, पद-मान, सुंदर पत्नी, दो सुंदर जवान और होनहार बेटे क्या नहीं मिला उन्हें !इतना सबको नहीं मिलता।
मनोज शुक्ला ने इस संध्या को सुरमई बनाने के लिए संगीत पार्टी भी बुला रखी थी स्वादिष्ट व्यंजन और मधुर मनोरंजन से भरी यह पार्टी देर रात तक चलती रही।
एक-एक कर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद शुक्ला जी भी घर लौटने को हुए तब तक कामिनी शुक्ला थक चुकी थी।  उन्होंने बड़ा नजाकत के साथ अपनी पत्नी को बाहों में घेरकर उठाया और सहारा देकर ले चलें। कामिनी शुक्ला को पति का यह आलिंगन अतीत की स्मृतियों में खींच ले गया जब उनका पति प्रेमी बनकर उनके मन में समा गया था और उन्होंने इस प्रेमी को सदा के लिए दिल में बसा लिया था।  बाहों में बंधते ही दिल में यह तमन्ना कि काश! वक़्त यहीं ठहर जाता और प्यार की इस मीठी कैद से कभी मुक्ति नहीं मिलती।
इसी ख्वाहिश में खोई वह शुक्ला जी के साथ कदम से कदम मिलाती हुई कार तक आई।  लगा जैसे बादलों में कदम डाल रही हैं ड्राइवर ने अदब से एक कार का डोर खोला और शुक्ला जी ने पहले पत्नी को बैठाया फिर दूसरी ओर से जाकर स्वयं बैठकर।
पार्टी वाले स्थान से अपने घर तक का सफर कामिनी सुबह के लिए इतना सुखद था कि मैं भूल गई कि इस आनंद यात्रा को घर तक जाकर खत्म हो जाना था इसका एहसास उन्हें तब हुआ जब गाड़ी घर के सामने जाकर रुक गई। शुक्ला जी उतरे और सीधे घर के अंदर चले गए  तो कामिनी शुक्ला को अजीब लगा की अचानक उन्हे क्या हुआ ?
कोई जरूरी बात याद आई ? और याद भी आई तो अब  जो कुछ भी होगा सुबह में ही होगा, इसी उधेड़बुन में पड़ी थी कि ध्यान गया ड्राइवर कार का डोर खोलकर उनके उतरने का इंतजार कर रहा था.
वह घर के भीतर पहुंची तो आज प्रौढ़ा होते हुए भी अपने को किशोरी महसूस कर रही थी एक मुद्दत बाद उन्हें अपने पति की सूरत में प्रेमी नजर आया था।  आज ना जाने क्यों दिल धड़कने लगा था। उम्र की राह पर भी पीछे लौट गई थी जैसे।
शयन कक्ष के भीतर कदम रखा तो देखा शुक्ला जी अलमीरा खोलकर अंगूठी का डिब्बा निकाल रहे हैं अब अंगूठी हो या कान के बुंदे वह मुस्कुराई उनके गाल लाल हो उठे सोचने लगी तो-” छुपा कर उन्होंने मेरे लिए गिफ्ट भी खरीद लिया बहुत दिनों बाद मुझ पर इतना प्रेम बरसाएंगे ” कामिनी शुक्ला बिना कुछ बोले चुप चाप बिस्तर पर लेट गई उछलते हुए दिल को संभालते हुए आंखें मूंद ली सोने का बहाना करते हुए “अब आकर वही जगाएंगे” बस दो पलों का ही तो इंतजार है शरीर की सारी कोशिकाएं प्रतीक्षारत।  प्रेम का बादल बरसने वाला था।
तभी दो पलों में अलमारी बंद होने की आवाज आई और उसे सुनते ही कामिनी के दिल की धड़कन तेज हो गई हां अब इंतजार को इसी क्षण खत्म हो जाना था ।
लेकिन शुक्ला जी के पैरों की आहट बाहर जाती हुई क्यों सुनाई पड़ी?  कुछ गलत सुन रहे हैं उनके कान शायद हड़बड़ाकर कामिनी ने आंखें खोली तो दिखाई पड़ा मैं बाहर जा रहे हैं तीर की तरह निकल गए शुक्ला जी।
ओह अब उनकी समझ में सब कुछ आ गया था यह उपहार किसके लिए?  प्यार का यह अभिनय? कैसे इतना संभव हो सका…?
 कामिनी वही की वही बिस्तर मे जड़ हो गई जैसे बरसों से जड़ होती आई थी।  कहीं कुछ नहीं बदला सच्चाई अपनी जगह वैसी ही है। एक मन हुआ की दौड़ कर पीछे से शुक्ला जी को पकड़ ले। खींचकर कहे …” आज तो मत जाइए।  आज हमारी शादी की 25वी वर्षगांठ है…. रजत जयंती! जिसे आपने इतने सालों शौकत के साथ मनाया। यदि कहानी दोहरानी थी तो क्यों किया यह सब ? …पर नहीं। नहीं कहेंगी  यह सब। नहीं गिड़गिड़ाएंगी। अचानक बर्फ बन गई वह । कर स्टार्ट होने की आवाज आई और फिर बाहर जाने की। बाकी सारी राते वैसी ही थी सिवाय इस रात के लिए यह दीवाली की रात लग रही थी । पूरे घर पर  जुगनू जैसे बल्बो की लड़िया झूल रही थी जो जल-जल कर बुझ रही थी और बुझ बुझकर जल रही थी।
लेखिका:अंजना वर्मा

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