चिरैया अपनी मुंडेर पर वापस लौट आई

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मालिनी जी को उनकी बेटी ने गर्व करने का मौक़ा दिया है …बेटियाँ होती ही ऐसी हैं …बेटों पर फ़िदा रहने वाला ये समाज अगर बराबरी के स्तर पर बेटियों को हक़ /सम्मान देने लगे और उसकी ख़्वाहिशों की कद्र करने लगे तो देश/ समाज की सूरत बदल जाएगी …
अभी भी हमारे समाज का बहुत बड़ा तबक़ा ऐसा है जो डिलीवरी रूम से बेटों की किलकारी की आवाज़ ही सुनना चाहता है और दुर्भाग्य से ऐसी ख़्वाहिशें दादी /नानी / ज़्यादा पालती हैं ..औरत ही औरत की कोख से बेटियों की तुलना मे बेटों के लिए ख़्वाहिशमंद होती हैं …
वक्त के साथ से सोच बहुत हद तक बदली है ..
काश ! हर घर में जश्न बेटियों के पैदा होने पर हो …
काश ! बेटी जन्मते ही मुँह फुला लेने वाली दादियों की सोच बदल जाए …
काश ! गाँवों/शहरों में बेटों की तरह बेटियों को भी पढ़ने और उड़ने के लिए खुला आसमान मिलने लगे …
काश! पैदा होने के कुछ साल के भीतर किसी तरह कुछ पढ़ा लिखाकर हाथ पीले कर देने की पुरातपंथी सोच हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए तो मालिनी जी तरह हर माँ गर्व करेगी कि उसने बेटी पैदा की है …
किसी ज़माने में एक बेटे की चाह में आठ -आठ बच्चे हो जाते थे …पहली बेटी से लेकर सातवीं बेट तक …हर बार बेटी के पैदा होने पर शोक संतप्त परिवार बेटे की चाहत पालता हुआ उस शुभ दिन का इंतज़ार करता था , जब उनके घर बेटा हो ..और फिर ऐसा होता था कि आठवें बेटे पर पूरा परिवार न्योछावर रहता था …बेटियों को जैसे -तैसे पढ़ाकर ब्याह दिया जाता था और बेटे के लिए सपने बुनते थे ..और वो बेटा अक्सर नालायक निकलता था …बेटियाँ ही आख़िर माँ -बाप के काम आती थीं …ससुराल और मायका ..दोनों संभालती थी ..
मैं भी एक बेटी का बाप हूँ …बेटी की बाप होना ज़िंदगी का सबसे ख़ुशनुमा अहसास है
अब आप मालिनी जी की पोस्ट पढ़िए
मालिनी अवस्थी जी की पोस्ट
डॉक्टरी की पढ़ाई करते हुए जब कुहू ने “डब्लू एच ओ” WHO से सम्बद्ध संस्था के साथ, सूडान जाने का निश्चय हमे बताया, तो हम हैरान हो गए। उस समय सूडान के हालात बिल्कुल अच्छे न थे, मिस्र में क्रांति हो रही थी। सूडान में खुलेआम गोलियां चल रही थीं। युद्ध की विभीषिका में घायल रोगियों के जबड़ों का आपरेशन का वॉलंटरी यानी स्वैच्छिक सेवा का शिविर था।
हम दोनों माता पिता उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे लेकिन मेरे पति ने कहा, अपनें मन से उसने इतना बड़ा निर्णय लिया है, जाने दो। वीज़ा हुआ, वहाँ उसकी सोच के अनुकूल अनेक युवा आये थे। युद्ध की विभीषिका झेल रहे सूडान में दो सप्ताह रह कर अनेक सर्जरी और उपचार कर लौटी, और बोली मुझे आगे जीवन मे यही करना है।
समय बीता, मास्टर्स के लिए हार्वर्ड विवि में दाखिला मिल गया वह भी स्कॉलरशिप के साथ!
घर मे सबने कहा, अब गई बिटिया हाँथ से! अब विदेश में ही नौकरी, वहीं शादी ब्याह!
और तो और, हमारी अम्मा (सास) भी यही कहतीं, स्वाभाविक था, दोनो बेटे (हमारे दोनो देवर) अमेरिका में ही जा बसे थे।
सब यही कहते, बाहर से लौटना मुश्किल है। इतने बड़े कॉलेज में गई, अब वही जिंदगी रास आएगी। में चुप! विदेश में जाकर बस जाने वाले निर्मोहियों को खूब देखा है मैंने।
लेकिन,
अपनी बछिया को तो गैया ही पहचाने, बेटी के संस्कार मुझसे ज्यादा कौन जाने, मैं मुस्कुरा देती।
समय बीता, कोर्स पूरा हुआ, वहीं नौकरी और रिसर्च के प्रस्ताव मिले,
लेकिन,
चिरैया अपनी मुंडेर पर वापस लौट आई। सबने रोका, बोली, “वहां गोरों का स्वास्थ्य ठीक करने को थोड़ी पढ़ाई करी है 😊 अपने देश मे सेवा करनी है”
वह लौट आई और भारत आकर उसने कई योजनाओं पर काम प्रारंभ कर दिया, स्वस्थ भारत मिशन से जुड़ी, ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाएं, स्वास्थ्य क्षेत्र पर ब्लॉग और लेख भी लोकप्रिय हुए।
तभी एक दिन,
बोस्टन हार्वर्ड विवि से अनन्या के प्रोफेसर का फोन आया, हार्वर्ड भारत मे पहला पब्लिक हेल्थ संस्थान खोलना चाह रहा है,और वे चाहते हैं कि अनन्या इस के डायरेक्टर के पद सर्वथा उपयुक्त हैं। परीक्षा होगी, कई लोगों में से किसी एक का चयन होना है।
स्वप्निल प्रस्ताव था, अनन्या ने तैयारी की, और चुन ली गई।
आज हमारी बेटी अनन्या भारत के हार्वर्ड सेंटर को सम्हाल रही है।
जिस संस्थान में कभी पढ़ी, आज उसी मे कार्य कर रही है, वह भी अपनी शर्तों पर, अपने देश मे! अपने देश के लिए स्वास्थ्य योजना और सेवा के स्वप्न को जी रही है।
शिक्षा कहीं से भी हो, कैसी भी हो, यदि वह शिक्षा अपने समाज, अपने देश के काम नही आती, तो वह शिक्षा ही व्यर्थ है।
अपने संस्थान हार्वर्ड में वहां की इम्प्लॉई की तैनाती के बाद मीटिंग के लिए बोस्टन गई अनन्या आज रात वापस आ रही है।
स्वागत कुहू

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