घूँघट

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चार हाथ घूँघट के, पीछे, कैसा है तेरा संसार
जो तुमने इसमें छुपकर, इतने दिन दिए गुज़ार..
वो नभ का सुथरा नीलापन, मैला सा लगता होगा
वो धवल चन्द्रमा भी शायद, धुंधला सा दिखता होगा
जब भीना सा घूंघट कोई, मर्यादा का नाम लिए
मौन तुम्हारी आँखों पर, बरबस ही चढ़ता होगा.
क्या इन नैंनो की पुतली भी, कर पायी होगी गगन विहार.
चार हाथ घूँघट के पीछे है कैसा रहा होगा तेरा ये संसार.
जब बादल छाये काले से, और चली ठंडी पवन,
नभ में तड़ित यष्टिका चमकी, उल्लास हो उठा मन में.
तब तुम गरमी की मारी, छोटे से कमरे में,
कैद रही बस अपने इस किस्मत के अवगुंठन में,
क्या तुम भी महसूस करती होगी सावन की पहली बौछार,
चार हाथ के घूँघट के पीछे, है कैसा रहा तेरा संसार..
हे मुनियों, हे शास्त्रसर्जकों, किस पर समय गंवाया,
अवगुंठन के अभिनन्दन में, अपना ज्ञान लड़ाया.
सदा तुम्हारी हितैषिणी इस, कोमल सी रचना पर,
जीवित रहते ही बोलो, क्यों, ऐसा कफ़न चढाया.
तो तुमने इस तरह निभाया, नारी की रक्षा का भार,
चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा उनका संसार.
सोचो तुम किस भांति करोगे इतने त्यागों का प्रतिकार,
चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.
एक चहकने को आतुर, चिड़िया के पंखों की हार,
रण में चलने को विह्वल, बंद म्यान में एक कटार.
एक पुरुष के वृथा दंभ पर, बलिदान हो गयी नारी के,
स्वप्नों के टुकड़ों पर लटकी, मर्यादाओं की तलवार.
चार हाथ घूँघट के पीछे, ऐसा ही बसता संसार,
इसी तरह जी कर नारी ने इतने जीवन दिए गुज़ार
चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.

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