घमंडी राजा

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प्राचीन समय मे एक राजा को खुद पर बडा घंमड था बिल्कुल नास्तिक था !
ऐसे मे उसने अपने राज्य मे पूजा की जाने वाली भगवान की मूर्तियों को हटवाना शुरू करवा दिया इससे प्रजा मे आक्रोश तो था परंतु क्या समाधान करें समझ नही आ रहा था !
तब उसी राज्य से एक पहुंचे हुए संत भ्रमण करने आये हुए थे पूरी बात जानकर वह राजा के दरबार पहुंचे और अपनी श्रद्धा और विश्वास का हवाला देकर भक्तों को पूजा करने देने की विनती की !
इसपर राजा गुस्सा होकर बोला — अगर तुम साबित कर सको कैसे तुम पत्थरो से बनी मूर्तियों मे विश्वास और श्रद्धा करते हो तब मानूंगा !
संत मुसकुराते हुए बोले — अच्छा ! ये आपका वचन है !
राजा — हां !
संत ने कुछ सोचा और राजा के पीछे लगी तस्वीर के बारे मे पूछा तो पता चला वो राजा के पूज्यनीय पिता महाराज की है !
संत बोले –राजन क्या आप इस तस्वीर को उतारकर उसपर थूक सकते हो पैरो से कुचल सकते हो !
राजा एकदम क्रोधित होकर बोला — ये मेरे पूज्यनीय पिताजी है ऐसा सोचने वाले की जुबान कटवा दूं तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बोलने की !
संत मुसकुराते हुए — राजन क्षमा करें ! मगर सोचिये ये कुछ रेखांकित चित्र मात्र है जिसमें कुछ रंग भरे है ये निर्जीव है मगर आपकी इसमें पिता के प्रति श्रद्धा है इसमें प्रेमभाव है विश्वास है !
उसी प्रकार हमें अपने भगवान देवताओं को पत्थर से बनी मूर्तियों पर ,राजन ये सब श्रद्धा और विश्वास का स्त्रोत है इसीलिए जैसे आप एक निर्जीव तस्वीर मे पिता की भक्ति श्रद्धा है वैसे ही हमारी हमारे भगवान के प्रति !
संत की बातें सुनकर राजा संत के चरणों मे गिरकर माफी मांगने लगा और उसी समय से पूरे राज्य मे किसी भी पूजा और भक्ति पर लगे सभी पाबंदी हटवा दी !!
!! ॐ नमः शिवाय !!
शिव समान दाता नहीं,
विपद निवारण हार
लज्जा मोरी राखिओ नंदी के सवार ।।
अतिहर्ण सुखकरं शुभभगति मुक्ति दातार
करो अनुग्रह दीन लखि अपनों विरद विचार ।।
अंतर्यामी नाथ तुम जीवन के आधार
जो तुम छोडो बांह तो कौन लगाये पार ।।
!! हर हर महादेव !!

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