करौली के बुगडार ग्राम में एक भोली-भाली गरीब गूजरी रहती थी।वह भगवान मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। भगवान मदनमोहन भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे।वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ । वह दूसरे दिन ही उन्हें वह चीज भेंट कर आती, पर वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती। वह रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।

दूध करौली नगर में दूसरे लोगों को भी देती। लेकिन मदनमोहन जी को दूध अपनी ओर से देती।उसके पैसे न लेती, पर करौली जाते समय रास्ते में जो नदी पड़ती, उसका जल दूध में मिला देती।एक बार नदी के पानी के साथ एक छोटी मछली दूध में मिल गयी। गूजरी को मछली दिखी नहीं । संयोगवश मदनमोहन जी का दूध देते समय ही मछली दूध के साथ चली गयी। मदनमोहन के सेवादार गोस्वामी जी को मछली दिख गयी। उन्होंने गूजरी को बहुत फटकारा और उससे दूध लेना बन्द कर दिया।

गूजरी को लगा, जैसे उसे फटकारा स्वयं मदनमोहन ने ही।उसे मदनमोहन की सेवा से वंचित हो जाने का बहुत दुख हुआ । उसने घर जाकर अन्न-जल त्याग दिया । दिन भर पड़ी-पड़ी रोती रही।मन ही मन मदनमोहन से प्रार्थना करती रही— ठाकुर, मुझसे जो अपराध हुआ, उसे क्षमा करो

दूध में पानी तो मैं रोज ही मिलाती हूँ; क्योंकि वही दूध रोज मुझे दूसरे लोगों को भी देना होता है। यदि पानी न मिलाऊँ तो मेरा गुजारा कैसे हो ? मेरे पास एक ही तो गाय है, जो दूध भी बहुत नहीं देती।

पानी मिलाकर जो दूध बेचती हूँ, उसी से किसी तरह मेरा काम चलता है।यह तुमसे छिपा तो है नहीं । तुमने कभी मेरे दूध पर आपत्ति भी नहीं की।रोज प्रेम से आरोगते रहे।आज दुर्भाग्य से उसमें मछली निकल आयी।

मेरा दोष इतना ही है कि पानी मैंने छानकर नहीं मिलाया। अब मैं पानी छानकर मिलाया करूँगी । यदि तुम पानी मिलाने को दोष मानने लगे हो तो पानी नहीं मिलाऊँगी।

बिना पानी मिला दूध बेचने से यदि मुझे आधा पेट भोजन करने को मिले तो उससे भी संतुष्ट रहूंगी, पर तुम मुझे इतने दिनों से चली आ रही अपनी दूध की सेवा से वंचित न करो, इसे वरदाश्त नहीं कर सकूंगी। तुम जैसी आज्ञा करोगे, वैसा ही करूंगी, और जब तक तुम आज्ञा नहीं करोगे, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगी, नहीं करूंगी, चाहे मेरे प्राण रहें या जायँ।

इस प्रकार रो-रोकर प्रार्थना करते-करते सन्धया हो गयी। उसी समय उसे किसी मधुर कण्ठ की आवाज सुनायी पड़ी–

‘मइया, ओ मइया, गर्दन मोड़ी तो देखा द्वार पर खड़ा पीताम्बर पहने एक किशोर वयस्क, सुन्दर, सलोना लाला , जिसने उसे बरबस आकर्षित कर बाध्य किया कहने को–‘लाला , आओ बैठो।’

लाला उसके पास आ बैठा।गूजरी ने पूछा–‘ लाला ! कहाँ से आये हो, तुम्हें पहले कभी देखा नहीं ।’

‘मइया, मैं ब्रज में रहूँ । म्हँईं ते आयो हूँ, मदनमोहन के दरसन करिबे कूं। दरसन करके कल सवेरे चल्यो जाऊँगो।’

‘तो बताओ महाराज! क्या सेवा करूं ।’

‘सेवा कुछ नाँय, एक रात ठहरबे को स्थान मिल जावे तो ठहर जाऊँ।’

‘शौक से ठहरो महाराज, घर तुम्हारा है ।’

लाला गूजरी के घर ठहर गये। गूजरी ने पूछा–‘बाबा, भोजन क्या करोगे ?’

‘ मइया, मैं दुग्धाहारी हूँ । दूध के सिवा और कछु नायँ लूं हूँ । दूध होय तौ प्याय दै।’

‘दूध तो है लाला , पर सवेरे का बासी है। अभी थोड़ी देर में गइया को सानी देकर दुहूंगी, तब ताजा दूध पिलाऊँगी। थोड़ी देर रुक जाओ।’

‘मइया, सवेरे ते कछु ना खायो। भूख बहुत जोर की लगी है। बासी दूध ही पी लऊँगो। ला दै दे।’

‘लाला, यह दूध अच्छा नहीं है। इसमें थोड़ा पानी मिलाया था। और पानी के साथ मछली आ गयी थी।’

‘मइया, तो कहा भयो ? छान के दै दे।’

‘तो लाला , इसे औटा लूं । सबेरे मेरा मन बड़ा दुखी हो गया, इसलिए विना औटाए रखा रह गया।’

‘अरी कच्चोई दै दे न, मोएं बड़ी भूख लगी है ।’

लाला की इतनी उतावली देख गूजरी ने झट दूध छान कर उन्हें दे दिया। बाबा ने दूध पीकर तृप्तिपूर्वक गूजरी की ओर देखा और कहा—‘मइया, तेरो दूध बड़ोई स्वादिष्ट है ।’

दूध पीकर लाला सो गये।गूजरी भी लेट गयी, पर भूखी-प्यासी उसे नींद कहाँ? जाड़े के दिन थे। उसने सोचा लाला को ठंड लगती होगी।अपनी लूंगड़ी उन्हें ओढ़ा दी। रात्रि के शेष प्रहर में उसे तन्द्रा आ गयी। स्वप्न में मदनमोहन ने कहा–‘दूध की सेवा के पीछे प्रान दे रही है। तेरी सेवा छूटी कबए ,रोज मन्दिर में दुग्ध दे जाया करती थी।

कल तो मैं तेरे घर आकर दूध पी गया। दूध दे जाया कर रोज, गुसाईं कुछ नहीं कहेंगे । पानी मिलाती है तो क्या हुआ? वह जल्दी हजम हो जाता है। अब उठ, भोजन कर।’ इसके साथ ही उसकी तन्द्रा जाती रही।दृष्टि डाली लाला पर । देखा कि वे नहीं ।उसे समझने में देर नहीं लगी कि लाला के रूप में मदनमोहन ही आये थे दूध पीने । उसने उठकर जल्दी से खुशी-खुशी दो टिक्कड़ बनाये। गुड़ समेत मदनमोहन को भोग लगाकर आनन्द से खाने बैठी। वह खाती जा रही थी और आनन्दाश्रु बहाती जा रही थी। थोड़ी देर में सबेरा हो गया।

कहते हैं कि बाबा अपना पीताम्बर छोड़ गये थे, लूगड़ी ले गये थे। सबेरे मंगला आरती के समय गोस्वामी जी ने उन्हें लूगड़ी ओढ़े देखा तो वे आश्चर्य और चिन्ता में डूब गये।

वे समझ गये कि मदनमोहन ने कोई लीला की है, पर लीला का रहस्य न समझ सके।थोड़ी देर में गूजरी आयी मदनमोहन का पीताम्बर लेकर और बोली—‘गुसाईं महाराज, यह लो मदनमोहन का पीताम्बर। कल उनसे भूल हो गयी। पीताम्बर मेरे घर छोड़ आये, मेरी लूगड़ी ले आये।’

अब गोस्वामी जी सारा रहस्य समझ गये। वे बार-बार अपने को धिक्कारने लगे–‘भक्त और भगवान के बीच मैंने अपनी टाँग अड़ाकर अच्छा नहीं किया। मै भक्तिहीन क्या समझूं उनके परस्पर के प्रेम व्यवहार को? गूजरी प्रेम से रोज दूध दे जाती मदनमोहन की सेवा के लिये, वह जैसा भी था, शुद्ध या अशुद्ध, मदनमोहन उसे प्रेम से स्वीकार करते। मैं कौन होता था गूजरी को मना करने वाला?

मैंने दोनों के प्रति अपराध किया। मेरे कारण गूजरी के भक्त हृदय को आघात पहुंचा । मेरे कारण मदनमोहन को उसके घर जाना पड़ा उसे मनाने और उसके आँसू पोंछने।’ उन्होंने गूजरी के चरणों में गिरकर उससे क्षमा माँगी। फिर मदनमोहन की भूल सुधारने में देर न की। उनके श्रविग्रह से लूगड़ी उतारकर गूजरी को दे दी और गूजरी से पीताम्बर लेकर उन्हें ओढ़ाया।

सचमुच क्या मदनमोहन ने अपने पीताम्बर से गूजरी बदलकर कोई भूल की थी? मदनमोहन भूल कभी नहीं करते। वे बड़े चतुर हैं । चतुराई से भूल करने का अभिनयमात्र करते हैं । इस बार भी उन्होंने अभिनय ही किया था। वास्तव में उनके लिये उस लूगड़ी का मूल्य पीताम्बर से अधिक था।

जो सुख व गरमहाट उन्हें अपनी प्रिय भक्त, प्राण प्यारी गूजरी की ओढ़ी लूगड़ी को ओढ़ने से मिल रहा था, वह पीताम्बर में कहाँ था ? लूगड़ी लूगड़ी नहीं, लूगड़ी के रूप में गूजरी ही थी, जिसे उन्होंने अपने वक्ष से लगा रखा था।

श्री राधा चरण रेणू

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