गर्म हवा

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महानगर की की एक शाम, सूरज डूब रहाथा. रोज
की तरह कॉलोनी के इस पार्क के गुमसुम से दो बूढ़े आदमी सीमेण्ट की एक बेंच पर आकर बैठे ही थे कि तभी एक बूढ़े ने आँखो से चश्मे को उतार कर उसके काँच को पहनी हुई कमीज के निचले हिस्से से साफ करते हुए कहा–‘‘ यार वर्मा जी, पिछले तीन दिनों से शर्मा जी दिखाई नहीं दे रहे, क्या वे बीमार है ?’’
वर्मा जी ने बड़ी धीमी और दुखी आवाज में बतलाया –‘ खन्ना साहब, आज दोपहर मेरी बहू को घर की नौकरानी बतला रही थी कि शर्मा जी को उनकी बहू और बेटे वृद्ध आश्रम छोड़ आये हैं. अब वे शायद
ही कभी आएँ.’
गहरी खामोशी के बाद एक लम्बी साँस लेकर वर्मा जी ने फिर कहा–‘’यार खन्ना में चलता हॅू.’’
‘‘ अरे यार ऐसी भी क्या जल्दी है ? इतनी जल्दी तो
आप कभी नहीं जाते. आज कुछ विेशेष बात है क्या ?’’ खन्ना जी ने बड़ी आत्मीयता से पूछा.
सहमे -बुझे हुए स्वर में वर्मा जी ने बतलाया ‘‘ खन्ना
साहब नौकरानी के जाते ही बहू ने मुझे धमकाते हुए कहा था –‘ सुन लिया न बाबूजी, मुझे और उनको आपका ज्यादा घूमना–फिरना पसन्द नहीं है. घर
में रहकर घर के कामों में हाथ बँटाया कीजिए. वरना
आप स्वयं समझदार है.
‘‘ सच कहते हो मेरे दोस्त.’’ वे एक गहरी साँस लेकर
बोले.
‘‘ अच्छा चलिए मैं भी आपके साथ ही चलता हॅू. यह कहते हुए धीरे से खन्ना जी उठे.
वर्मा जी–‘‘ अरे, आप क्यों चल रहे है कुछ देर
आप अभी बैठ ही सकते है.’’
‘‘ नहीं यार,”-काँपती आवाज में सिर झुका कर खन्ना जी बोले.
‘‘ क्यों क्या हुआ ?’’ बेहद चिंतित स्वर में वर्मा जी ने
पूछा.
‘‘ कुछ नहीं बस आप इतना समझ लीजिए कि हमारे खिलाफ भी हवाएँ गर्म होना शुरू हो गई हैं. कभी भी किसी भी दिन मुझे भी शर्मा जी की तरह …….. शेष शब्द उनकी आँखों से बहते हुए आँसुओ ने बिना कहे ही सब कुछ कह दिया. वर्मा जी ने खन्ना जी का काँपता हुआ बायाँ हाथ बड़े प्यार से अपने दाहिने हाथ से पकड़ा और वे दोनो पार्क के गेट से होते हुए सड़क के किनारे धीरे–धीरे बोझिल कदमों से चुपचाप अपने घरों की ओर चल दिए.
अब सूरज डूब चुका था.

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