प्रेम…!!

“प्रेम” क्या है “प्रेम”

इसका रूप कैसा है

कहाँ से शुरू होता है

कहाँ खत्म होता है

बड़ा मुश्किल है इसे

परिभाषित करना

और सच कहें तो बड़ा

विचित्र होता है ये “प्रेम”

और उसपर भी विचित्र होता है

भारतीय नारी का “प्रेम”

जो विदेशियों की तरह

चौबीस घंटे का नहीं होता

या कोई भारतीय नारी

चौबीसों घंटे अपने पति को

प्रेम नहीं करती या

आई लव यू -आई लव यू का

उदघोष नहीं करती रहती

बल्कि गर्म गर्म रोटियों सा

होता है उसका “प्रेम”

जिसे आटे की लोइयों में

गूँथ कर खिला देती हैं

हर रोज अपने पति को

कभी कपड़ों में नील की तरह

छिड़क देती है अपने “प्यार” को

कभी खाने की मेज़ पर

इंतज़ार करते हुए

स्नेह के दो बूँद आँखों से

निकाल कर परोस देती है

खाली कटोरियों में

और जरूरत पड़ने पर

दर्द में,बुखार में

गीली पट्टियां बन कर

बिछ जाती है माथे पर

अपने अपनों की

क्योंकि जानती है वो

कि मात्र क्षणिक

उन्माद भर नहीं है “प्रेम”

जो ज्वार की तरह चढ़ता है

और भाटे के तरह उतर जाता है

और छोड़ जाता है पीछे

सिर्फ रेत ही रेत

किसी मृगतृषणा की तरह

जहाँ होती है सिर्फ

तड़पती हुई आकांक्षाएं

और मरी हुई मछलियाँ

हाँ उसका प्रेम

होता है ठहरा हुआ,

फैला होता है उसका प्रेम

विस्तृत आकाश की तरह

जो भरती है नीले रंग

अपनों के जीवन में

और जो होता है

गंगा जमुना के दो आब-सा

जहाँ लहराती हैं

संस्कार और संस्कृति की फसलें.

विनोद सिन्हा

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