फ़िल्में मनोरंजन करती हैं हमें हंसाती हैं रुलाती हैं पर काफी कुछ बता जाती हैं और बहुत कुछ सिखा भी जाती हैं। वैसे तो भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनती हैं। हर साल फ़िल्में आती जाती रहती हैं पर कुछेक ही ऐसी हैं जो बरसों बीत जाने पर भी भूलती नहीं। कई बार कुछ ऐसे वाकया भी जुड़ जाते हैं जो भुलाए नहीं भूलते।

पापा को स्कूल में पता चला आज फ़िल्म का आख़री दिन है कल उतर जाएगी तो वो स्कूल से छुट्टी लेकर आ गए और हम भाई-बहनों को मम्मी के साथ फ़िल्म देखने के लिए भेजा। पापा ने ख़ुद हमें कहा फ़िल्म देखने के लिए, यह बात हमें हैरान भी कर रही थी और ख़ुशी भी दे रही थी। पर जब फ़िल्म देखी तो समझ में आ गया। वो फ़िल्म थी मदर इंडिया।

क्या नहीं था इसमें, पर्दे पर चिपक के रह गयी थीं आँखें। इसमें रोमांस, देहाती जीवन, अनपढ़ किसानों का शोषण तो बच्चों की मनमोहक शरारतों से लेकर जवानों के राग-रंग, परिस्थितियों की मारी मजबूर व त्रस्त औरत, पर न कभी झुकने वाली सम्बल माँ! वह माँ जो बच्चों के लिए जान देती है पर नैतिक मूल्यों की ख़ातिर बेटे की जान लेने से भी नहीं झिझकती। आज भी याद है मुझे फ़िल्म देखते हुए कितनी बार आँखें भीगीं थीं।

और नर्गिस का वो रूप कई महीनों तक आँखों में बसा रहा। बहुत साल बाद शंघाई में अपने बच्चों को यह फ़िल्म दिखायी तो मेरी बेटी ने हैरानी से कहा था- मैंने कभी सोचा नहीं था कि इंडिया में इतने साल पहले ऐसी पर्फ़ेक्ट मूवी भी बनी होगी, वरना ज़्यादा फ़िल्में नाच-कूद में ही चल जाती हैं। तब मैंने उससे यही कहा कि शायद हमने कभी यह ध्यान ही नहीं दिया कि आप बच्चों को कुछ अच्छी हिन्दी फ़िल्में भी दिखाएँ, अब ज़रूर ध्यान रखूँगी।

फिर किसी मित्र से भारत से कुछ फ़िल्में मँगवाईं। गाइड, शोले, आनंद और जाने भी दो यारो। यह कुछ फ़िल्में थीं जो लीक से हटके थीं और दूसरी बात यह ऐसी फ़िल्में थीं जो बरसों बाद भी मन पे छायी रही। वतन से दूर चीन में बैठकर फिर से इन फ़िल्मों को देखा, इस बार मेरे साथ फ़िल्मों का विश्लेषण बच्चों ने भी किया।

गाइड फिल्म देखने से पहले मैं गाइड नॉवेल पढ़ चुकी थी फिल्म देखकर कहीं यह नहीं लगा कि नॉवेल के साथ कोई अन्याय हुआ है, बल्कि आर.के. नारायणन की कृति को और ख़ूबसूरती मिल गयी। ऐसी फिल्म अपने साथ-साथ किरदारों को भी अमरत्व प्रदान करती है। किरदारों में गुंथे हुए अभिनेता और अभिनेत्री भी अमर हो जाते हैं। यही हुआ गाइड राजू और रोज़ी। अमर हुए इसके कारण देव आनंद और वहीदा रहमान भी।

दूसरी बात यह कि फिल्म देखकर लगा जैसे राजू और रोज़ी नॉवेल से उठाकर पर्दे पर आ गये हों, हूबहू वही। यही विशेषता इसको बहुत खास बना देती है। फिर फिल्म की जबर्दस्त कहानी तो इसकी जान है ही जिसमें एक खिलंदड़ सा बिगड़ा हुआ टूरिस्ट गाइड जो रोज़ी नाम की औरत के मोह में पड़ जाता है, जो एक नर्तकी है और अपने पति के द्वारा सताये जाने के कारण आत्महत्या की कोशिश करती है। राजू उसे सफल नृत्यांगना के रूप में देखना चाहता है और सफल बना भी देता है,

लेकिन खुद ही उसके पैसे उड़ाने लगता है। वह भ्रष्ट हो जाता है अंत में फोर्जरी के केस में जेल जाता है। जेल से छूट कर घर माँ के पास जाने की बजाये सुनसान जगह पर एक मन्दिर में आश्रय लेता है। पास के गाँव के लोग उसे संत महात्मा समझते हैं और वह उहापोह में उनका विरोध नहीं कर पाता। अंत में गाँववासियों के विश्वास को रखने के लिए लम्बा उपवास रखता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। पर मृत्यु से पहले उसको आत्मिक ज्ञान होता है। वहीं आकर यह फिल्म अमर होने की पंक्ति में बहुत आगे आ खड़ी होती है। उसके लिए शायद सारा श्रेय सिर्फ कहानी को ही नहीं जाता, बल्कि फिल्म निर्देशक और देवानंद के कमाल के अभिनय के कारण ही यह फिल्म अमरत्व तक पहुँच गई।

बात शोले फ़िल्म की करें तो जल्दी से ख़त्म होने वाली नहीं। इस फ़िल्म को देखकर थिएटर में बैठे-बैठे ही न जाने कितनी बार रो दिए। कितनी बार हँसे, बसंती के रूप की छटा पे मर मिटे तो जय-वीरू की दोस्ती पे निछावर हुए। एक-एक किरदार ने छाप छोड़ी थी मन पर। गब्बर तो अमर ही हो गया संजीव कुमार का सशक्त किरदार और चुलबुली लड़की से बदल कर गुमसुम हुई उनकी बहू भी दिल में समाई रही। ऐसे लग रहा था जैसे हम रामपुर की सैर करते रहें यह तीन घंटे कभी ख़त्म न हों।

“तेरा क्या नाम है बसंती?” “अरे ओ साम्भा!” जैसे संवाद आसपास के लोगों के मुँह पे उस वक़्त चढ़ गये जब यह फ़िल्म बहुत साल बाद दोबारा थिएटर में लगी। शोले में ठाकुर का बदला हो या बसंती और वीरू का खनकता चुलबुला प्यार। सब कुछ बहुत प्रभावशाली था। इतने सारे किरदार थे लेकिन सब किसी न किसी तरह से दिल को छू लेते हैं। खूंखार गब्बर से लेकर असरानी का जेलर का किरदार या ए.के. हंगल का छोटा-सा रोल सभी ने दिल पे छाप छोड़ी। ऊपर से इसके गाने जो हमारी जुबाँ से लेकर हमारे बच्चों की जुबाँ तक चढ़ गये। मुझे आज भी याद आता है जब मेरा बेटा पांच साल का था तब शोले फिल्म देखने के बाद वह “यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” गाता तो सब देखने वालों को बरबस ही हंसी आ जाती।

आवारा फ़िल्म काफ़ी पहले बचपन में टेलीविजन पर देखी थी। उस समय पापा इस फ़िल्म की तारीफ़ करते रहे पर जहाँ तक मुझे याद है हम बच्चों को “आवारा हूँ” गीत ही अच्छा लगा था। फिर चीन आने के बाद फिर से देखने का मन हो आया। यहाँ जो भी चीनी मिलता, चाहे वो टैक्सी ड्राइवर हो, कोई दुकानदार हो या कोई रिटायर्ड बूढ़ा आदमीं सभी हिंदुस्तान का नाम आते ही आवारा हूँ… गाकर ज़रूर सुनाते, सुनकर बढ़ी हैरानी हुई। कोई गीत उस देश में इतना प्रचलित भी हो सकता है जहाँ हिन्दी भाषा किसी को समझ ही नहीं आती। यह गीत सुनके फिर से तम्मना जाग उठी आवारा देखने की और जब यह फ़िल्म देखी तो पता चला यह क्यों इतने सारे देशों में प्रचलित हुई।

सबसे पहले बाकी सब पर ध्यान न भी दिया जाये तो नीली आँखों वाला वो लड़का राज कपूर अपनी भोली-भाली शक्ल और सशक्त अभिनय के कारण सबके दिल में उतर जाता है। ऊपर से राज कपूर और नर्गिस की वो जबरदस्त कैमिस्ट्री सबको बाँधने के लिए थी। ऐसी कैमिस्ट्री कि हम सिर्फ उसी में फंस के रह गया फिर इस बात पे ध्यान ही नहीं गया कि फिल्म ब्लैक एंड वाइट है। दूसरा उस फिल्म में हालात के मारे गंदी बस्ती के गरीब बच्चों का जो मुद्दा राज कपूर ने उठाया था वो समस्या आज भी उतनी ही खड़ी है तो इस समय के साथ भी चलती लगती है यह फिल्म। यह फिल्म रूस और चीन के इलावा टर्की में भी इतनी मशहूर हुई कि बाद में यह टर्की के कलाकारों को लेकर भी बनाई गयी।

थ्री इडियट्स वो फिल्म है जिसके बाद हमें क्या हमारे बच्चों को भी आमिर खान से प्यार हो गया। वैसे तो आमिर खान शुरू से ही सबकी पसंद रहा है लेकिन लगान के बाद इसने वो मुकाम छू लिया जिसकी तम्मना हर सितारे को रहती है। फिर तारे जमीं पे ने भी कमाल किया। समाज को ऐसा सन्देश देने वाली फ़िल्में कुछ ज्यादा नहीं हैं पर जब बात आती है थ्री इडियट्स की तो बच्चे, कॉलेज में पढ़ने वाले, बच्चों के माँ बाप और बच्चों के शिक्षक सब इस फिल्म के साथ सीधे जुड़ गये। ऐसी फिल्म आपको एक मिनट भी बोर नहीं करती और हंसाते हुए क्या-कुछ नहीं सिखा जाती है।

आवारा के बाद थ्री इडियट्स वो फिल्म थी जो चीन में भी इतनी प्रचलित हुई कि राज कपूर के बाद लोग आमिर के दीवाने हो गये। यह दीवानापन तब हमें देखने को मिला जब आमिर खान पीके की प्रमोशन के लिए आए थे तो हम भी बच्चों को लेकर गये थे। थिएटर में जाकर हम हैरान रह गये जब वहां हिन्दुस्तानियों से दौगुने से भी ज्यादा चीनियों को बैठे देखा और वो सभी भी आमिर-आमिर चिल्ला रहे थे।

अर्धसत्य में एक पुलिस ऑफिसर अनंत की कहानी है जो पुलिस डिपार्टमेंट के अंदर और बाहर दोनों जगह भ्रष्टाचार से लड़ने की कोशिश में कैसे टूट जाता  है। ओम पुरी ने इस पुलिस ऑफिसर का क़िरदार इस तरह से जीवित कर दिया कि लोगों को साधारण शक्ल सूरत वाला हीरो नहीं हीरा लगा। सच में ओम पुरी ने हमारी वो सारी धारणाओं को बदल दिया कि अच्छी सूरत और अच्छी कद काठी से ही लोगों के दिलों पर राज किया जा सकता है। इस फिल्म में पुलिस, राजनीति और पैसे वालों की मिलीभगत और भ्रष्टाचार के साथ-साथ पितृसत्तात्मक समाज को भी दिखाया गया। जब एक बेटे को बाप के डर के कारण अपना प्रोफेसर बनने का सपना छोड़कर पुलिस की नौकरी करनी पड़ती है। स्मिता पाटिल ने एक लड़की ज्योत्सना के रूप में कुछ ख़ास न करते हुए भी बहुत कुछ कर दिखाया। अभिनय को नये आयाम देने वाली इस अभिनेत्री ने कमाल कर दिया जैसे अभिनय हो ही नहीं रहा है।

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