कुछ जीवनोपयोगी बातें

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छली और कपटी व्यक्ति भी कभी सुखी नहीं रह सकता। वह छल और कपट द्वारा कुछ लाभ तो प्राप्त कर लेता है, परन्तु वह अपकीर्ति और अपयश का भागी बनता है। सात्त्विक मनोवृत्तिवाला और निःछल व्यक्ति ही सुखी रह सकता है।
सुखार्थी व्यक्ति को सदा आशावादी रहना चाहिए। उसे निराश नहीं होना चाहिए। उसे इस सच्चाई में परम विश्वास होना चाहिए कि निराशा से कोई कार्य सिद्ध होने वाला नहीं है। उसे ऋतु–परिवर्तन के इस तथ्य को सदा ध्यान में रखना चाहिए कि पतझड़ऋतु से ही वसन्तऋतु निकलती है। सब दिन एकसमान नहीं रहते। सुख और दुःख धूप और छाया की भाँति हाँडते–फिरते रहते हैं।
सुख के इच्छुक व्यक्ति को _आत्म–प्रवंचना_ से दूर रहना चाहिए। _आत्म–प्रवंचना_ कहते हैं―अपने आपको धोखा देना। जब हम कोई ऐसा काम करते हैं कि जिसकी सारे ही बुराई करते हैं और उसको हम अपने कुतर्क से ठीक सिद्ध कर रहे हैं तो समझना चाहिए कि हम _आत्म–प्रवंचना_ के शिकार हो रहे हैं। हमें सत्य को स्वीकार करते हुए हठ और _आत्म–प्रवंचना_ से बचना चाहिए और सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
*इस संसार में सब प्रकार के लोग रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के विचार और स्वभाव एक–जैसे नहीं होते। सबके स्वभाव और विचार अलग–अलग हैं। जब हमारा उनसे सम्बन्ध पड़ता है तो उन्होंने अपने विचार और स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करना है। हमें अपने को इस प्रकार से तैयार करना है कि विभिन्न प्रकार के स्वभाव, विचार और भावों वाले व्यक्तियों से मिलकर अपनी मानसिक शान्ति को भंग न होने दें। विभिन्न विचार वाले व्यक्तियों से मिलकर भी शान्तिपूर्ण रहना एक बहुत बड़ी कला है। यदि हमें यह कला नहीं आती तो हम शीघ्र ही रुष्ट हो जाएँगे अथवा तंग विचारोंवाले व्यक्ति से मिलकर शीघ्र ही आवेश में आ जाएँगे अथवा परेशान हो जाएँगे। इसका परिणाम यह होगा कि हम अपनी मानसिक शान्ति भंग कर लेंगे। इसके विपरित जो व्यक्ति अपनी मानसिक शान्ति को बनाये रख सकता है वह प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति से पाला पड़ने पर अपनी मानसिक शान्ति और प्रफुल्लता को बनाये रख सकता है। निःसन्देह हम समतल भूमि पर चलते हैं, परन्तु कई बार हमें पथरीली और कंकडरीली भूमि पर भी चलना पड़ता है, अर्थात् हमें अनुकूल परिस्थितियों के साथ प्रतिकूल स्थितियों में भी निकलना पड़ता है। हम अपना कदम इतनी सुदृढ़ता से रखें कि वह डगमगा न जाए और हम लुढ़क न जाएँ। समतलभूमि पर तो सभी सुगमता से चल लेते हैं, परन्तु समझदारी और चतुराई तो इसी में है कि व्यक्ति विषमभूमि पर भी चलता हुआ ठोकर न खाए।*
_यदि कोई व्यक्ति आपके सामने आकर क्रोध का प्रदर्शन करता है तो क्या उसको आप शान्ति से जीत सकते हैं? क्रोध के बदले क्रोध प्रदर्शित करने से क्रोध और बढ़ता है।_
_सुख के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि अपने मस्तिष्क को शुभ विचारों से भरे। शुभ विचार ही व्यक्ति को ऊँचा उठाते हैं। निकृष्ट विचार व्यक्ति को नीचे गिराते हैं।_
*गिरते हैं जब ख्याल तो गिरता है आदमी।*
*जिसने इन्हें सँभाल लिया वो सँभल गया।।*
अपना कोई शुभ उदाहरण संसार में अवश्य छोड़ जाओ। और कुछ नहीं तो सद्गुणसम्पन्न सन्तान ही संसार में छोड़ जाओ। जितना हो सके हर तरह से किसी न किसी माध्यम से परोपकार करते जाओ, जिससे लोग आपको मरने के बाद भी याद करें कि बहुत सज्जन और भला आदमी था।

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