कर चले हम फ़िदा

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मेरे जूते देखो और उस जूते मे पड़े मेरे पांव देखो अभी तब “पोजीशन” की मुद्रा में हैं पीठ लग गयी है मेरी पर छाती आज भी आसामानगामी है।
मेरे मस्तक पर आज भी वो लोहे वाली पगड़ी आन बान सान से बैठी है, उठाओ मिट्टी और स्पर्श करो सुगंध लो आज भी मेरी हड्डियां इनमें सुरक्षित हैं सूंघ कर देखो इसमे मातृभूमि की सुगंध है, कानों से लगाओ और आभास करो सुनो इनमे आज भी “वंदे मातरम” है।
तुम्हारी सुरक्षा मे हमने अपनी मांसपेशियां तक गला दीं ताकी तुम कल को पद्मावत बना सको, तुम अभिव्यक्ति के नारे लगा सको, तुम घरों में बैठ कर हमारे उपर राजनीति कर सको। हमारे नाम पर “बोफ़ोर्स” खरीद सको और आगे चल कर हमारे ही नाम पर “आगस्ता” जैसे बड़े सौदे कर सको । और तुम्हारी आने वाली पीढियाँ उस उम्र तक पढ़ती रहे देश प्रमुख संस्थानों में, जिस उम्र तक आते आते हम रिटायर हो जाते हैं अगर हुतआत्मा ना हुए तो।
हम अपनी बेटियों के लिए कभी गुड़िया नही खरीद सके अम्मा बाबा को चारों धाम नही भेज सके काका की दवाई ना करा सके, सालगिरह पर कभी पत्नी के साथ नही रह सके, ताकी तुम आगे चल कर हमे “बलात्कारी” कह सको। हम धमाके और धांय धांय चलती गोलियों के बीच से रोज गुजरते हैं ताकी तुम एसी कमरों मे बैठ कर ये सोच सको दीपावली पर पटाखे जलाने हैं नहीं, हम कभी कारगिल पार कर जाते हैं तो कभी गिलगित तो कभी बलोचिस्तान में ये सोच कर घुस जाते हैं कि तुम बैठ कर यह बहस कर सको की राष्ट्रगान पर खड़े होना है या नही “वंदे मातरम” बोलना हराम है सबाब।
हम ये सोच कर अपनी गर्दन कटा लेते हैं कि तुम न्यू ईयर पर न्यू जर्सी की तर्ज पर दारू मुर्गा खा को।
हमारा क्या है हम सैनिक हैं मौत हमारी प्रेमिका है।
तो तुम करते रहो बहस फ्री सेक्स करना है या फ्री में पैड बांटने हैं। हम रोज हुतआत्मा होते हैं बस इस लिए कि तुम अपने मनपसंद होटल में खाना खा सको, शाम को अपने पसंद की शराब पी सको हर त्योहार को हर्ष के साथ मना सको। आज दुनिया में साठ देश ऐसे हैं जहाँ रोज धमाके होते हैं और उन देशों में आतंकवादी विचारधारा की जनसंख्या भारत के आतंकवादी विचारधारा की जनसंख्या से बहुत कम हैं, आज भारत सुरक्षित है……..
और सुरक्षा के दाइत्व में तुम भी अपना योगदान बढ़ाओ, फालतू के मुद्दों को राष्ट्रीय समस्या मत बनाओ……..
मेरी बेटी मेरी बेवा पत्नी से आज फिर पूछ बैठी “मम्मी हमारे पापा कहां हैं”………….

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