कटी चूड़ियां

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फ्रिज और दिवार के बीच दुबकी, सिसकती, बिखड़े बालों को दोनों मुट्ठी से दबोचे, सर पे हाथ रखे बैठी वो फूट फूट कर रो रही थी । आँखे लाल …आंसुओं के धार थम नहीं रहें …वो दुबकी चीखती पर सहमी आवाज को समाज से छुपाये बिलख रही थी…बस बिलख रही थी…। बुरी तरह पीटा गया था उसे आज…। एक दरिंदगी की हद तक मारा गया था उसे…। नामर्द हाथों के मर्दानगी पर थूकते तमाचों, थप्पड़ों. लात-घूसों, डंडो जो मिला उन सबों के निशान थे उसके बदन के हर हिस्से में अपनी छाप उगाये हुए । बता रहें थे कि दुर्गा कही जाने वाली औरत मर्दों के दुर्ग की चारदीवारी में इस तरह जकड़ी हैं कि कोई ना तो उसे सुनता हैं, ना सुनना चाहता हैं ।
“पति हैं बेटा, थका हारा कभी गुस्सा कर दे तो बुरा मत मानना, सह लेना । पति का हक है इतना तो।”
“पति हैं, परमेश्वर थोड़े ही हैं माँ । मैं भी दुर्गा हूँ….हा हा हा हा…”, माँ के हर बार की सलाह का खिलखिला कर यही जवाब देती थी दुर्गा, जब नई नई शादी के बाद मायके जाके अपने और अपने पति की नोक झोंक उसी अंदाज में अपनी माँ को सुनाती थी । विश्वास था उसे कि उसका पति ऐसे ही उसको हमेशा चाहेगा ।
घुटनों पर सिर रखे, डबडबाती आँखों से किचेन के चूल्हे को देखते हुए ,उसकी आखों के सामने वो दृष्य एक रोमांटिक फिल्म की तरह चल रहें थे कि कैसे खाना बनाना सिखाया करता था मुझे वो यहाँ, हां यहीं प्लिंथ पर बैठा कर के । जली सी सब्जी बना कर चखाता था और कहता था कि मैं जिंदगी भर तुम्हे ऐसे ही खिलाऊंगा…और मैं जुबान पर जल रहीं कड़वी स्वाद को प्यार में बदल कर उसके हाथ चूमते हुए इठलाती हुई कहती थी, “भगवान मेरे जैसा पति सिर्फ मुझे ही दे….।” आज उस दुआं को लौटा रहीं हूँ भगवान । मुझे बस मेरे बेटी के लिए जीने की ताकत दे । ताजमहल के सामने हजारों लोगों के बीच गालो को चूमती हुई तस्वीर खिचवाने वाला वो पति अब मेरी हर बात पर , मेरे हर छोटी से छोटी गलती पर, मेरे खाने के स्वाद पर जानवर बन कर मुझे नोच डालता हैं, जो कभी मुझे अपने उन्ही हाथों से खिलाया भी करता था…।
“मम्मी, किधर हो….भूख लगी हैं…”, नन्ही गुड़िया जाग कर इधर उधर अपनी माँ को आवाज लगाती हुई किचेन में आ गयी । झट से उसकी तरफ पीठ कर के बर्तन ठीक करते हुए दर्द समेटती खुशनुमा आवाज में दुर्गा बोली, “अल्ले मेरी गुडिया जाग गयी….!! अभी लायी बेटा, बस दो मिनट में मीठी मीठी खाना लेकर आई….तब तक अपनी कुर्सी पे बैठो ….चलो चलो…फ़ौरन…मम्मा अभी आई…।”
ok कहकर गुडिया चली गयी…जमीन पर हाथों के बल कन्धो को टिकाये, बचे आंसूओं को नाले के पानी में बहा कर अपने पल्लू से चेहरा पोछते हुए फिर से उठ खड़ी हुई….अपनी बेटी के लिए । सारे दर्द भूल के । दाग ना दिख जाए चेहरे के इसलिए तवा से थोड़ी कालिख लगा ली चेहरे पे । उसका इस दुनिया में कोई न था…लेकिन उस बेटी की माँ अभी जिन्दा थी । औरत प्रसव पीड़ा सहने के बाद भी अगर नन्ही आँखों को देख मुस्कुरा सकती है तो वह जिन्दगी के किसी भी दर्द को उसकी मुस्कराहट के लिए सहन कर सकती हैं ।
‘हम थे जिनके सहारे…..वो हुए न हमारे…टूटे जब दिल की नईया……’, रेडियो पर गाना बज रहा था….। सिगरेट का आधा जलता कस जमीन पर पड़ा था और दुर्गा के टूटे हुए बाल भी । बालों से घसीटा था आज उसने उसे….घर से बाहर निकालना चाहा था । गिरती पड़ती टकराती भाग कर वो किचेन में फ्रिज के कोने के जगह में दुबक गयी थी…हाथ जोड़े….रहम की भीख मांगते । आया था वो …खीचना चाहा था उसे…। ना कर पाया तो चार पांच ताबड़ तोड़ तमाचें भी जड़े थे…। होठ पर नाखून के जख्म लगने के बाद…चेहरे को केहुनियों से छुपाये…हाथ जोड़े गिड़गिड़ाई थी वो, “भगवान के लिए छोड़ दो..माफ़ कर दो…गुड़िया उठ जायेगी…प्लीज, मत मारो ।” वहीं भगवान…….. जिससे वो कभी कहा करती थी कि ऐसा पति सिर्फ उसे ही दे…. वही भगवान ।
चूड़ी के टुकड़े कुर्सी के पाँव के पास थे…। सुहाग ने सुहाग थोड़े थे…इस सुहागन के । कैसे बारिश में भींगता हुआ आया था ऑफिस से … हाथ में ये चूड़ियों का डब्बा लिए….।
“इसको फटाफट पहन के दिखाओ….देखू मैं भी, तुम्हारी याद तुम्हारी कलाई कितना नाप पाई…। तुम्हे बहुत पसंद हैं न और रंग भी तुम्हारा फेवरेट हैं।”
“आपकी नजर तो आपसे भी ज्यादा पारखी निकली जी ।”
“अजी हम हैं ही परखनली किस्म के आदमी… प्यार में प्यार को मिला कर के परिवार बना लेते हैं ।”
“अच्छा जी”, तिरछी नजर से उसपे देख कर करीब आकर गले में दोनों हाथों को डाल के गालों को चूमती हुई दुर्गा फिर बोली थी , “भगवान ऐसा परखनली सिर्फ मुझे ही दे ।”
अब वो चूड़ियाँ टूट चुकी थी….। खाना खत्म हुआ….। गुड़िया का मुंह पोछ कर वो अपने बदनामी के अवशेषों को साफ़ करने लगी…। बेटी का चेहरा नजर से हटा तो उसकी जगह फिर आंसुओं ने ले ली । चेहरे से सिसकती आवाजें और गर्म भाप ने फिर से उसे लाल कर दिया…। बार बार धुंधली होती नजर को पोछती ताकि कोई निशान न छुट जाए ।
झाड़ू से बहार कर, टूटे बालों को सिगरेट में लपेट कर कचड़े में फेंकती हुई दुर्गा नल के पास गयी…..नल खोल दिया और सिर उसमे दे दिया…। तब तक रही…..जब तक गर्म आंसूं ठंढे नहीं हो गये…। आखों की जलन शीतल न पड़ गयी तब तक वो पानी में पूरा सर दिए रही । कमरे में आई…..कपड़े बदले, बैग लिया…..बेटी को गोद में लेकर निकल पड़ी…घर से बाहर..। रिक्शा लिया और एक स्कूल पहुंची….।ऑफिस में जाते ही बैग से अखबार और एक कागज़ का टुकड़ा निकाला ।
“आपको नन्हे बच्चों के लिए एक टीचर की जरूरत थी…आज के अखबार में देखा था..मैंने । ये मेरी डिग्री का सर्टिफिकेट हैं । क्या मैं आपके काम आ सकती हूँ…?”
थोड़ी देर बाद…..स्कूल से बहार निकलते हुए अपनी दोस्त को फ़ोन किया, “शीतल, मैं तेरे घर आ रही हूँ । थोड़ा काम हैं ….। अच्छा वो कमरा खाली है या लग गया…तेरे सामने वाले घर का ?….हाँ हाँ वहीं गंदा सा….ok मैं आती हूँ…।”
फ़ोन कटते ही एक ठेले वाले ने आवाज दी…., “मैडम चूड़ियाँ ले जाइए…अच्छे लगेंगे । नये मंगवाएं हैं ।”
एक पल रूक कर देखती रही….रंग बिरंगी चूड़ियों को…गुडिया ने बढ़ के देखना चाहा तो बढ़े हुए हाथ पर चूड़ियों से कटे निशान दिख गये । “चलों बेटा, शीतल आंटी इन्तेजार कर रहीं होंगी न…ये बाद में लेंगे ।”
“क्या हुआ मैडम….देखती तो जाइए…..।”
आँखों में दुर्गा लिए वो चलती चलती कह गयी…,
“अब मैं चूड़ियाँ नहीं पहनती बाबा……।”

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