एक पैग जिन्दगी-सूरज

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मुंबई..मुझे आए हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। महानगर में मैं कभी रहा नहीं था और भीड़भाड़ से मुझे बेचैनी होती थी। लेकिन प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग के लिए छः महीने रहना था..यहां। रूम से निकल कर मैं एक ढ़ाबे पे नाश्ते के लिए पहुंचा। कम उम्र के बच्चों को काम करते देख..एक अजीब सी कशमकश मेरे मन में उभरने लगती थी। जिस उमर में इनके हाँथों में किताबें होनी चाहिए थी..न जाने किस मजबूरी वश वो प्लेटें धो रही थी।
तभी एक बच्चा आकर मुझसे पूछने लगा..बाबूजी क्या लाऊं..नाश्ते के लिए ?? मैंने ऑर्डर तो दे दिया लेकिन उसे देखकर मैंने ये महसूस कर लिया कि बच्चे के पेट में एक निवाला तक नहीं गया है।
नाश्ता टेबल पर मेरे सामने रखते हुए..उसने कहा..बाबूजी ये रही आपकी प्लेट। जैसे ही वो मुड़ने को हुआ..मैंने उसे एक चाय लाने को भी बोल दिया। तबतक मैंने उसे बकायदा देख भी लिया था..कपड़े फटे तो नहीं थे लेकिन पुराने जरूर थे और साफ भी। फिर से वो मेरे सामने हाजिर था..चाय की कप लेकर। अबकी बार मैंने साफ महसूस किया..उसकी भूख और बेबसी भी।
एक इन्सान होने के नाते या चाहे आप जो भी कह लें..मैंने सीधा सा एक प्रश्न उसकी तरफ उछाला..कुछ खाया है तुमने ?? वो मुस्कुराने की चेष्टा करते हुए समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दूं। तभी ढ़ाबे के मालिक की आवाज सुनकर वो चला गया। मैं नाश्ते के बाद जब चाय पी चुका तो ढ़ाबे का मालिक बिल लेकर आया। मैंने उसके आते ही सवाल किया..कितने बच्चों को काम पर रखा है ??
“चार बच्चे है..सर जी” !!
“बुलाओं.. उन्हें” मैंने उसे ऑर्डर दिया।
वहां बैठे सभी लोग मेरा मुँह देख रहे थे। सभी के चेहरे पर उत्सुकता थी कि आगे मैं क्या करने वाला हूँ। मेरे चेहरे पर एक इत्मीनान की मुस्कुराहट थी।
बच्चे आए तो मैंने मालिक से ही कहा..
“जो भी नाश्ते में है.. लेकर आओं”
और मैं खुद उन्हें अपने पास बिठाने लगा।उनके चेहरे पर एक नन्ही सी मुस्कुराहट देख..जाने कैसा सुकून मिल रहा था मुझे। तब तक सबके सामने प्लेटें हाजिर थी और मालिक को भी ये आभास हो गया था कि जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ वो उसे पहले ही कर देना चाहिए था।
जब बच्चे खा चुके थे तो मैंने फिर पूछा..बोलो “किसी को कुछ और चाहिए”..सबने “ना” में अपना सिर हिलाया । फिर भी मैंने मालिक को बुलाकर मीठे का ऑर्डर दिया और जब मीठा सामने आया तो मैंने ये कहते हुए कि..”मैंने तुमलोग के साथ तो कुछ खाया ही नहीं”..एक-एक मीठा सबको उठा कर खाने को बोला। अबकी बार बच्चे खुल के हंस पड़े और साथ में सारे लोग भी।
मैंने बिल चुकाया और साथ में बच्चों को भी कुछ पैसे दिए। सारे दिन का सुकून लेकर मैं आज वहां से निकल रहा था। मालिक ने मुझसे वादा किया कि वो बच्चों को भूखा नहीं रखेगा।
काशः- कि मैं कुछ और भी कर पाता..बच्चों के लिए।मैंने जिंदगी का बस एक पैग ही पिया..आज। सुकून भरा इंसानियत का पैग..
सूरज #दमोह (भोपाल)
 

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